शाला पूर्व शिक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शाला पूर्व शिक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बच्चों से बातचीत

बातचीत - 

  1. रंग - बच्चों से बातचीत में पूछें आज लाल रंग के कपड़े कौन पहन कर आया है। यदि कोई भी लाल रंग के कपड़े पहन कर नहीं आया हो तो पूछें। आपकी मम्मी कौन से रंग की बिंदी लगाती है। गुलाब का फूल किस रंग का होता है। गैंदा कौन से रंग का होता है। पत्तियाॅ किस रंग की होती है। आम और पपीता किस रंग का होता है। और कौन सी चीज लाल, पीले, हरे, रंग की होती है। ऐसे ही अन्य रंगों पर भी बच्चों से बात करें।
  2. वारिश - बच्चों से पूछें आपने बादलों की आवाज सुनी है। बच्चे कहेंगे हां तो आप पूछें कि बादल कब गरजते हैं। कैसे गरजते हैं। जब बादल गरजते हैं तो क्या होता है। वारिश कैसे आती है। बंूदे कैसे गिरती हैं। बारिष में भीगना किसको अच्छा लगता है। वारिश में ज्यादा भीगने से क्या होता है। बीमार पड़ने पर क्याा होता है। वारिश में कौन सी चीजें आती है। ककड़ी, भुट्टा आदि। 
  3. स्वतंत्रता दिवस - बच्चों को बताएं कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। यह भी बताएं कि स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया जाता है? बच्चों को बताएं इस दिन हमारा देष स्वतंत्र हुआ था। यह हमारा राष्ट्र त्यौहार है। इस दिन हम आंगनवाड़ी/स्कूल में झण्डा फहराते है। राष्ट्रगान गाते है। फिर सब बच्चों को मिठाई बांटी जाती है। इसलिए इस दिन सभी बच्चों को सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर साफ कपड़े पहन कर आंगनवाड़ी/स्कूल आना चाहिए। 
  4. तिरंगा झण्डा - बच्चों को बताएं कि हमारे देश का झण्डा तीन रंग का हैं। इसलिए इसे हम तिरंगा झण्डा कहते है। यह झण्डा हमारे देश की पहचान है। सभी को तिरंगे का सम्मान करना चाहिए। इसको प्रणाम करना चाहिए। कभी भी इसको पैरों के नीचे नहीं आने देना चाहिए इससे झण्डे का अपमान होता है। 
  5. स्वतंत्रता दिवस - 15 अगस्त के दिन बच्चों को स्कूल/आंगनवाड़ी में आमंत्रित करें। गांव/मोहल्ले के गणमान्य नागरिकों तथा बच्चों के अभिभावकों को भी आंमत्रित करें। बच्चों से झण्डा फहराएं। झण्डे को प्रणाम करवाएं।

देश भक्ति गीत बच्चों से गाने के लिए कहें।

तीन रंग का अपना झण्डा।
कहते इसे तिरंगा झण्डा।
आसमान में है लहराता।
तीनों रंगों में है फहराता।
हरा, सफेद केसरिया रंग में।
रंगा हुआ है अपना झण्डा।
लहर लहर लहराए झण्डा।
फहर फहर फहराए झण्डा।
6. राखी - बच्चों से पूछें कि आपको पता है राखी का त्यौहार आने वाला है। आदतन बच्चे कहेंगे हां। फिर बच्चों से पूछें कि राखी पर क्या करते हैं। बहनें भाइयों को राखी बांधती हैं। भाइयों को मिठाई खिलाती हैं। भाई बहनों को उपहार देते हैं। जैसे बहने भाइयों को राखी बांधती है वैसे ही भाइयों को भी बहनों को राखी बांध कर मिठाई खिलानी चाहिए। इस त्यौहार को मनाने से भाई-बहन के बीच प्यार बढ़ता है।
बच्चों से पूछें आप किसकों राखी बांधती/बांधते हैं/ आप किससे राखी बंधवाते/बंधवाती हैं। आपके पापा को कौन राखी बांधता है। आपकी मम्मी किसको राखी बांधती हैं। कुछ लोग भगवान को भी राखी बांधते हैं क्योंकि भगवान हमारी रक्षा करते है।
7. फूल - बच्चों को कोई फूल या उसकी तस्वीर दिखा कर पूछें यह क्या है? बच्चे फूल का नाम बता पाएं तो उन्हें नाम बताएं। यदि बता दे तो उसका रंग कैसा होता है। उसका आकार कैसा होता है। उसकी खुषबू कैसी होती है। आदि प्रष्न पूछें। इसके बाद दूसरे फूल के बारे मेें बात करें। बारी-बारी सभी फूलों के बारे में तथा उनके रंगों के बारे में बच्चों से बातचीत करें। पूछें फूलों का हम क्या करते हैं। बताएं - माला बनाते हैं, भगवान को पहनाते है। किसी का स्वागत या सम्मान करना हो तो उसे फूल देते है। घर को सजाने के लिए भी हम फूलों का इस्तेमान करते है। गुलाब के फूल की गुलकंद बनाई जाती है। फूलों से दवाइयां भी बनती है।

कहानी - 

कौआ और चिड़िया

एक था कौआ, एक थी चिड़िया। कौआ दिन भर उड़ता, फिरता, नाचता, घूमता, कांव कांव करता था।
चिड़िया रोज जंगल में, खेतो में, घरों मेें जाती, आने के बाद मेहनत करती। कौआ कहता चिड़िया बहन चिड़िया बहन कहां जा रही हो?
चिड़िया - जंगल में।
कौआ - क्यों
चिड़िया - तिनका लाने
कौआ - तिनके का क्या करोगी?
चिड़िया - घोंसला बनाऊंगी बारिष जो आने वाली है। कौआ दादा तुम घोंसला नहीं बनाओगे?
कौआ - अभी बारिष का मौसम तो दूर है। तब तक नाचता, उड़ता रहूंगा।
चिड़िया - नहीं-नहीं फिर घोंसला कैसे बनाओगे।
कौआ - चिड़िया बहन आज कहां जा रही हो?
चिड़िया - खेतो में
कौआ - क्यों?
चिड़िया - कपास लाऊंगी। घोंसले में लगाऊूगी, बच्चों के लिए नरम-नरम गद्दी बनाऊंगी, तुम नहीं बनाओगे? कौए ने कहां - ऊं हूं।
दूसरे दिन फिर चिड़िया को जाते देख पूछा- आज कहां जा रही हो।
चिड़िया - केतन के घर
कौआ - क्यों?
चिड़िया - बच्चों के लिए दाना लाऊंगी।
एक दिन खूब जोर से हवा चली। आंधी चलने लगी और जोर से बारिष होने लगी। कौआ पानी में भीगने लगा। ठण्ड से कांपने लगा, सोचने लगा अब क्या करूं? हाॅ, चिडिया बहन के यहां ही चलता हॅू, उसने तो सुंदर घोंसला बनाया है।
‘‘फडफड़, फड़फड़‘‘ - चिड़िया बेन, चिड़िया बेन दरवाजा, खोलो। मैं भीग गया हूॅ। मुझे अंदर आने दो ना।
चिड़िया - ऊंह, दरवाजा खोलूगी तो मेंरे बच्चों को ठण्ड लग जाएगी। अंदर पानी आ जाएगा। मैं दरवाजा नहीं खेालूगी मेंरे बच्चे सोए है जग जाएंगे।
कौआ - खोलो न दरवाजा प्लीज चिड़िया बहन।
चिड़िया - अच्छा खोलती हूॅ, धीरे से आना नही ंतो बच्चे जग जाएॅगे, और एक वादा करो तु भी अपना घोंसला बनाओगे।
कौआ - हाॅ मैं वादा करता हॅू।
फिर चिड़िया दरवाजा खोल देती है। फिर खिचड़ी बनाती है। फिर दोनों ने गरम-गरम खिचड़ी खाते हैं? कौआ कहता है - मैं भी तुम्हारे जैसा घोंसला बनाऊॅगा, फिर गरम-गरम खिचड़ी बनाकर तुम्हें खिलाउंगा।

मुनिया का छाता - 

एक लड़की थी नाम था मुनिया।
मुनिया के पास एक लाल रंग का छाता था मुनिया उसे हर समय अपन पास रखती थी।
एक दिन मुनिया सो रही थी।
मुनिया के छाते ने सोचा मौका अच्छा है आज तो मैं अकेले घूमकर आउंगा।
अभी वह थोड़ी दूर ही गया था। खूब जोर से बारिष शुरू हो गई, छाता खुल गया और चलता रहा। उसे बारिष देखकर बड़ा मजा आ रहा था। वह मजे से घूमते हुए एक तालाब के पास पहुंच गया।
उसने देखा कि मेढक पानी में भीग रहा है। छाते ने कहा - अरे अरे तुम बारिष में कितने भीग रहे हो। ज्यादा भीगोगे तो तुम बीमार हो जाओंगे। तुम्हें सर्दी हो जाएगी। आओ में छाता हॅू तुम मेंरे नीचे आ जाओंगे तो भीगोगे नहीं।
मेढक हॅसन लगा और उसने फुदक कर पानी में छलांग लगाई। और कहने लगा कि मुझे बारिष में भीगना अच्छा लगता है। मैं बारिष शुरू होते ही मैं टर्र टर्र गाने लगता हूॅ।
छाते ने कहा कोई बात नहीं तुमको अच्छा लगता है तो तुम भीगो मुझको क्या मैं तो चला। छाता आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाने पर उसने देखा कि एक मोर पानी में भीग रहा है। वह जल्दी - जल्दी उसके पास पहुंचा और बोला आओ मैं छाता हूॅ तुम मेरे नीचे आ जाओगे तो भीगोगे नहीं।
मोर ने कहा - मुझे वारिश में भीगना अच्छा लगता है क्योकि वारिश आती है तभी तो काले बादल आते हैं और मैं बादलो को देख कर नाचना शुरू कर देता हॅू।
छाता आगे बढ़ा रास्ते में कुछ बच्चों पानी में भीग रहे थे। छाता उनके पास पहुंचा अरे बच्चों तुम बारिष में क्यों भीग रहे हो तुमको सर्दी जुकाम हो जायेगा तुम्हारी तबियत खराब हो जायेगी। आओ मैं छाता हूॅ तुम मेंरे नीचे आ जाओगे तो भीगोगे नहीं।
सब बच्चे एक साथ बोले - छाता भैया हमें वारिश में खेलना बहुत अच्छा लगता है। तभी तो हम वारिश में खेल रहे है।
छाता फिर आगे बढ़ा - उसने देखा कि एक बूढी अम्मा पेड़ के नीचे बैठी है और वारिश से बचने की कोशिश कर रही है। छाता उसके पास पहुंचा और बोला कि बूढी अम्मा-बूढी अम्मा मैं छाता हूूॅ। आप मेरे नीचे आ जाओगी आप भीगोगी नहीं।
बूढ़ी अम्मा खुश हो गई। और छाते के नीचे आ गई।
छाते ने पूछा अम्मा आपको कहां जाना है मैं आपको आपके घर पहुंचा देता हॅू। अम्मा ने छाते को घर का पता बताया दोनों घीर-धीरे चलते हुए। अम्मा के घर पहुंच गए। अम्मा ने छाते को खूब सारा आर्शीवाद दिया।

कविताएं/नृत्य गीत

रंग के दुपट्टों से लहराने का नृत्य

हवा में उड़ता जाए मेंरा लाल दुपट्टा देखो जी - मेरा लाल दुपट्टा देखो जी हो हो ..........
लहर-लहर लहराए मेरा लाल-दुपट्टाा देखो जी - मेरा लाल दुपट्टा देखो जी हो हो.....
लाल रंग है सबको प्यारा - सबसे न्यारा,
लाल-लाल मैं भी हो जाऊॅ सबके मन को मैं भी भाऊॅ मैं भी ऐसा कुछ कर पाऊॅ
मुझे बतादो मेरा यारा, लाल रंग क्यों सबको प्यारा
मत उदास हो मेरे यारा सेब टमाटर खाते जाना, अपना खून बढ़ाते जान,
लाल-लाल तुम भी हो जाना,
हवा में उड़ता जाए मेरा हरा दुपट्टा देखो जी - मेंरा हरा दुपट्टा देखो जी हो हो....
लहर-लहर लहराए मेरा हरा दुपट्टा देखो जी - मेंरा हरा दुपट्टा देखो जी हो हो....
हरा रंग क्यों सबको प्यारा, मुझे बताना मेरे यारा
हरी सब्जियां कितनी प्यारी। देखो-देखो कितनी सारी.....
लौकी गिलकी, भिण्डी तोरी, इनकी क्यों तू खाती छोरी
इनसे ही मैं लम्बी गोरी,
हवा में उड़ता जाए मेरा पीला दुपट्टा देखो जी-मेरा पीला दुपट्टा देखो जी हो हो...
लहर-लहर लहराए मेरा पीला दुपट्टा देखो जी-मेरा पीला दुपट्टा देखो जी हो हो...
पीला रंग क्यों सबको प्यारा, मुझे बताना मेरे यारा
आम, पपीता पीला-पीला, देखो आम रसीला यारा
मुंह में पानी लाए यारा, खाए बिना क्यूं रह न पाएं यारा
काजल से नहीं नैन सजीले, खाओ हरी सब्जियां फल-फल पीले-पीले
सभी रंग है कितने प्यारे लहर-लहर लहराएं ये सभी दुपट्टे देखो जी हो हो.......
हवा में उड़ते जाए ये सभी सभी दुपट्टे देखो जी हो हो....
नोट - बच्चों को नृत्य गीत का अभिनय एक-एक रंग के बारे में एक दिन अभिनय सिखाएं ताकि वे उसे याद कर सकें।

पानी बाबा

पानी बाबा आए है। ककड़ी भुट्टा लाए हैं।
पानी बाबा आए हैं। सबके मन को भाए हैं।।
3द्ध पानी तथा वर्षा के गीत
आए काले-काले बादल, लगते बहुत निराले बादल।
आसमान में दौड़ लगाते, कभी ठहरते गाना गाते।।
कभी-कभी बिजली चमकाते।
पानी भर-भर लाते बादल। प्यास बुझाते काले बादल।

Share:

बाहरी गतिविधियाॅ Outdoor activities

  1. फर्श पर चाॅक, चूने, राख या रंगीन कलर के सेलो टेप (चिपकाने वाला टेप) से कोई आकृति बना दे। बच्चों को उस आकृति पर चलने की गतिविधि करवाएं। 
  2. सीधे पटिए पर चलने की गतिविधि करवाएं।
  3. फर्श पर सीधी लाईन खीचे। उस पर बच्चों को चलने की गतिविधि करवाएं।
  4. उस लाईन पर बच्चों को आगे की तरफ चलने को कहे। फिर उसी लाईन पे पीछे की तरफ चल के आने की गतिविधि करवाये। 
  5. दो आडी टेढ़ी रेखाएॅ खीचे उनके बीच चलने की गतिविधि करवाएं। 
  6. दो रेखाओ के आर-पार चलने की गतिविधि करवाए। 
  7. रेखाओं को लांघ कर पार जाने की गतिविधि करवाएं।
  8. सरल दौड करवाएं। 
  9. धीमी और तेज दौड़ करवाएं।

सामूहिक खेल - 

  • खेल-टोपी बदलो - 

सभी बच्चे कागज या कपड़े की टोपी पहन कर एक गोले में बैठेंगें। एक बच्चा बिना टोपी के रहेगा। खेल शुरू करने के लिए डफली, घुंघरू, घंटी, या थाली जो भी उपलब्ध हो बजाए। डफली बजते ही बच्चे अपने सिर की टोपी उतार कर अपने आगे वाले बच्चे के सिर पर रखेंगे। जब तक डफली बजती जाएगी बच्चे टोपी बदलते रहेंगे। जैसी ही डफली बजाना बंद करेंगे। बच्चे टोपी बदलना बंद कर देंगे। जिस बच्चे के सिर पर टोपी नहीं होगी वह बच्चा आउट हो जाएगा। उसे अलग करके एक टोपी कम कर दी जाएगी तथा फिर डफली बजाकर खेल शुरू किया जाएगा। जैसे बच्चों की संख्या कम होती जाए। घेरे को छोटा करते जाएं। अंत मेें जब दो बच्चे शेष रह जाएंगे। वह विजयी होंगें।

  • बल चैपाल एवं जन्म दिन का आयोजन - 

मह में निर्धारित तारीख को बाल चैपाल का आयोजन करें। बच्चों के द्वारा माह भर में की गई गतिविधियों में से बच्चों की पसंद की गतिविधियां बच्चों से बाल चैपाल के दिन करवाएं। तथा माह में पैदा हुए बच्चों का जन्म दिन भी इसी दिन मनाएं।

 

फूल बाल गतिविधियां || हिन्दी कविता || गतिविधि आधारित शिक्षा


Pre Child Education (प्री चाईल्ड एजुकेशन ) चैनल के माध्यम से बच्चों ( प्री प्रायमरी और प्रायमरी ) को क्रियात्मक गतिविधि आधारित शिक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रहे है। जो बच्चो के मानसिक विकास में सहायक होगी। इस के अलावा बच्चों को कक्षा के अन्य विषय भाषा, अंक ज्ञान, क्रियात्मक, रचनात्मक, पर्यावरण आदि विषय से  सम्बंधित जानकारियॉ भी प्रदान की जावेगी जो बच्चों के स्कूल शिक्षा में सहायक होगी। बच्चों को इस चैनल पर गतिविधि, बालगीत, बाल साहित्य, कहानियॉ, आदि के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की कोशिश की गई है।

अन्य सोशल लिंक -

अन्य वीडियो प्लेलिस्ट -

 

Share:

रचनात्मक गतिविधियां Creative activities

कविताएं - 

  • मैं इक नन्हीं कठपुतली
मैं इक नन्हीं कठपुतली रोना मुझको आता नही। ठुम्मक-ठुम्मक चलूं मजे से खाना पकाना आता नहीं। घाघरा चोली पहनूं मजे से कपड़े धोना आता नहीं। लाली लिपिस्टिक लगाऊॅ मजे से पढ़ना लिखना आता नही। 
  • नन्हा मुन्ना बच्चा हूॅ (नन्हा मुन्ना राही हूॅ.................. की तर्ज पर)
नन्हा मुन्ना बच्चा हूॅ सबको लगता अच्छा हॅूआंगनवाडी जाता हॅूू, चलो मेरे संग तुम भी, तुम भी।रोज अच्छी बाते मैं सीखूगां वहा, अच्छे-अच्छे खेल भी खेलूगाॅ वहा।आगे ही आगे बढूंगा हरदम, नन्हा मुन्ना बच्चा हूॅ। सबको लगता अच्छा हॅू रोज अच्छी चीजें भी मिलेगी वहा। जिन्हे खा कर हेल्दी बनूगां मैं, वहां, आगे ही आगे बढूंगा हरदम।नन्हा मुन्ना बच्चा हूॅ सबको लगता अच्छा हॅूआंगनवाडी जाता हॅूू, चलो मेरे संग तुम भी, तुम भी।
  • हम रोज नहाते 
हम रोज नहाते हम रोज नहाते। मंजन करते कुल्ला करते।।दांतो के चम-चम चमकाते। हम रोज नहाते रोज नहाते ।।तेल लगाते कंघी करते बालोे को चमच म चमकाते।।हम रोज नहाते रोज नहाते। हम रोज नहाते रोज नहाते।।भोजन करते खाना खाते। खाते पीते स्वास्थ्य बनाते।।
हम रोज नहाते रोज नहाते। हम रोज नहाते रोज नहाते।।
  • बच्चों तुम नित करना स्नान
बच्चों तुम नित करना स्नान स्वच्छता पर तुम देना ध्यान स्नान शरीर में फुर्ती लाता, आलस्य को दूर भगाता।मालिश करके रोज नहाना, रगड-रगड के मेल छुड़ाना।।साबुन लगा नित करना स्नान, तुरंत मिटेगी सुस्ती थकान।बच्चों तुम नित करना स्नान स्वच्छता पर तुम देना ध्यान 
  • शरीर के अंगो का अभिनय गीत

हे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। एक छोटी नाक मेरी दिन भर साॅस लेती है। रात में सोती है फिर भी साॅस लेती है। एक छोटा मुॅह दिन भर बोला करता है। रात में सोता है दिन में काम करता है।हे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। दो छोटी आॅखे मेरी दिन भर देखा करती है। रात में सोती है दिन में काम करती हैहे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। दो छोटे कान मेरे दिन भर सुना करते है। रात मे सोते है दिन में काम करते है। हे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। दो छोटे हाथ मेंरे दिन भर काम करते है।रात में सोते है दिन में काम करते है।हे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। दो लम्बी टाॅगे मेरी दौडा करती है। रात में सोया करती है, दिन में दौड़ा करती है। हे ना मजे की बात, बच्चे है न मजे की बात। 

गतिविधियाॅ - 

  1. मिट्टी के खिलौने बनान जैसे - थाली, कटोरी, गिलास, चूल्हा, भगोना, कढ़ाई, कडछी आदि। 
  2. मिट्टी के खिलौने में रंग करना सिखाएॅ।
  3. घर की आकृति पर कागज की चिंदिया चिपकाने/घर की आकृति पर लेई/गोंद/फेविकोल आदि लगाकर रेत चिपकाने की गतिविधि करवाएं।
  4. चोटी गुथना, बटन, हुक, चेन, आदि लगाना खोलना। 

बाल कविता 20 || बाल गतिविधियॉ || हिन्दी कविता


Pre Child Education (प्री चाईल्ड एजुकेशन ) चैनल के माध्यम से बच्चों ( प्री प्रायमरी और प्रायमरी ) को क्रियात्मक गतिविधि आधारित शिक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रहे है। जो बच्चो के मानसिक विकास में सहायक होगी। इस के अलावा बच्चों को कक्षा के अन्य विषय भाषा, अंक ज्ञान, क्रियात्मक, रचनात्मक, पर्यावरण आदि विषय से  सम्बंधित जानकारियॉ भी प्रदान की जावेगी जो बच्चों के स्कूल शिक्षा में सहायक होगी। बच्चों को इस चैनल पर गतिविधि, बालगीत, बाल साहित्य, कहानियॉ, आदि के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की कोशिश की गई है।

 अन्य वीडियो प्लेलिस्ट -

अन्य सोशल लिंक -

Share:

भाषा एवं साक्षरता पूर्व कौशल Language and literacy skills

भाषा एवं साक्षरता पूर्व कौशल - 

  1. घर की आकृति में रंग करवाएं (घर का चित्र बनवा कर)। 
  2. शरीर के अंगो व आकृति में रंग करवाएं (घर का चित्र बनवा कर)।
  3. कपड़ो की चेन, बटन, हुक, खोलना, बंद करना आदि गतिविधि करवाएं

पहेलियां पूछे - 

  1. बिना मेरे कुछ देख न पाओ, जल्दी मेरा नाम बताओ। (उत्तर - आंख)
  2. सुनने के मैं काम हूॅ आता, अच्छी बाते तुमको सुनाता। (उत्तर - कान)
  3. मुझ से ही तुम साॅस हो लेते अच्छी अच्छी खुषबू पात। (उत्तर - नाक)
  4. मम्मी की मम्मी कहलाती, मुझ पर अपना प्यार लुटाती। (उत्तर - नानी)
  5. रोज कहानी मुझे सुनाती, पापा की वो माॅ कहलाती। (उत्तर - दादी)

Baal kavita 21 // बाल कविता 21 // बाल गतिविधियॉ 


Pre Child Education (प्री चाईल्ड एजुकेशन ) चैनल के माध्यम से बच्चों ( प्री प्रायमरी और प्रायमरी ) को क्रियात्मक गतिविधि आधारित शिक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रहे है। जो बच्चो के मानसिक विकास में सहायक होगी। इस के अलावा बच्चों को कक्षा के अन्य विषय भाषा, अंक ज्ञान, क्रियात्मक, रचनात्मक, पर्यावरण आदि विषय से  सम्बंधित जानकारियॉ भी प्रदान की जावेगी जो बच्चों के स्कूल शिक्षा में सहायक होगी। बच्चों को इस चैनल पर गतिविधि, बालगीत, बाल साहित्य, कहानियॉ, आदि के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की कोशिश की गई है। 

अन्य सोशल लिंक -

अन्य वीडियो प्लेलिस्ट -


Share:

छोटे समूह की गतिविधियाॅ Small group activities

छोटे समूह में गतिविधियां निम्नानुसार करवाएं - 

4 - 5 बच्चों के अलग अलग समूह बनवा कर गतिविधि करवाएं 

  1. बच्चों से अपनी आकृति में रंग भरने की गतिविधि करवाएं। यह गतिविधि दीवार, फर्ष, ड्राइंग शीट या एक्टिविटी वर्क (गतिविधि कार्य पुस्तिका) पर करवाई जा सकती है। 
  2. शरीर के अंगों की पहचान चार्ट/पोस्टर/एक्टिविटी बुक आदि के माध्यम से करवाएं यदि ये उपलब्ध न हो तो शरीर के अंगो की तरफ इशारा करते हुए आंख नाक कान हाथ मुंह, सिर पैर, बाल आदि की पहचान करवाएं।
  3. बच्चों को शौचालय के प्रयोग का अभ्यास नाटक के माध्यम से करवाएं।
  4. हाथ धोने का अभ्यास नाटक के माध्यम से करवाएं। साथ ही नाश्ते एवं खाने के समय भी बच्चों को हाथ धाने का सही तरीका बताते जाएँ ।
  5. शरीर की साफ-सफाई का अभ्यास नाटक के माध्यम से करवाएं।
  6. कपड़ो के बटन करने खोलने की गतिविधि करवाएं।
  7. चेन लगाने खोलने की गतिविधि करवाएं।
  8. हुक लगाने खोलने की गतिविधि करवाएं।
  9. चोटी गुंथने और खोलने की गतिविधि करवाएं।
(बच्चों से कपड़ो के बटन चेन आदि की गतिविधि करवाने के लिए समुदाय एवं अभिभावकों से उनके फटे पुराने कपड़ों से शर्ट, फ्राॅक, ब्लाउज, बटन, आदि की पट्टी, चेन पट्टी, हुक्क पट्टी आदि एकत्र की जा सकती है। चोटी के लिए नकली चोटी चिंदियों आदि से बनाई जा सकती है।)

 नाटक/ड्रामा/नकल (गुड्डा-गुडिया की शादी)

सभी बच्चे मिलकर गुड्डे गुडिया की शादी रचाएंगे।
बच्चे आपस में बात करेंगे कि चलो अपन गुड्डा-गुडिया की शादी करते है।
एक बच्चा या बच्ची कहेगा/कहेगी - मैं गुड्डे गुडिया के लिए दर्जी से कपड़े सिलवाकर लाता/लाती हैॅू।
छूसरा बच्चा/बच्ची कहेगा/कहेगी अच्छा तो मैं उनके बैठने के लिए बढ़ई से सोफा बनाने का बोलकर आता/आती हॅू।
तीसरा बच्चा/बच्ची कहेगा अरे खाने पीने की तैयारी भी तो करनी पडेगी मैं सबके लिए मिठाई बनाने के हलवाई को बोल देती हूॅ।
एक और बच्चा/बच्ची आकर कहेगा अरे सारी तैयारी तो ठीक है पर देखो तो गुड़िया तो ठंड से कांप रही है, कोई और बच्चा कहेगा अरे यह तो बीमार हो गई है। अब क्या करें।
तभी कोई और बच्चा या बच्ची कहेगी इसे जल्दी से डाक्टर को दिखाओ नहीं तो शादी रोकनी पडे़गी। कुछ बच्चे गुड़िया को डाॅक्टर बने बच्चे के पास लेकर जाएंगे। फिर नीचे लिखा गीत गाएंगे।

गीत - 

डाॅक्टर देखो भली प्रकार
डाॅक्टर देखो भली प्रकार
मेरी गुडिया पड़ी बीमार
क्ल था बरसा रिमझिम पानी,
उसमें भीगी गुड़िया रानी,
गीले कपड़े दिए उतार,
फिर भी गुडिया पड़ी बीमार

  • परिवार के सदस्यों की नकल उतारना - 

  1. बच्चों को दूसरो की नकल करने में बड़ा मजा आता है। इसलिए उनके घर के सदस्य उनके मम्मी पापा, दादा दादी, भैया दीदी कैसे खाना खाते है नकल उतारने को कहें।
  2. मम्मी छोटे भैया बहन और आपको सुलाने के लिए कैसे लोरी सुनाती है। नकल उतारने के लिए कहें। साथ ही अभिनय के साथ बच्चों को निम्नानुसार लोरी भी सिखाएं। 

लोरी -

  • सपनों की डोर बंधी, पलको का पालना। 
         सोजा मेंरे लाल, मेरा कहना न टालना।
  • थका हुआ है मुन्ना भैया, चिंता करती उसकी मैया।
          धीरे-धीरे उसे सुलाती, मीठी मीठी लोरी गाती।
  • मीनू प्यारी गुडिया है, प्यारी उसकी मैया है। 
 मैया गीत सुनाती है, मीठा दूध पिलाती है।
मीनू कभी न रोती है, चुपके-चुपके सोती है।
मां की गोद है सबसे प्यारी, सारी दुनिया से है न्यारी।
मीनू प्यारी गुड़िया है, प्यारी उसकी मैया है। 

नोट - 

  1. जो बच्चे पहले दिन नकल नहीं उतार पाएं उन्हे दूसरे दिन फिर से मम्मी - पापा, दादा-दादी , दीदी-भैया, आदि की नकल उतारने को कहें। बच्चे दूसरे बच्चों को करता हुआ देख कर सीखते हैं तथा फिर करना चाहते है। यदि बच्चे नहीं फिर भी नहीं कर पाएं तो फिर से किसी की नकल उतार कर बच्चों को बताएँ।
  2. बच्चों से पूछिए आपके पिताजी खाना कैसे खाते हैं खा कर बताओं। फिर मम्मी कैसी खाती है। ऐसे ही बारी-बारी से परिवार के सदस्यों की नकल उतारने को कहें। फिर बच्चे से कहें कि आप कैसे खाना खाते हैं खा कर बताओं। 
  3. दीदी कैसे पढ़ाई करती है। भैया कैसे पढ़ता है आदि-आदि। 
  4. आंगनवाडी कार्यकर्ता, स्कूल शिक्षक/शिक्षिका तथा सहायिका की नकल करने के लिए भी बच्चों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 
  5. ड्रामा घर की सफाई कैसे होती है? कर के बताएँ। झाडू कैसे लगाते है, बर्तन कैसे मांजते है, कपडे कैसे धोते है। सामान कैसे जमाते है, करके बताएँ

दादी माॅ कहानी का ड्रामा

  • बच्चों में से किसी का दादी माॅ, किसी को सुमित्रा, किसी को पंकज तथा किसी को परिवार के अन्य सदस्य बना कर दादी माॅ कहानी का ड्रामा करवाये। 
अंग्रेजी के शब्दों का मौखिक ज्ञान - बच्चों को बताएँ कि अंग्रेजी में माॅ को क्या कहते है, पिताजी को क्या कहते है आदि आदि।
  1. मम्मी (माॅ)
  2. पापा (पिताजी)
  3. अंकल (चाचा, ताऊ, मामा, फूफा)
  4. आँटी (चाचाी, ताई, मामी, बुआ)
  5. ब्रदर (भाई)
  6. सिस्टर (बहिन)
  7. हेण्ड (हाथ)
  8. आईज (आॅखे)
  9. नोज (नाक)
  10. ईअर (कान)
  11. माउथ (मुॅह)
  12. हेयर (बाल)
  13. लेग्स (टाॅगे)
  14. बेड (पलंग)
  15. टीचर (गुरूजी/षिक्षक/मास्टर)
  16. मेड़म (शिक्षिका, आंगनवाड़ी की दीदी)
  17. टेबल (मेज)
  18. चेयर (कुर्सी)

Share:

बड़े समूह की गतिविधियां Group Activities

  • बातचीत - 

  1. मैं और मेरा परिवार
  2. बच्चों से पूछे - 
  3. ‘‘आपका नाम क्या है?
  4. ‘‘आपके परिवार में कौन-कौन है?
  5. बच्चें बताएंगे, ‘‘मां पिताजी, भैया, दीदी।

 फिर पूछें - 

  1. ‘‘मां आपके लिए कया करती है?‘‘
  2. ‘‘पिताजी आपके लिए क्या करते है?‘‘
  3. ‘‘घर के अन्य सदस्य आपके लिए क्या-क्या हैं?‘‘
  4. ‘‘आप अपने घर के लोगों के लिए क्या-क्या करते है?‘‘
  5. ‘‘घर में दादा-दादी हो तो आप उनकी मदद करते हैं? क्या-क्या करते है? कैसे करते हैं।‘‘ आदि पूछ सकते हैं।
  6. इसी तरह बच्चों से परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में भी बातचीत की जा सकती है। जैसे - चाचा-चाची, बुआ, मौसी, मामा-मम्मी, नाना-नानी आदि।  

घर के प्रकार और घर के कमरे 

बच्चों से पूछें -
‘‘आप कहां रहते है।‘‘ बच्चे कहेंगे घर में।
फिर पूछें ‘‘ आपका घर कैसा है? कच्चा या पक्का?
‘‘घर में कौन‘-कौन से कमरे होते हैं?
बच्चे न बता पाएं तो पूछें ‘‘बच्चों से पूछे खाना कहाॅ बनता हैं?
‘‘नहाते कहां पर है?‘‘
बच्चे न बता पाएं तो पूछें ‘‘बच्चों से पूछे खाना कहां बनता है?
‘‘नहाते कहां पर हैं?‘‘
‘‘षौच कहां जाते है?‘‘ कुछ बच्चे कह सकते है कि हमारे घर में तो शौच स्थान अलग से नहीं है तो उन्हें बताएं कि जिनके घर में शौचालय नहीं होता वे खेत में शौच जाते हैं?

 घर का सामान 

बच्चों से पूछे -
‘‘आपके घर में क्या-क्या सामान हैं?
बच्चे बता सकते हैं। बर्तन, पलंग, पंखा, कुर्सी टेबल, अलमारी, सोफा, गैस चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा, मटका, आदि।
फिर बच्चों से बारी-बारी से पूछें कि बर्तन किस काम आते हैं?, पलंग का कया करते है?
ऐसे ही सभी वस्तुओं के उपयोग के बारे में बातचीत करें।
हो सकता है कि कुछ बच्चे कहें कि हमारे घर में तो सोफा या ऐसी सामान नही तो उन्हें बताएं कि लोगों के घर में अलग-अलग सामान भी होता है।

हमारी स्कूल, झूलाघर, आंगनवाड़ी

बच्चों को बतायें कि आपके आंगनवाड़ी केन्द्र का नाम क्या है?
वहां का पता क्या है?
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक/शिक्षिका का नाम क्या है?
बच्चे आंगनवाड़ी में क्यों आते हैं?
उन्हें बतायें कि यहां पर उन्हे कहानी, कविता, खेल, ड्राइंग, पेंटिंग सिखाई जाती है।
उन्हें अच्छी-अच्छी बातें बताई जाती है।
यहां पर उन्हें उनके दोस्त और सहेलियां मिलती हैं।
यहां पर गाना और नृत्य भी सिखाते हैं।
आंगनबाडी, स्कूल, झूलाघर में आकर हमें अपनी शिक्षक/शिक्षिका को नमस्ते करनी चाहिये। उनका कहना मानना चाहिये।
सभी चीजों से सभी बच्चों को मिल जुलकर बारी-बारी से खेलना चाहिये।
कभी भी दूसरे बच्चों से झगड़ा नहीं करना चाहिये।
आंगनवाड़ी को गंदा नहीं करना चाहियें।
जो चीज जहां से उठायें खेलने के बाद वहीं रखना चाहिये। कोई भी चीज तोड़ना नहीं चाहिये।
अपने दोस्तों और सहेलियों की मदद करनी चाहिये।
यदि कोई बाहर के लोग स्कूल, झूलाघर, आंगनवाड़ी में आये तो उन्हें नमस्ते करना चाहियें।
स्कूल, झूलाघर, आंगनवाड़ी आते और जाते समय सड़क पर ध्यान से चलना चाहिये। शैतानी नहीं करनी चाहियें।
यदि कोई मोटर गाड़ी निकल रही है तो उसके सामने नहीं दौड़ना चाहिये।
हमेशा अच्छे से बात करनी चाहिये।

हमारा शरीर -

बच्चों को उनके शरीर के अंगों के बारे में पूछें -
कार्यकर्ता अपने हाथ बच्चों को दिखा कर पूछे ‘‘ये क्या है?‘‘ बच्चे कहेंगे हाथ। बच्चों से कहें - सभी बच्चे अपने हाथ दिखाओं।
‘‘हाथ कितने होते है।‘‘
‘‘हाथ से हम क्या करते हैं?‘‘
हम चलते किससे से है? - पांवों/पैरों से। हमारे पावं/पैर कितने होते है
आंखों से हम क्या करते हैं। आंख पर हाथ रखकर देखो क्या होता है।
क्या आपको भूख लगती है? फिर आप क्या करते है?
खाना कहां से खाते हैं।
आपके दांत कहां हैं?
अच्छे खाने की खुशबू कहां से आती है?
आपको आवाज कहां से सुनाई देती है?
सिर कहां है?
बाल कहां है?
आप कंघी कैसेे करते हो?
आदि बातचीत बच्चों से की जा सकती है।

  • शौच के लिए शौचालय का प्रयोग 

बच्चों से पूछे शौच कब जाते हैं। बच्चे कह सकते हैं सुबह कुछ बच्चे कह सकते हैं, जब इच्छा होती है तब जाते है।
  1. बच्चों को बताएं कि रोज सुबह उठने के बाद शौच जाना चाहिए। 
  2. बच्चों से पूछें शौच कहां जाते है? कुछ बच्चे कह सकते हैं कि खेत में/सड़क के किनारे/लेट्रिन या शौचलय में। 
  3. बच्चों को बताएं कि शौच के लिए हमेषा शौचालय (लेट्रिन) में ही जाना चाहिए। 
  4. खुले में शौच कभी भी नहीं जाना चाहिए। 
  5. बच्चों से पूछें कि आपको पता है खुले में शौच क्यों नहीं जाना चाहिए? संभवतः बच्चे कहेंगे नहीं।
बच्चों से पूछें कि आपने मक्खी देखी है। ज्यादातर बच्चें कहेंगे हाॅ। फिर उनसे पूछें कि वह कहां बैठती हैं, बच्चे कह सकते हैं, गंदी चीजों पर/ खाने की चीजों पर/मीठी चीजों पर आदि। बच्चों से पूछें आपने मक्खी को शौच पर बैठे देखा है। बच्चे कह सकते हैं हाॅ। यदि नहीं कहें तो उनसे पूछे यदि आप खुले में शौच जाते हैं तो मक्खी आती है। बच्चे कहेंगें हाॅ। फिर वह आपके शौच पर बैठती हैं कि नहीं बच्चे कहेंगे हाॅ।
फिर बच्चों को बताएं मक्खी जब शौच पर बैठती है तो उसके पैरों में मल (गंदगी) लग जाती है। फिर मक्खी वहां से जाकर आपके खाने की चीजों पर बैठ जाती है तो उसके पैरों की गंदगी खाने की चीज पर लग जाती है, और यदि हमव ह खाना खा लेते हैं तो गंदगी हमारे मुंह में चली जाती है। बच्चों को अभिनय के माध्यमसे छी-छी कितनी गंदी बात है न। इससे हम बीमार पड़ जाते हैं। इसलिए हमें हमेंषा शौच के लिए शौचालय में ही जाना चाहिए। यदि किसी के घर या गांव में शौचालय नहीं हो और मजबूरी में खुले में शौच जाना हो तो शौच पर बहुत सी मिट्टी डालकर ढंक देना चाहिए ताकि उस पर मक्खी न बैठे।
इसी तरह पेषाब पर बैठन के बाद भी मक्खी खाने के चीजों पर बैठती है तो खाने की चीजें खराब हो जाती हैं। इसलिए पेषाब भी हमेंषा पेषाब के लिए बने स्थान पर करना चाहिए तथा उसके बाद पानी डालना चाहिए।
स्कूल, झूलाघर, आंगनवाड़ी में भी भवन में बने शौचालय/मूत्रालय का ही उपयोग बच्चों को करना चाहिए।

  • हाथ धोना - 

  1. सभी बच्चों को पोषण आहार खिलाने से पहले रोजाना लाइन लगाकर हाथ धुलवाए जाने चाहिए। साफ कपड़े से हाथ पांेछने के बाद लाइन से बैठा कर भोजन परोंसें। परोसने के बाद बच्चों को हाथ जोड़कर, आँख बंद करके प्रार्थना करवाएं। 
  2. बच्चों से पूछें जब आंगनवाडी में भोजन करते हों तो उससे पहले क्या करते हैं। बच्चे कह सकते हैं, प्रार्थना करते है, फिर पूछे उससे पहले क्या करते हैं? बच्चे कह सकते हैं, हाथ धोते है। 
  3. यदि बच्चे नहीं बता पाएं तो आप बताएं कि हाथ धोते है। फिर बच्चों से पूछें हाथ क्यों धोते हैं? बच्चों को बताएं हाथों पर धूल मिट्टी लग जाती है, जो हाथ धोने से साफ हो जाती है।  
  4. बच्चों को बताएं जब हम कहीं बाहर से खेल कर, घूम कर या स्कूल आंगनवाड़ी से घर जाते हैं तो हाथ-पैर धोना चाहिए। 
  5. जब हम लेट्रिन होकर आते हैं तो हमें साबन या राख से अच्छे से हाथ धोने चाहिए। नाखूनों को भी अच्छे से साफ करना चाहिए, नही तो उनमें गंदगी रह जाती है। 
  6. कुछ अच्चे अपनी नाक में उंगली डालते हैं यह गंदी बात होती है यदि हमारा हाथ नाक में चला जाए तो उसे धोना चाहिए। 
  7. जब हमें जुकाम लगता है तो नाक बहती है। उसे साफ करने के बाद भी हाथ धोना चाहिए। कुद बच्चे अपनी बांह से नाक साफ करते हैें। यह गंदी आदत होती है। हमें अपने साथ साफ रूमाल या कपड़ा रखना चाहिए। उससे ही नाक पोंछनी चाहिए। 

  • शरीर की साफ-सफाई - 

बच्चों को किसी नहाते हुए व्यक्ति की तस्वीर, कैलेण्डर या चार्ट दिखाकर पूछें इस तस्वीर मेें क्या दिख रहा है। बच्चों के अलग-अलग जवाब हो सकते हैं। पूछें तस्वीर में बच्चा या आदमी कया कर रहा है बच्चे कह सकते हैं नहा रहा है। फिर बच्चों से पूछें नहाना अच्दी बात है कि नहीं। बच्चे कहेंगे हाॅ। कोई बच्चा किसी दूसरे बच्चे के बारे में कह सकता है कि वह नहीं नहाता। बच्चों से पूछे-नहाने से क्या होता है, फिर बच्चों को नहाने के फायदे बताएं। नहाने से हमारे शरीर की मैल निकल जाती है। हमारे शरीर में फुर्ती आ जाती है। हमें रोज नहाना चाहिए। नहाते समय सभी अंगो की अच्छे से सफाई करनी चाहिए। नहाने के बाद साफ तौलिये या कपड़े से शरीर को पोंछना चाहिए। फिर साफ कपड़े पहनने चाहिए। कुछ बच्चे नहाने में रोते हैं। उन्हें बहादुर बनना चाहिए, नहाते समय रोना नहीं चाहिए। साबुन लगाते समय आंखे बंद कर लेना चाहिए ताकि आंख में साबुन न पहुंचे। सिर धोने के बाद बालों को भी अच्छी तरह से पोंछना चाहिए।

कहानी - 

1. कहाॅ बनाऊं अपना घर 

रेलगाड़ी का एक इंजन था। एक दिन एक चिड़िया आई और उस पर अपना घोंसला बनाने लगी। इंजन बोला - चिड़िया तुम अपना घोंसला यहां मत बनाओं। मैं बहुत तेज दौड़ता हॅू और मेंरे भीतर आग जलती है। तुम्हारा घोंसला उड़ जाएगा और तुम जल जाओगी। तुम अपना घोंसला कहीं और बना लो।
चिडिया बस के पास गई और छत पर अपना घोंसला बनाने लगी। बस बोली चिड़िया तुम अपना घोंसला यहां मत बनाओं। लोग छत पर सामान रखते हैं। तुम्हारा घोंसला दब जाएगा। ऐसा करो तु तांगे के ऊपर अपना घोंसला बना लो।
चिड़िया तांगे के पास गई। और उस पर अपना घोंसला बनाने लगी। तांगा बोला चिडिया चिड़िया। जब घोड़ा दौडता है तो मैं बहुत हिलता हॅू। तुम्हारा घोंसला गिर जाएगा। तुम पिंकी की साइकिल पे अपना घर बना लो।
चिडिया पिंकी की साइकिल पर अपना घोंसला बनाने लगी। साइकिल बोली, ‘‘चिड़िया चिडिया तुम अपना घोंसला कहीं ओर बना लो। पिंकी मुझे बहुत तेज चलाती है। और बच्चें भी मुझे छेड़ते रहते हैं। बच्चे तुम्हारा घेांसला तोड़ देंगे।
‘‘तो फिर में अपना घोंसला कहां बनाऊं?‘‘ चिड़िया ने पूछा। साइकिल बोली, तुम अपना घोंसला पेड़ पर क्यों नहीं बनाती? चिड़िया को यह बात अच्छा लगा, चिड़िया पेड़ की ओर उड़ गई। और उसने अपना घोंसला पेड़ पर बना लिया।

2. राजू 

एक था राजू। वह बहुत गंदा रहता था। उसके माता पिता, भाई बहन, दादा दादी सभी उसे बहुत प्यार करते थे। सभी उसे बहुत समझाते थे बेटा गंदे रहना अच्दी बात नही होती। पर राजू है कि किसी की मान्यता ही नहीं था। नहाने के नाम पर रोने लगता कोई न कोई बहाना बना देता। राजू के पास बहुत से खिलौने थे। वह उनसे रोज खेलता था। वह अपने हाथ-पैर धोए बिना ही खेलने लगता। खिलौनों में एक बड़ा गुड्डा था। उसने दूसरे खिलौनों से कहा कि राजू बहुत गंदा रहता है। अब हम उसके साथ नहीं खेलेंगे। सबने मिलकर कहा - हाॅ हाॅ अब हम उसके साथ नहीं खेलेंगे।
छूसरे दिन जब राजू खेलने आया तो रेल ने चलना बंद कर दिया। भालू ने नाचना बंद कर दिया। बंदर ने ढपली बजाना बंद कर दिया। उसका बस्ता भी इधर उधर बिखरा पड़ा था। वह भी उससे बात नहीं कर रहा था। राजू यह सब देखकर उदास हो गया। वह एक कोने में जाकर बैठ गया। उसी कोने में एक बाबाजी की मूर्ति थी। उसने राजू को आवाज दी। राजू इधर-उधर देखने लगा। वह खुष हो गया कि उसके खिलौनों ने उसे आवाज दी। परंतु राजू ने देखा तो वे सब तो वैसे ही बैठे थे। उसने फिर इधर-उधर देखा तो बाबाजी ने उसे अपने पास बुलाया। बाबा जी ने पूछा राजू तुम उदास क्यों हो। राजू ने कहा मेंरे खिलौने आज मेंरे साथ खेल नही रहे है। इसलिए मैं उदास हॅू। बाबा जी ने कहा - खिलौने तुमसे नाराज हैं इसलिए बात नहीं कर रहे हैं। राजू ने पूछा - क्यों नाराज हैं। बाबा जी ने कहा - तुम गंदे रहते हो इसलिए सब तुमसे नाराज है। तुम चाहो तो साफ और अच्छे रह सकते हों।  देखो तुम्हारे स्कूल, झूलाघर और आंगनवाड़ी का टाइम हो गया है। और तुमने अभी तक नहाया भी नहीं है। तुम चाहो तो जल्दी से उठकर नहा लो फिर अपने खिलौनों से भी खेल सकते हो। इतना सुनकर झट से राजू अपनी मां के पास गया और बोला - माॅ माॅ मुझे जल्दी से नहला दो। राजू झटपट नहा धोकर तैयार होकर खिलौनों के पास पहुॅचा। राजू ने देखा कि सब खुषी से उसका स्वागत कर रहे है। बंदर मामा ढपली बजा रहे है। रेलगाड़ी छुक छुक कर चल रही है। भालू गुड़िया टोनी आदि खिलौने भी नाच गा रहे हैं। राजू खुष हो गया उसने खिलौनो से कहा - ‘‘ अभी मेरा स्कूल/झूलाघर/आंगनवाड़ी जाने का टाइम हो गया है। मैं स्कूल/झूलाघर/आंगनवाड़ी से लौट कर खेलूंगा। तबसे राजू रोज नहाने लगा।
3. दादी मां रात हो गई पंकज ने अपनी बहन सुमित्रा से कहा, चलो दादा से कहानी सुनते है। सुमित्रा बोली हाॅ भैया चलो कहानी सुनते है।
दोनों दादी के कमरे में गए। पर ये क्या वहाॅ दादी तो थी ही नहीं। सुमित्रा बोली -‘‘ भैया दादी कहाॅ गई?‘‘ दोनो ने पूरे घर में ढूंढा। पर दादी नहीं मिली। दोनो बहन-भाई मां के पास गए और पूछा- माॅ, माॅ दादी कहाॅ गई हैं?‘‘ मां बोली, अपने पिताजी से पूछो। दोनो बहन भाई पिताजी के पास गए - पिताजी पिताजी दादी कहाॅ है?‘‘ पिता जी ने कहा - ‘‘मुझे तो पता नही अपनी चाची से पूछो। बच्चों ने चाची से पूछा चाची ने कहा - ‘‘अपने चाचा से पूछो मुझे तो पता नहीं दादी कहाॅ गई हैं?‘‘ बच्चों ने अपने चाचा से पूछा चाचाजी आपको पता है क्या दादी कहाॅ गई है? चाचा ने बताया - ‘‘दादी आज आप दोनों से गुस्सा है।‘‘ नन्ही सुमित्रा ने कहा - नहीं दादी हमसे गुस्सा नहीं है? आप बताओं न दादी कहां है?‘‘ चाचा ने कहा दादी आपसे सच मे गुस्सा है। पंकज ने पूछा, ‘‘क्यों चाचा ने कहा - तुमने आज दादी का कहना जो नहीं माना।
पंकज ने इठला कर कहा - ‘‘कब नहीं माना?‘‘
चाचा ने कहा - ‘‘ तुमने आज नन्हीं चिड़िया का घोंसला तोड़ था न। इसलिए दादी नाराज है। यह सुनकर दानों बच्चे थोड़ी देर सोचते रहे फिर दोनों ने तय किया कि वे अपनी दादी को मनाएंगे। उन्होंने चाचा से पूछा - ‘‘चाचा दादी कहाॅ है हमें बता दो न। हम उन्हें मना लेंगे।‘‘ चाचा ने बताया दादी दादा जी के कमरे में है। दोनों भागे-भागे वहाॅ पहॅुचे। देखा दादी गुमसुम बैठी है। दोनो से एक साथ पुकारा ‘‘दादी दादी हमसे गुस्सा हो क्या?‘‘ दादी ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर बच्चों ने कहा‘‘
हम अपने कान पकड़ते हैं हमें माफ कर दो।‘‘ दादी फिर भी नहीं बोली। बच्चों ने कहा ‘‘अच्छा हम चिड़िया का घेांसला बना देंगें फिर तो आप मान जाओगी। दादी मुस्कुराई तुम लोग कैसे बना दोगे बताओं तो भला। बच्चे थोड़ी देर सोचते रहे -‘‘ अच्छा हम अब कभी भी कोई भी घोंसला नही तोडेंगे।‘‘
दादी ने पूछा ‘‘प्राॅमिस करते हो।‘‘ (वादा करते हो) बच्चों ने कहा सच्ची प्राॅमिस। और पंकज उछल कर दादी की गोद में बैठ गया और सुमित्रा दादी से लिपट गई।

कविताएँ -

1. ये हैं मेरे अच्छे पापा ये है मेरी प्यारी माॅ।
ये हैं मेरे अच्छे पापा, ये है मेरी प्यारी माॅ।
ये है भैया लंबा वाला, ये है बहना गाती ला ला ऽऽऽऽ।
ये है मेरा छोटा भैया, नाचें गाएं ता ता थैय्या।।
नोट - कविता को फिंगर पपेट (उंगली वाली कठपुतली), या बच्चों को मम्मी, पापा, भैया, बहन बना कर करवाया जा सकता है। कविता को बच्चों को बार-बार दोहरा कर बताएॅ।
2. लाला ने लोरी देके सुलावा छैः
लाला ने लोरी देके सुलावा छैः
लाला फुदक-फुदक कर रोवे छैः।
झूला-डाल सुलावा छैः।
मलवा को भात घणों मीठो,
लाला को खिलावा छैः।
छाछ में डाल खिलावा छैः।
साथ मे हम भी खावा छैः।
लाला चैन से निंदिया लेवे छैः।
लाला ने लोरी देके सुलावा छैः।

Share:

13 स्कूल, झूलाघर, आंगनवाड़ी केन्द्र पर प्रतिमाह ‘‘बाल चैपाल‘‘ का आयोजन

उद्देश्य -

  • माता पिता व समुदाय को बच्चों के विकास के लिए संवेदनशील बनाना तथा उन्हें बच्चों की वृद्धि निगरानी में जोड़ना। 
  • माता पिता व समुदाय की बच्चों के विकास को लेकर निम्न विषयों पर सामान्य जानकारी बढ़ाना - 
  1. बच्चों में उम्र अनुसार होने वाली वृद्धि एवं विकास के सूचकांक
  2. शुरूआती वर्षो में बच्चों की देखभाल
  3. अनौपचारिक खेल एवं गतिविधियों के द्वारा प्री प्रायमरी शिक्षा की विधियां। 
  • माता-पिता को उनके बच्चे की बढ़त, विकास एवं सीखने की स्थिति को नियमित रूप से बताना एवं उनकी काउंसलिंग (परामर्श देना) करना। 
  • माता पिता व समुदाय का आंगनवाडी केन्द्र के विकास में सक्रिय भागीदारी के लिए अवसर पैदा करना। 
  • आंगनवाडी में दी जाने वाली प्री प्रायमरी शिक्षा (शाला पूर्व शिक्षा) को बढ़ावा देना। 

प्रक्रिया -

  1. प्रतिमाह की 25 तारीख को प्रत्येक स्कूल, संस्थाओ, एवं आंगनवाडी केन्द्र ‘‘बाल चैपाल‘‘ मनाएगा। यदि यह दिन मंगलवार, टीकाकरण दिवस या छुट्टी के दिन होगा तो यह आयोजन एक दिन पहले किया जाएगा। 
  2. यह आयेाजन सामान्यतः आंगनवाडी केन्द्र पर ही किया जाए, जगह की कमी है तो इसे स्कूल परिसर में किया जाएगा। आयोजन के लिए स्थान का चयन करते समय निम्न बिन्दु ध्यान में रखे जाएं -
  • खुला स्थान या कक्ष - बच्चों के द्वारा तैयार की गई सामग्री के प्रदर्षन के लिए। 
  • मंच जैसा ऊंचा स्थान - बच्चों के द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली गतिविधियों के लिए। 
  • खुला स्थान - बच्चों की दौड़, माता-पिता की गतिविधियों के लिए। 
  • खुला स्थान या कक्ष - माता-पिता से परिचर्चा एवं बच्चों के विकास संबंधी मुद्दो पर चर्चा के लिए।
  • प्रत्येक माह की थीम पर आधारित गतिविधियाॅ की जाएॅगी। 
  • ‘‘बाल चैपाल‘‘ पर अभिभावकों से निम्न बिंदुओं पर समय-समय पर चर्चा की जाएगी। 
  1. शिशु देखभाल की आवश्यकता तथा प्री प्रायमरी पढाई का महत्व। 
  2. प्रारंभिक वर्षो में वृद्धि विकास के चरण (माइलस्टोन), विकास में देरी तथा विशेष आवश्यकता के प्रारंभिक लक्षण। 
  3. घर में देखभाल के दौरान बच्चों को शुरूआती प्रोत्साहन एवं प्रेरणा। 
  4. खेल का महत्व अच्छी आदतों का विकास, स्कूल जाने की तैयारी। 
  5. शिशु शिक्षा एवं देखभाल में अभिभावकों एवं समुदाय की भूमिका। 

‘‘बाल चैपाल‘‘ दिवस पर की जाने वाली कार्यवाही - 

  1. चयनित गतिविधि अनुसार बच्चों द्वारा बनाए गए चित्र माॅडल आदि उनके नाम के साथ माता - पिता के देखने के लिए प्रदर्शित करना। 
  2. चयनित परिचर्चा बिन्दु से संबंधित पोस्टर, षिक्षण सामग्री, संचार सामग्री प्रदर्शित करना। 
  3. जहाॅ टी.वी./ प्रोजेक्टर आदि की व्यवस्था हो सकती है - विषयवस्तु से संबंधित फिल्में दिखाना। 
  4. माता-पिता के साथ गतिविधि करना जिससे वह अपनी सहभागिता को लेकर उत्साहित हों। 
  5. ‘‘अटल बाल मित्र‘‘ का सम्मान करना, उन्हें बच्चों के द्वारा तैयार किया गया धन्यवाद पत्र व चित्र भेंट करना। 
  6. मता-पिता को बच्चों के प्रगति-पत्र एवं गतिविधि पुस्तिका के साथ उनके विकास की जानकारी देना, उनकी काउंसलिंग करना। काउंसलिंग से अभिप्राय - सभी बच्चे एक दूसरे से भिन्न होते है, तथा उनकी अलग-अलग आदतें होती है। कई बार माता-पिता किन्हीं बिन्दुओं पर जानकारी चाहतें है, जिसे वह सबके सामने नहीं पूछ सकते। इसके लिए व्यक्तिगत काउंसलिंग देनी चाहिए, जिससे माता-पिता अपने बच्चों को वह वातावरण दे सकें। साथ ही बच्चे प्रगति के बारे में सभी के सामने बताने में असहज महसूस कर सकते है तथा उनमें हीन भावना आ सकती है।
  7. ‘‘बाल चैपाल‘‘ आयोजन की समयावधि - यह कार्यक्रम 2 - 3 घंटे का होगा। इस कार्यक्रम का समय दोपहर 12 से 3 बजे के मध्य रखने का प्रयास किया जाएगा, जिसमें विषयवार निम्नानुसार समय बांटा जा सकता है तथापि आवष्यकता अनुसार गतिविधियों के समय को कम या ज्यादा किया जा सकेगा।
  1. बच्चों की गतिविधियों के लिए आधा घंटा।
  2. अभिभावकों के लिए आधा घंटा।
  3. चर्चा के लिए आधा घंटा।
  4. बच्चों के विषय में माता-पिता से व्यक्तिगत काउंसलिंग के लिए डेढ़ घंटा।

‘‘बाल चैपाल‘‘ के आयोजन के सहभागी - 

  1. आंगनवाडी कार्यकर्ता, आंगनवाडी सहायिका, झूलाघर कार्यकर्ता, अतिरिक्त आंगनवाडी कार्यकर्ता, उप आंगनवाडी केन्द्र की कार्यकर्ता (यदि वह आंगनवाड़ी केन्द्र पर कार्य कर रही है) ई.सी.सी.ई, प्री प्रायमरी शिक्षक - शिक्षिका यदि संबंधित आंगनवाडी के क्षेत्र में कोई हो तो। 
  2. किशोरी बालिका/सबला, सखी सहेली इस कार्यक्रम के आयोजन में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की सहायता करेगी। 
  3. ग्राम स्वास्थ्य तदर्थ समिति के सदस्य, स्वास्थ्य कार्यकर्ता ए.एन.एम, एल.एच.वी., आशा कार्यकर्ता। 
  4. पंचायती राज संस्था, ग्राम शिक्षा समिति, मातृ सहयोगिनी समिति। 
  5. संबंधित क्षेत्र में काम करने वाली स्थानीय संस्थाएं/ प्राथमिक शाला के शिक्षक, पालक शिक्षक संघ के सदस्य।
  6. माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, वरिष्ठ नागरिक आदि। 
  7. क्षेत्रीय ‘अटल बाल मित्र‘, स्थानीय कारीगर, शिल्पकार एवं स्थानीय कलाकार समुदाय के गणामन्य व्यक्ति। 
  8. महिला मण्डल के पदाधिकारी, यूथ क्लब नेहरू युवक केन्द्र के पदाधिकारी। 
  • समुदाय एवं माता-पिता के साथ आंगनवाड़ी केन्द्र में विभिन्न संसाधन जैसे खेलकूद का सामान बर्तन, दरी, रंगीन, पेन आदि जन सहयोग से जुटाया जा सकता है। अटल बाल मित्र से इसके लिए विशेष सथानीय तौर पर अन्य को प्रेरणा देने के लिए कहा जाएगा। इस सहयोग की जानकारी स्टाक पंजी में पृथक जन सहयोग मद में रखी जाएगी। इसका प्रारूप् निम्नानुसार रहेगा। 
  दिनांक -  समग्री का नाम  -  मात्रा/संख्या  - प्रदायकर्ता टिप्पणी

  • ‘‘भागीदारी पुरस्कार‘‘ आयोजन मे भाग लेने वाले सभी बच्चों को प्रोत्साहन स्वरूप् कुछ न कुछ पुरस्कार समुदाय द्वारा वितरित किए जाएगें।

परिणाम - 

इन दिशा—निदेर्शो के अनुरूप नियमित रूप से प्रतिमाह ‘‘बाल चैपाल‘‘ आयेाजित करने के निम्न सार्थक परिणाम आएंगे। इन्हें निम्नानुसार मापा जा सकेगा -
क्रमांक -  आधार बिन्दु                                  मापदण्ड
1 समुदाय में शाला पूर्व षिक्षा का महत्व।                 आंगनवाड़ी में बच्चों के नामांकन में बढ़त।
2 गतिविधि आधारित षिक्षा की समझ।                   बच्चों की नियमित उपस्थिति में बढ़त।
3 आयु अनुरूप विकास की समझ।                       स्थानीय एवं सस्ती सामग्री का अधिक से अधिक प्रयोग।
4 समुदाय की सक्रिय भागीदारी।                         जनसहयोग की मात्रा।
5 माता-पिता की सक्रिय भागीदारी।                 बाल-चैपाल में उपस्थिति एवं भागीदारी।

10. बाल-चैपाल की विषय वस्तु एवं सुझाावात्मक गतिविधियाॅ - 

  1. प्रत्येक बाल-चैपाल की एक थीम होगी, जिसे प्रत्येक माह की 25 तारीख को बड़े धूमधाम एवं साझेदारी के साथ मनाया जाएगा। प्रत्येक बाल चैपाल में निम्न बिन्दु आवष्यक रूप से जोड़े जाएॅगे - 
क्र              गतिविधि                           सुझावात्मक बिन्दु
1 आंगनवाड़ी केन्द्रो पर प्रदर्शन।                 बच्चों के चित्र, माॅडल आदि, इसके अतिरिक्त परिचर्चा बिन्दु से संबंधित पोस्टर।
2 बालकेन्द्रित गतिविधियां। दौड़, खेल, नाटक, ड्रामा, गीत, कहानी, कविता, आदि।
3 माता-पिता केन्द्रित गतिविधियां। रंगोली प्रतियोगिता, खेल-कूद प्रतियोगिता, प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता आदि।
4 परिचर्चा।                                    विषय-विशेषज्ञनों से बच्चों के विकास से संबंधित।
5 व्यक्तिगत चर्चा।              माता-पिता को बच्चों की प्रगति एवं उनसे संबंधित बिन्दुओं पर समझाइश।
6 जन्मदिन।                   उस माह में जन्में बच्चों का सामूहिक जन्म दिन मनाना।
7 शिशु विकास कार्ड।          
                         पलकों (माता-पिता एवं अभिभावक) से आयु वर्ग विशेष पर फोकस कर चर्चा।
8 शिशु शिक्षा जुड़ी गतिविधियां। शिशु शिक्षा जुड़ी गतिविधियों की सघन निगरानी। 

Share:

12 शिशु विकास कार्ड की आवश्यकताएवं संधारण करने का तरीका -

  • बच्चों को खेल-खेल में शाला पूर्व शिक्षा के माध्यम से उचित विकास के लिए वातावरण बनाने के बाद अब जरूरी है कि उनके क्रमिक विकास की नियमित रूप से निगरानी की जाएं। इससे हर बच्चे के विकास की क्रमिक जानकारी उपलब्ध हो सकेगी तथा अभिभावकों को बच्चे के विकास से अवगत कराया जा सकेगा। 
  • तीनों आयु समूह के बच्चों को लिए शिशु विकास कार्ड तैयार किए गए हैं। जो आपको प्रत्येक बच्चे के लिए अलग से उपलब्ध कराए जा रहे है ।
  • शिशु विकास कार्ड भरने के प्रक्रिया - 
शिशु विकास कार्ड बच्चों के द्वारा की जाने वाली गतिविधियों को ध्यान में रख कर भरा जाएगा। बच्चों को खेलते हुए देख कर उसका अवलोकन करें कि शिशु विकास कार्ड अनुसार बच्चा गतिविधियां कर पा रहा है या नहीं। माह में जब भी आपको लगता है कि बच्चा  गतिविधि काॅलम में दर्शाए अनुसार गतिविधि कर पा रहा है, उसके नाम के कार्ड में उस माह के आगे निम्न चिन्ह बनाएॅ
  1. गतिविधि कर पाता है -       सही का निशान
  2. मदद से कर पाता है -            +
  3. नहीं कर पाता है -                  =
  • सुविधा के लिए कार्यकर्ता चाहे तो 3 - 4 वर्ष के बच्चों की जानकारी पहला सप्ताह 4 - 5 वर्ष  के बच्चों के लिए दूसरा सप्ताह, तथा 5 - 6 वर्ष के बच्चों के तीसरा सप्ताह निर्धारित कर सकती है।
  • प्रत्येक त्रैमास में बच्चे के बारे में अवलोकन के आधार पर कार्यकर्ता अपनी टीप अंकित करेगी। 

Share:

11 शाला पूर्व शिक्षा के सफल संचालन के लिए अभिभावकों की सहभागिता

शाला पूर्व शिक्षा के सफल संचालन के लिए अभिभावकों की सहभागिता
स्कूल, आंगनवाड़ी केन्द्र पर शाला पूर्व शिक्षा के सफल संचालन के लिए बच्चों के अभिभावकों, समुदाय के लोगों तथा जन प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर उन्हें निम्नानुसार जानकारी दें -
  1. उन्हें बताएं कि आंगनवाडी केन्द्र केवल पोषण आहार वितरण केन्द्र नहीं है। जिस तरह खाना बनाने या खाने के पहले कुछ आवश्यक तैयारियां की जाती है। उसी तरह यहां बच्चों को स्कूल जाने के लिये मानसिक रूप से तैयार किया जाता है तथा लिखने और पढ़ने से पहले की तैयारी करवाई जाती है। साथ ही उनके अंदर अच्छी आदतोें का विकास एवं सामान्य षिष्टाचार भी सिखाया जाता है। इसमें बच्चों के माता-पिता, अभिभावकों तथा आसपास के लोगों का सहयोग एवं सहभागिता आवष्यक है। 
  2. रोजाना आंगनवाड़ी केन्द्र पर सुबह 9 बजे घंटी बजाई जायेगी। सभी 3 - 6 वर्ष के बच्चों के माता -’ पिता एवं अभिभावकों से निवेदन है कि वे बच्चों इससे पहले नहला धुला कर कंघी करके साफ-सफाई के साथ बच्चों को केन्द्र पर भेजें। इससे बच्चों के अंदर अच्छी आदतों का विकास होगा। 
  3. आंगनवाड़ी सहायिका बच्चों को लेने आपके घर आएगी। आप चाहें तो स्वयं भी बच्चों को आंगनवाड़ी केन्द्र पर छोड़ने आ सकते है। 
  4. सभी गर्भवती-धात्री एवं 6 माह से 3 वर्ष के बच्चों के माता - पिता और अभिभावकों तथा किषेारी बाहिकाओं से सनम्र निवेदन है कि वे निर्धारित साप्ताहिक दिवस को दोपहर 1 बजे पोषण आहार प्राप्त करने के लिये आयें।
  5. बच्चों को आंगनवाड़ी केन्द्र आने पर नाश्ता 10ः00 से 10ः30 बजे तक तथा भोजन दोपहर 1 बजे उपलब्ध कराया जाएगा ताकि बच्चों में अनुषासन का विकास किया जा सके। 
  6. बच्चों को खाने का सामान केन्द्र पर उपलब्ध बर्तनों में ही दिया जायेगा अतः बच्चों के साथ बर्तन न भेजे। 

Share:

10 विशेष आवश्यकता वाले बच्चे ( Children with special needs) -

  1. शारीरिक तथा मानसिक रूप से विशेष आवश्यकता वाले बच्चे। 
  2. पहचान। 
  3. यदि कोई बच्चा अपने हम उम्र बच्चों के बराबर बढ़ता हुआ दिखाई न दे तो ओर ध्यान दें। 
  4. बच्चे का जैसे शारीरिक विकास होता है, वैसे ही मानसिक विकास भी होता है। 
  5. शारीरिक विकास एक दम से दिखाई देता है। बच्चे की लंबाई तथा वजन नाप कर भी देखा जा सकता है कि बच्चे का सही विकास हो रहा है या नहीं। किन्तु मानसिक विकास को सीधे-सीधे किसी मशीन से नाप कर नहीं देखा जा सकता। 
  6. दूसरे बच्चों से तुलना कर देखना होगा कि यह बच्चा भी दूसरे बच्चों की तरह अपनी उम्र के अनुसार बातों को समझ पाता है कि नहीं। 
  7. उसके हम उम्र बच्चों की तरह बोल पाता है कि नहीं। सवाल कर पाता है कि नहीं। 
  8. बताए गए काम कर पाता है कि नहीं जैसे - सबको नमस्ते करना। कुछ खाने के लिए कहने पर खाने के लिए कहने पर समझ पाना आदि। 
  9. अपनी बराबरी के बच्चों के साथ खेल पाता है कि नहीं। 
  10. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह रंग पहचान पाता है कि नहीं। 
  11. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह आकार और वस्तुओं को पहचान पाता है कि नहीं।
  12. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह आवाजें पहचानता है कि नहीं। सुनकर जवाब देता है कि नहीं। 
  13. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह सुंदर चीजों को देखकर प्रतिक्रिया करता है कि नहीं। 
  14. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह दूसरे बच्चों के साथ मिलजुल कर खेलता है कि नहीं।
  15. अपनी बराबरी के बच्चों की तरह अपनी आवष्यकताओं के बारे में बताता है कि नहीं जैसे - भूख लगने पर, किसी चीज के अच्छे या बुरे स्वाद के बारे में आदि। 
  16. बच्चे का सही विकास उसके सही खान-पान, तथा समय पर टीकाकरण करवाने से होता है इसलिए उसके खान-पान तथा समय पर टीकाकरण का भी ध्यान रखना चाहिए। 
  17. यदि बच्चे का विकास अपने साथियों की तरह नहीं हो पा रहा हो तो स्थानीय नर्स/चिकित्सक या स्थानीय वैद्य अथवा षिक्षक आदि को दिखाकर शंका का समाधान करें। अपने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराएं। जरूरत हो तो उसका इलाज भी करवाना चाहिए। 


Share:

9 भोजन एवं बच्चों को उनके घर (अभिभावकों) तक पहुॅचाना Food and transporting children to their home (parents)-

भोजन - 

बच्चों को बाहरी गतिविधियों के पश्चात् बताया जाना चाहिए कि अब खाना खाऐंगें। बाहरी गतिविधियों धूल मिट्टी में होती हैं इसलिए सब बच्चों को साबुन से मुंह, हाथ पैर धोकर लाइन से टाटपट्टी पर बैठने के लिए कहें।
बच्चों से पूछे कि आपको पता है। आज खने में क्या आया है। कुछ बच्चे हां तथा कुछ बच्चे नहीं बोल सकते हैं। फिर बच्चों को बताएं कि हां आज हम .......................(खाने में उपलब्ध कराई जाने वाली वस्तुओं का नाम) खाएंगे।
खाने के लिए सब बच्चों को लाइन से बैठाया जाना चाहिए तथा बारी-बारी से सब बच्चों को खाना परोसें। परोसने के बाद बच्चों को हाथ जोड़कर आंख बंद करके प्रार्थना करवाएं।

भोजन से पूर्व प्रार्थना - 

‘‘विनती सुन लो हे भगवान।
अन्न हमें जो दिया है दान।।
स्वास्थ्य हमारा अच्छा हो।
ईष तुम्हारी जय-जयकार।।

सभी बच्चों से आंखे खोलने को कहें, उसके बाद भोजन शुरू करवाएं। यदि हो सके और उपलब्ध हों तो बच्चों को चम्मच से खाने के लिए प्रेरित करें।
खाना खाते हुए बच्चों को बताया जाना चाहिए कि थोड़ी चीज मुंह में रखकर अच्छे से चबा कर खाना खाएं। इससे खाते समय चीज गिरती नहीं हैं, कपड़े भी गंदे नहीं होंगे।
खाना खाने के बाद सभी बच्चों को हाथ धुलवाएं। साफ कपड़े से हाथ पोंछने को कहे।

बच्चों को उनके गंतव्य तक पहुंचाना - 

खाना खाने के बाद बच्चों की छुट्टी की जानी चाहिए। 

  1. बच्चों को स्कूल, आंगनवाड़ी केन्द्र से घर पर पहुंचाने का दायित्व सहायिका का है। 
  2. सभी बच्चों के जूठे बर्तन समेट कर रखने के बाद सहायिका को रोजाना बच्चों केा उनके घर तक सुरक्षित छोड़ने जाना चाहिए। 
  3. स्कूल, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को छुट्टी के समय केन्द्र के द्वारा पर बच्चों बिदा करना चाहिए। बच्चों से कहना चाहिए आप कल भी जरूर आना अपनी नई कहानी और गीत कविताएं सुनेंगे। आज आपने स्कूल, आंगनवाड़ी में जो सीखा उसे जा कर अपने मम्मी-पापा, दादी-दादा, दीदी-भैया को सुनाना। नमस्ते बाय-बाय, टाआ कह कर बच्चों को बिदा करना चाहिए। 
  4. सहायिका को बच्चों को उनके धर छोड़ने जातेे समय भी बच्चों से बडे प्यार और स्नेह से दुलार कर अपने साथ छोड़ने जाना चाहिए। इससे बच्चों को अपने पन का अहसास होता है तथा उन्हें खुषी मिलती है। सहायिका बच्चों को उनके घर छोड़ते समय कहना चाहिए मैं तुम्हें लेने कल भी आऊंगी अच्छे बच्चों की तरह जल्दी से तैयार मिलना। बच्चों से पूछे ठीक है। बच्चे भी ठीक है कहेंगे या सहमति में सिर हिलाएंगे। 
  5. यदि कुछ माता-पिता/अभिभावक बच्चों को स्कूल, आंगनवाड़ी केन्द्र पर खुद लेने आते हैं तो उनके साथ भी बच्चों को बिदा करते समय कार्यकर्ता को बच्चे की तारीफ उनके माता पिता के सामने करनी चाहिए तथा बच्चें से कहना चाहिए कि कल भी समय से आना हम तुम्हारा इंतजार करेंगें।

बच्चों को उनके घर छोड़ के आने के बाद - 

  1. सहायिका को केन्द्र की सामग्री कार्यकर्ता के मार्गदर्शन में व्यवस्थित रख कर केन्द्र की साफ-सफाई करनी चाहिए। 
  2. तत्पश्चात बर्तनों की सफाई करनी चाहिए। 
  3. बच्चों के लिए शौचालय आदि की व्यवस्था हो तो वहां भी पानी तथा फिलाइन आदि डाल कर सफाई की जानी चाहिए। 
  4. कार्यकर्ता को निर्धारित दिवसों के अनुसार पोषण परामर्श, मंगल दिवस, वृद्धि निगरानी, सबला/किशोरी बालिका योजनांतर्गत परामर्श तथा गृह भेंट आदि से संबंधित कार्य करने चाहिए। 
  5. तत्पश्चात अभिलेखोें का संधारण किया जाना चाहिए। 

Share:

8 बाहरी खेल ( Outdoor sports)

बच्चों की बड़ी मांसपेषियों के विकास के लिए मुख्य रूप उछलने कूदने, भागने दौड़ने वाले खेलों की आवश्यकता होती है। इसके लिए खुली जगह की आवष्यकता होती है।

उद्देश्य  - 

  1. बच्चों की बड़ी मांस पेषियों का विकास। 
  2. बच्चों का शारीरिक संतुलन। 
  3. बड़ी और छोटी मांसपेषियों के बीच समन्वय। 

क्रियाएं - 

  1. विभिन्न तरीकों से चलने की गतिविधियां। 
  2. विभिन्न तरीकों की दौड़।
  3. गेंद को ठोकर मारना, उछालना।
  4. किसी वस्तु को धक्का देना, खींचना, खिसकाना। 
  5. किसी वस्तु को लुढ़काना, स्वयं लुढ़काना, उलटना, पलटना। 
  6. साइकिलिंग। 
  7. प्रकृति भ्रमण, क्षेत्रीय भ्रमण। 
  8. बीज बोना/वृक्षारोपण बागवानी। 
  9. पानी के खेल। 
  10. बालू के खेल। आदि। 


Share:

7 रचनात्मक गतिविधियां ( Creative activities) -

बच्चों के अंदर बहुत सी प्रतिभाएं जन्म जात होती है। यदि उन्हें बचपन में मौके मिलते हैं तो वे बड़े होकर इसमें पारंगत हो सकते है। यदि अवसर न मिलें तो ये प्रतिभाएं बच्चों के बचपन के साथ ही दब जाती है। बच्चों को कल्पना शक्ति को कला एवं रचनात्मक क्रिया के माध्यम से अभिव्यक्त करने के अवसर उपलब्ध कराना ही रचनात्मक गतिविधियां है।

उद्देश्य  - 

  1. सृजनात्मक/रचनात्कम कल्पना शक्ति का विकास हो सके। 
  2. कला एवं अन्य क्रियाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित हो सके। 
  3. शारीरिक अंगों का कलात्मक ढंग से संचालन करना सीख सके। 
  4. गीतों को लय ताल के साथ प्रस्तुत कर सके। 
  5. अभिनय क्षमता विकसित हो सके। 
  6. उपलब्ध वस्तुओं से नमूने बना सके। 

क्रियाएं - 

संगीत, लय और ताल के साथ सामूहिक नृत्य, नाटक, कोलाज कार्य, मिट्टी के खिलौने, जानवरों और बगीचे की देखभाल आदि गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में रचनात्मक क्षमता का विकास होता है।
सभी बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों के बाद अपनी-अपनी खेल सामग्री उसके लिए निर्धारित किए गए स्थान पर अपने मार्गदर्शन में रखवाएं। 

Share:

6 भाषा एवं साक्षरता पूर्व कौशल (Language and literacy skills)

मुख्य रूप से भाषा के माध्यम से ही सभी अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते है। आंगनवाड़ी केन्द्र मेें 3 - 6 वर्ष के बच्चों को खेल-खेल में ही शाला पूर्व षिक्षा भी दी जाती है, खेल के माध्यम से बच्चों में भाषा एवं संवाद कौषल विकसित किया जाता है। बच्चों में भाषा एवं साक्षरता पूर्व कौशल विकसित किए जाने के लिए क्रमश:  सरल से कठिन तथा अनौपचारिक से औपचारिक की ओर धीर-धीरे आगे बढ़ना चाहिए ताकि बच्चों की रूचि भी बनी रहे और उसके ऊपर उसकी क्षमता से अधिक बोझ भी न पड़े तथा वे शाला जाने के लिए मानसिक एवं शारीरिक रूप  से तैयार होकर प्राथमिक शाला के नियमित छात्र के रूप में अपना आगे का अध्ययन कर सकें।

शाला पूर्व शिक्षा के आयु समूह - 

स्कूल (प्री प्रायमरी), संस्थाओं, आंगनवाड़ी केन्द्र पर शाला पूर्व शिक्षा के लिए 3 आयु समूह के बच्चे आते है। गतिविधियों का सफलता पूर्वक आयोजन किए जाने के लिए हमें कुछ बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

3 - 4 वर्ष के बच्चें - 

स्कूल (प्ले स्कूल), आंगनवाड़ी केन्द्र पर 3 - 4 वर्ष के बच्चें जब प्रवेश लेते है तो वह पहली बार  अपने परिवार और माता-पिता से दूर होते हैं। इन बच्चों के लिए स्थान, वातावरण, वहां के अधिकांश बच्चे तथा शिक्षिका, कार्यकर्ता/सहायिका, भी बहुत हद तक अपरिचित होते है। शिक्षिका,  कार्यकर्ता/सहायिका को बच्चे को बहुत स्नेह मयी तथा ममत्व भरा वातावरण देकर बच्चे का दिल जीतना आना चाहिए ताकि वह अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें।
शुरू में इन बच्चों को रंग बिरंगे खिलौने, आदि खेलने के लिए देना चाहिए। इन बच्चों के साथ ऐसे बच्चों को खेलने के लिए बैठाना चाहिए जो आपस में हिल मिल कर खेलें। इन बच्चों को शुरू में कभी भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए ताकि बच्चें किसी भी स्थिति में अपने को अकेला तथा असहज महसूस नहीं करें। इन बच्चों के साथ गतिविधियों के लिए सहायिका को संलग्न किया जा सकता है।

4 - 5 बर्ष के बच्चे - 

आम तौर पर यह आयु समूह ऐसा होता है जो स्कूल, आंगनवाड़ी केन्द्र पर आने वाले बच्चों के बीच का समूह है। अर्थात् ये बच्चे स्कूल, आंगनवाडी केन्द्र पर आने के आदि हो गए है। इन बच्चों को स्कूल, आंगनवाडी के अन्य बच्चों के साथ गतिविधियां करने, मिल कर खेलने आदि की आदत हो गई है। अब ये बच्चे आंगनवाड़ी मे अपने आप को सहज महसूस करते है।

5 - 6 वर्ष के बच्चे - 

तीनों आयु समूह में ये सबसे बड़ी आयु के बच्चे हैं, जिन्हें अब अनौपचारिक से औपचारिक षिक्षा की ओर ले जाने के लिए तैयार करने की आवष्यकता है। अर्थात् इन बच्चों को स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम से जोड़ने की आवष्यकता है।
शाला जाने की पूर्व तैयारी -
साक्षरता पूर्व कौशल से अभिप्राय है अक्षरों/अंको को समझने के पूर्व की कुशलताओं को प्राप्त करना।

उद्देश्य  - 

  1. शाला जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना ताकि शाला छोड़ने की प्रवृति को कम किया जा सके।
  2.  दिए गए निर्देषों को सुनने समझने का ज्ञान हो विकसित हो सके। 
  3. बच्चों में किताबों को उलटने - पलटने तथा चित्रों के माध्यम से विषय वस्तु की समझ विकसित हो सके। 
  4. अपने नाम के अक्षर पहचान सकें। अपना नाम शब्दों में लिखा हुआ पहचान सकें।
  5. उसे ठीक से पेंसिल पकड़ने का अभ्यास हो जाए। सरल-सरल आकृतियों को कैंची से काट सके।

क्रियाएं - 

बच्चों में भाषा एवं साक्षरता पूर्व कौषल का विकास प्रारंभ में निम्न क्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।

सुनने और बोलने संबंधी गतिविधियां - 

वार्तालाप, कहानी, कविता, पोयम, पहेलियां, अभिनय बोलकर मूक, अभिनय, स्टोरी टेलिंग - चित्रों के माध्यम से, कहानी सुनना, प्रष्न पूछना, कहानी के पात्रों पर चर्चा करना, रोल प्ले, टी.वी दिखना, रेड़ियों सुनाना, बच्चों को बोलने के अवसर देना, पिक्चर बुक के माध्यम से काॅम्पलेक्स (सरल से जटिल/कठिन) स्टोरी, एक्सप्लेन करने (समझाने) के अवसर प्रदान करना, आई काॅन्टेक्ट बनाकर (नजरें मिलाकर) प्रोत्साहन देना, निर्देष देना, सुनने बोलने वाले खेल आदि।

पढ़ने की तैयारी - 

पिक्चर बुक (तस्वीरों/चित्रों)/चार्ट/पोस्टर के माध्यम से घर, घर का सामान रसोईघर, स्नानघर, सोने का कमरा, शरीर के अंगों की पहचान, हमारी आदतें, व्यक्तिगत साफ सफाई, घर की साफ-सफाई, मौसम, जानवर, मिट्टी, पेड़-पौधे, पक्षी, हाट बाजार, डाॅक्टर, फूल, गुड हेबिट्स (अच्छी आदतें), गुड मेनर्स (षिष्टाचार), जानवर, मिट्टी, पेड़-पौधे, पदार्थ (ठोस, तरल, भाप हवा आदि), रंग, हमारा भोजन, हमारे धार्मिक एवं राष्ट्रीय त्यौहार, महत्वपूर्ण दिवस, दूध और दूध से बनी वस्तुएं, मौसम अनुसार काम आने वाली वस्तुएं, त्यौहार, सप्ताह के दिन, हमारे मददगार मौसम, यातायात के साधन, माह के नाम, तन्य अतन्य वस्तुएं (इलास्टिक, कपड़ा, रस्सी, प्लास्टिक आदि), ट्रेफिक रूल्स, बाजार, मेला, गुड्डा गुडिया का खेल, हमारे खेल और खेल सामग्री, हमारी शाला, आंगनवाड़ी, रेल्वे स्टेषन, बस स्टेण्ड, अपोजिट वर्ड्स (विरोधी शब्द)।

लिखने की तैयारी - 

हस्तकला, एवं लेखन पूर्व अभ्यास - 

कागज से कार्य करवाना जैसे - गेंद, नाव, हवाई जहाज, दिन-रात, फिरकनी, नाव आदि, बटन बंद करना खेलना, जिप लगाना-खोलना, चोटी गंुथना खोलना, पिक्चर, ड्राइंग, कागज की कटिंग पेस्टिंग (कागज फाड़ना, चिपकाना), चित्र और शब्दों का मिलान, विभिन्न, आकृतियों में रंग भरवाना, फूल पत्तियों, बीज, रेत आदि की सहायता से सजाना। मिट्टी की आकृतियां बनवाना, रंग के छापे, स्प्रे वर्क, मोती पिरोना, फलियां छीलना, पत्तियां तोड़ना, काटना, चिपकाना, विभिन्न आकृतियों मे क्रियोसं/चाॅक पेंसिल के द्वारा रंग भरना, बिंदियों से बिंदिया मिलाना, रंगोली बनाना, रेत तथा गीली मिट्टी से मोतियों से, माचिस की तीलियों एवं पेंसिल आदि विभिन्न वस्तुओं से रंग भरना।
बच्चों से हस्तकला संबंधित गतिविधियां उनकी सूक्ष्म मांसपेषियों के विकास के लिए करवाई जाती है। इससे उनकी अंगुलियों की पकड़ धीरे-धीरे मजबूत होती है। प्रायः बच्चे जब गोल आकृति को जानने तथा पहचानने लगते हैं उसी गोल को छोटा करते जाओ तो वह शून्य बन जाता है। जब चैकोर आकृति को जानने तथा पहचानने लगते हैं वही आकृति को लंबाई में पतला करते जाओं तो एक आकृति बन जाती है। चैकोर आकृति को चैड़ाई मेे पतला करते जाओ तो आड़ी रेखा बन जाती है। प्रायः डेढ़ साल की उम्र के बच्चे घर की दीवारों और फर्ष पर गोदा गादी करने लगते है। 3 वर्ष की उम्र से बच्चों को बड़ी आकृतियों में गोल तिकोन चैकोन आकृति की तस्वीरों में रंग करने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। 4 - 5 वर्ष की उम्र तक बच्चों को कुछ कम छोटी आकृतियों के चित्रों में रंग भरवाना/पेंसिल/चाक आदि चलाने का अभ्यास कराना चाहिए। साथ ही अपने मन से चित्र बनाने को कहना चाहिए ताकि वे पेंसिल/चाक आदि से लाइने खींचने, लाइन मिलाने आदि का अभ्यास प्रारंभ कर सकें। 5 - 6 वर्ष के बच्चों को सरल अंक जैसे - 1, 7, 8, 4, 3 सरल अक्षर जैसे - ग, म, प, व, ब, की बड़ी और चैड़ी आकृतियों में रंग भरने के अवसर देने चाहिए।

गणित की तैयारी - 

छोटा-बड़ा, कम-ज्यादा, लंबा-नाटा (ठिगना), मोटा-पतला, आकार, हलका-भारी, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे-बीच मे, लंबा छोटा, दायां-बाया, दूर-पास, चैड़ा-संकरा, ऊंचा-नीचा, अंदर-बाहर, पहले-बाद में, नंबर (अंक ज्ञान) तुलना, स्थिति, बंटवारा, रूपया-पैसा, गिनती नमूने, मिलाना, अलग-अलग करना (घटाना) समय, छांटना, श्रेणीकरण (एक सी वस्तुओं को अलग-अलग करना) वर्गीकरण, अंक एवं चित्र को मिलाना, संभावना तलाषना, मापना, जोड़ी जमाना, कमियां ढूंढना, कम जयादा छांटना, सह संबंध स्थापित करना। जैसे - चकला बेलन, सुई धागा, रूपये पैसों का ज्ञान, अगलाा पिछला। 

Share:

5 छोटे समूह की गतिविधियॉ ( Small group activities)

बच्चों को छोट—छोट समूह में अपनी आयु समूह के बच्चों के साथ गतिविधियां करने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। ये गतिविधियॉ बच्चों की छोटी मांस पेशियों के विकास, आंखों और हाथों के बीच संतुलन आदि स्थापित करने में मददगार होते है। गतिविधियों का चुनाव बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक स्तर को ध्यान में रख कर दिया जाना चाहिए। बच्चों की रूचि और आवश्यकताओं की दृष्टि से उपयुक्त ऐसी गतिविधियों का चुनाव करना चाहिए जो बच्चों को आसानी से समझ आ सके। 

उद्देश्य — 

  1. छोटी मांस पेशियों के विकास के अवसर उपलब्ध कराना। 
  2. आंखो और हाथों में समन्वय स्थापित करने के अवसर उपलब्ध कराना। 
  3. निर्देशों के अनुसार काम करना। 
  4. विभिन्न कार्यो में सहयोग देना। 
  5. सामूहिक रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना। 
  6. एक दूसरे के विचारों का सम्मान करना। 

क्रियाएं — 

आयु समूह के अनुसार ऐसे बच्चों के समूह बनाएं जो आपस में एक दूसरे के साथ मिलजुल कर खेलते हों। बच्चों को निम्नानुसार गतिविधियां करने के लिए दें। 
  1. पहचानाना — विभिन्न रंगों को, स्वाद को, गरम ठण्डे को, दूर—पास को, ऊपर—नीचे को आदि। 
  2. मिलान करना — रंग ​आकार, आकृति के आधार पर वस्तुओं को मिलाना। 
  3. छांटना — बड़े—छोटे, खाने और न खाने वाली चीजें, पत्तियां, डंठल, बीज आदि। 
  4. वर्गीकरण — मिली जुली सामग्री में से एक सी वस्तुओं को एक साथ रखना जैसे — गोल के साथ गोल, लंबे के साथ लंबा चौकोर के चौकोर आदि। 
  5. क्रमबद्धता — छोटा, बड़ा उससे बड़ा जमाना, क्रम से सोचना (घटना का क्रम बद्ध चिंतन जैसे — नहाने की प्रक्रिया, रोटी बनाने की प्रक्रिया आदि)
  6. पानी के खेल — बड़े बर्तन से छोटे बर्तन में माप कर पानी डालना। 
  7. नाटक — 2 — 3 सदस्यों के नाटक करना ताकि उसे बड़े समूह में प्रस्तुत कर सकें। 
  8. बागवानी — स्कूल, संस्था, आंगनवाड़ी भवन के बगीचे में बीज बोना पौधों को पानी देना आदि। बगीचा न होने की स्थिति में गमले, मिट्टी के कटोरे, पुराने डिस्पोजेबल ग्लास आदि में भी यह कार्य करवाया जा सकता है। 
  9. बिल्डिंग ब्लॉक्स से खेलना — बिल्डिंग ब्लाक्स से विभिन्न वस्तुएं बनाना। 
  10. सृजनात्मक विकास — मिट्ठी के खिलौने बनाना, कागज के खिलौने बनाना। 
  11. सामाजिक विकास — घर—घर खेलना, डाक्टर डाक्टर खेलना, बाजार के खेल आदि। 
  12. ज्ञानेंद्रियों का विकास — सुनना, सूंघना, चखना, देखना, महसूस करना आदि। 
Share:

4 स्वतंत्र खेल/एकाकी खेल (Single Activity)

कहानी/कविता/ड्रामा/समूह गीत देखने/सुनने के बाद बच्चों के मन में बहुत से विचार आते है उनके मन में कई कल्पनाएं उड़ान लेने लगती है। उनके चिंतन को बढ़ावा देने के लिए बड़े समूह की गतिविधियों के बाद बच्चों को कुछ समय के लिए स्वतंत्र खेलने के लिए छोड़ देना चाहिए। बच्चे स्वेच्छा से कुछ खेल खेलना चाहते हैं, जिसमें वे किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते। अपने आप में बड़बड़ाते रहते है और खेलते रहते हैं।

उद्देश्य — 

  1. उसके अंदर एकाग्रता का विकास होता है।
  2. उसे अपने अंदर छुपी हुई प्रतिभाओं को उभारने के अवसर मिलते हैं। 
  3. बच्चे को समूह में की गई गतिविधियों को अपने आप के साथ दोहराने के अवसर मिलते है जिससे वे उसकी स्मृति में स्थाई छाप छोड़ देते है।

क्रियाएं — 

कहानी/कविता/ड्रामा सुनने/​देखने के बाद बच्चे को स्वतंत्र छोड़ने के साथ ही उसके द्वारा की जा रही गतिविधियों का बच्चे से बिना कुछ कहे अवलोकन करना चाहिए। हो सकता है बच्चा कविता/कहानी/ड्रामा के पात्रों से संबंधित खिलौनों से खेलने का प्रयास करे। हो सकता है कविता/कहानी/ड्रामा को बड़—बड़ाकर खेलते हुए दोहराए। हो सकता है किसी पात्र विशेष की नकल करे। हो सकता है कहानी को मन से आगे बढ़ाने का प्रयास करे या यह भी हो सकता है कि बच्चा कहानी को छोड़ कर कोई अन्य गतिविधि करे जैसे — सीढ़ी पर चढ़ना उतरना, फर्श/दीवारों पर गोदा—गादी, अंगुली के खेल, हाथ के छापे लगाना, कार्यात्मक गीत, कागज फाड़ना, पहिए वाले खिलौनों से खेलना, वस्तुओं या खिलौनों की जगह अदल—बदल कर देखना। पेंटिग, ड्राइंग, सीढ़ी चढ़ना उतरना, झूला झूलना आदि।
सभी बच्चों को अपनी पसंद से जो खेलना चाहते है खेलने दें। यदि कुछ बच्चे समूह में स्वतंत्र खेल खेलते हैं तो खेलने दें। बच्चे जिस भी गतिविधि में संलग्न है कार्यकर्ता को बच्चे की आवश्यकता के अनुरूप उसे संकेत देना चाहिए ताकि आगे वह स्वयं कर सके। 
Share:

3 नाश्ता (Breakfast)

स्कूल, आंगनवाड़ी समय सारिणी के अनुसार बच्चों को बड़े समूह की गतिविधियों के पश्चात् नाश्ता कराए जाने का प्रावधान है। अत: बच्चों को बताया जाना चाहिए कि अब हम नाश्ता करेंगे। इसलिए सब बच्चे साबुन से हाथ धोकर लाइन से टाटपट्टी पर बैठे जाएॅ।बच्चों से पूछे कि आपको पता है। आज हम कौन सा नाश्ता करेंगे। कुछ बच्चे हॉ तथा कुछ बच्चे नहीं बोल सकते हैं फिर बच्चों को बताएं कि हॉ आज ................... (नाश्ते का नाम) नाश्ता करेंगे।नाश्ते के लिए सब बच्चों को लाइन से बैठाया जाना चाहिए तथा बारी—बारी से सब बच्चों को नाश्ता परोसकर सबको एक साथ नाश्ता शुरू करने के लिए कहना चाहिए।नाश्ता के लिए सब बच्चों को लाइन से बैठाया जाना चाहिए तथा बारी—बारी से सब बच्चों को नाश्ता परोसकर सबको एक साथ नाश्ता शुरू करने के लिए कहना चाहिए।नाश्ता करते हुए बच्चों को बताया जाना चाहिए कि थोड़ी चीज मुंह में रखकर अच्छे से चबा कर खाएं। इससे खाते समय चीज गिरती नहीं है, कपड़े भी गंदे नहीं होगें।कुछ बच्चें नाश्ता जल्दी समाप्त कर लेते हैं तथा कुछ बच्चे नाश्ता धीरे—धीरे करते हैं। साधारण तौर पर बच्चेों के नाश्ता खतम करने में 5 मिनिट का अंतर हो सकता है। नाश्ते के बाद सभी बच्चों को फिर से हाथ धोने की आदत डाली जानी चाहिए। सब बच्चों को बताएं कि अब हम कहानी/कविता/ड्रामा या जो भी आगे की गतिविधि हमें करवानी है बच्चों को उसके बारे में बताएंगे। जिन बच्चों ने हाथ धोकर पोंछ लिए है उन्हें आगे के गतिविधि स्थल पर जाकर बैठने को कहा जाएगा। 

Share:

2 बड़े समूह की गतिविधियां (Group Activities)-

जिन क्रियाओं में बच्चों से सामूहिक भागीदारी की अपेक्षा हो उन्हें बडे़ समूह की गतिविधियों में करवाया जाना चाहिए। बड़े समूह की गतिविधियों मे बच्चों को कहानी गीत, कविता, नाटक, समूह खेल, त्यौहार, जन्मदिन, समूह गीत/समूह नृत्य आदि गतिविधियां करवाई जाती हैं। बच्चों को जिस गतिविधि को करवाया जाना है उससे संबंधित सवाल जवाब करते रहना चाहिए। जैसे यदि आज कविता/कहानी सुनानी है तो उनसे पूछना चाहिए आपको पता है आज हम कौन सी कहानी सुनेंगे। कुछ बच्चे आदतन कहेंगे हां! कुछ बच्चे कहेंगे नहीं! कुछ बच्चे पूछ सकते हैं आप बताओं! और कुछ बच्चे अपने मन से किसी भी कविता/कहानी का नाम ले सकते हैं।

उद्देश्य - 

  1. दूसरों की बातों को ध्यान पूर्वक सुनने और समझने के अवसर प्रदान करना। 
  2. बच्चों की झिझक खत्म करना तथा खुषी का अहसास दिलाना। 
  3. बच्चों में अच्छी आदतों के विकास कराना। 
  4. निर्देशों के अनुसार काम करने के अवसर उपलब्ध कराना।
  5. समूह में विभिन्न कार्यो में सहयोंग करने के अवसर उपलब्ध कराना। 
  6. अपनी बारी का इंतजार करने का धैर्य विकसित करने में सहयोग प्रदान करना। 
  7. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने तथा आवष्यकतानुसार उन पर नियंत्रण करने के अवसर प्रदान करना। 
  8. स्व-अनुशासन विकसित करना। 
  9. आत्म निर्भरता विकसत करना। 
  10. उन्हें जिज्ञासु बनाना। 

खेल क्रियाएं - 

गीत, कविता, कहानी - गतिविधियों के आयोजन के समय षिक्षक/षिक्षिका को भी बच्चों के साथ ही उसी कुर्सी, चटाई, दरी या आसन पर बैठना चाहिए जिस पर बच्चे को बैठाया जा रहा है। पुस्तक पढ़कर सुनाने गाना गाने/ कविताएं सुनने सुनाने आदि के लिए बच्चों गोल घेरे में बैठाए जाने से सभी बच्चे एक दूसरे को हाव-भाव सहित आसानी से देख सकते हैं। इस समय षिक्षक/षिक्षिका की भूमिका सहजकर्ता के रूप में होनी चाहिए। अर्थात् बच्चों को बताने के बाद उन्हें खुद से करने के अवसर ज्यादा देने चाहिए। जहां बच्चों को बार-बार प्रयास करने को बाद भी कठिनाई अनुभव हो वहां बच्चों को बताना चाहिए कि उन्हें क्या करना है। 

नाटक/ड्रामा/नकल - 

नाटक करने के लिए बच्चों को विभिन्न वेष भूषा, मुखोटै, या बच्चों को जो भूमिका दी गई हो उसकी तखती गले में लटका कर नाटक करवाना चाहिए। 
बच्चों को दूसरों की नकल करने में बहुत मजा आता है। उन्हें विभिन्न भूमिकाएं स्वीकार करने में भी संकोच नही होता। नकली वस्तुओं का प्रयोग करके नाटक करने में आनंद का अनुभव करते है। बच्चे जो भी अनुभव करते हैं, जो भी देखते हैं, नाटक/नकल में उन्हीं शब्दों का उच्चारण, हाव-भाव प्रदर्षित करते है, और वह भूमिका प्रदर्षित करते हैं जिसकी वह भूमिका निभाते हैं। 
परिवार के सदस्यों की नकल। जैसे - घर में खाना कौन बनाता है उसकी नकल करके बताओं, मम्मी को नानी के घर जाना हो तो कैसे तैयारी करती है। दादा जी ख्ेात में या घूमने जाते हैं तो कैसे जाते हैं। दादी पूजा कैसे करती है। दीदी पढ़ाई कैसे करती है। पापा अपने काम पर जाते समय कैसे जल्दी मचाते हैं, षिक्षक/षिक्षिका, आंगनवाड़ी दीदी आपको कैसे सिखाती हैं आदि - आदि। 
इस तरह की गतिविधियों के लिए यदि हो सके तो बच्चों को थोड़ी ऊंचाई पर चबूतरे या तखत पर गतिविधियां करवाई जानी चाहिए ताकि अन्य बच्चे उसे आसानी से देख सकें साथ ही ध्यान रखा जाना चाहिए कि मंच/तखत इतना बड़ा तथा समतल हो कि बच्चे उस पर गतिविधि करते समय गिरें नहीं। 

वार्तालाप - 

किसी विषय विषेष के आधार पर बच्चों से बातचीत को निर्देषित वार्तालाप कहलाता है। विषय विषेष के आधार पर की गई बातचीत से बच्चे उस विषय की विस्तृत समझ विकसित कर पाते है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, षिक्षक/षिक्षिका को वार्तालाप के लिए अनुकूल वातावरण पैदा करना चाहिए। जैसा कि वार्तालाप शब्द से ही स्पष्ट होता है कि यह दो तरफा बातचीत है। अर्थात् आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ बच्चे भी बातचीत बराबरी से सहभागी होकर सवाल जवाब करेंगे। बच्चों के अंदर उत्सुकता और कौतुहल पैदा करने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। विभिन्न प्रयोग करने के अवसर देकर उनमें नई-नई रूचियां पैदा करनी चाहिए। 

समूह खेल/ समूह गीत - 

सामूहिक खेल बच्चों को धीरे-धीरे अपने व्यवहार को नियंत्रित करना सिखाते हैं, नियमों का पालन, अपनी बारी का इंतजार करना, पूर्व निर्धारित नियमों की संरचना का पालन सिखाते हैं। इन खेलों का उद्देष्य खेल में प्रतिस्पर्धा का भाव या हार जीत न होकर आनंद की प्राप्ति होना चाहिए। 
बच्चों को समूह में गीत/अभिनय गीत करवाए जाने से उनकी झिझक दूर होती है, एक दूसरे के साथ लय और ताल के साथ गतिविधिया करना सीखते हैं। 

त्यौहार, जन्मदिन/महत्वपूर्ण दिवस - 

बच्चों को सामाजिक एवं प्रादेषिक तथा राष्ट्रीय संस्कृति तथा सामान्य रीति रिवाजों से परिचित कराने के लिए केंद्रों, संस्थाओं, आंगनवाड़ी केंद्र पर त्यौहारों का आयोजन किया जाना चाहिए। बच्चों को जिस माह में जो त्यौहार आते हैं उन्हें कैसे मनाते है, क्यों मनाते हैं, उस दिन कौन सी मिठाईयां बनाई जाती है, आदि से अवगत कराया जाना चाहिए। जैसे - 

धार्मिक त्यौहार - 

मकर सक्रांति, दिवाली, महा षिवरात्री, बसंत पंचमी, होली, गुड़ी पड़वा, राम नवमी, महावीर जयंती, डाॅ अम्बेडकर जयंती, बैसाखी, परषुराम जयंती, बुद्ध पूर्णिमा, ईदउल फितर, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, दषहरा, दिवाली, गुरू नानक जयंती क्रिसमस आदि। 
स्थानीय स्तर पर आयोजित किए जाने वाले त्यौहारों का आयेाजन विषेष रूप से किया जाना चाहिए। स्थानीय त्यौहार, भगोरिया, गणगौर। 

प्रदेशिक एवं राष्ट्रीय त्यौहार - 

गणतंत्र दिवस, (26 जनवरी), स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गांधी जयंती (2 अक्टूबर), मध्यप्रदेष स्थापना दिवस (1 नवम्बर)।

महत्वपूर्ण दिवस - 

बच्चों को जन्म दिन, शिक्षक दिवस (5 सितम्बर), बाल दिवस (14 नवम्बर) बच्चों का सामूहिक रूप से जन्म दिन मनाए जाने से उन्हें उनके स्पेषल होने का अहसास दिलाया जाने से वह अपने प्रति सम्मान एवं स्वाभिमान के अहसास से परिचित होता है। लोग उसे कितना महत्व देते है इससे उसमें सामाजिकता का भाव विकसित होता है। जिस बच्चे का जन्मदिन हो उसे दूसरे बच्चों तथा षिक्षक/षिक्षिका के द्वारा तिलक किया जा सकता है। बच्चे अपने हाथ से फूल, गुलदस्ता, खिलौना या ड्राइंग बना कर बच्चे को दे कर जन्मदिन की बधाई दे सकते हैैै। हो सके तो जन्म दिन से संबंधित कोई गीत/नाटक/ड्रामा आदि भी करवाया जा सकता है। 

Share:

शाला पूर्व शिक्षा ( Pre school education) भाग — 3

  • जिन विशेष तरीकों या प्रावधानों को अपनाकर बालकों का समुचित चारित्रिक या नैतिक विकास किया जा सकता है उनमें से प्रमुख है मूल प्रवृत्तियों और संवेगों का उचित प्रशिक्षण, इच्छा या संकल्प शक्ति का प्रशिक्षण, अच्छी आदतों एवं उचित आदर्शो का विकास, उचित स्थायी भावों का विकास एवं संगठन, अनुकरण, सुझाव, पुरस्कार एवं दंड आदि की समुचित सहायता लेना, नैतिक और धार्मिक शिक्षा प्रदान करना, बच्चों का उचित शारीरिक, सामाजिक, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास करना, चारित्रिक विकास कार्य में परिवार, विद्यालय और समाज सभी का संगठित सहयोग लेना आदि। 
  • व्यवहार के तीनों पक्षों या अनुक्षेत्रों से जुड़े हुये विभिन्न विकासात्मक कार्य — 1 क्रियात्मक विकासात्मक कार्य। 2 ज्ञानात्मक विकासात्मक कार्य और 3 भावात्मक ​विकासात्मक कार्य आदि तीन श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं और इस तरह से विकासात्मक कार्य बालक विशेष की उन सम्पूर्ण व्यवकार क्रियाओं से सम्बन्धित रहते है जिनका संपादन बाल​क विशेष से (उसकी आयु तथा अवस्था विशेष से सम्बन्धित किसी विकासात्मक काल के संदर्भ में) अपेक्षित होता है। 
  • बालक के किसी एक आयु या विकास स्तर पर एक विशेष प्रकार के विकासात्मक कार्यो को संपादित करने की अपेक्षा की जाती है। इसके पीछे जिन विशेष कारक या परिस्थिति विशेष सम्बन्धी आवश्यकताओं का हाथ रहता है उनमें प्रमुख रूप से परिपक्वन की प्रक्रिया तथा बालक की अपने भौतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवेश से समायेाजन सम्बन्धी आवश्यकताओं का उल्लेख किया जा सकता है। 
  • विकासात्मक कार्यो का सीधा सम्बन्ध जहॉ बालकों की आयु तथा वृद्धि एवं विकास की अवस्थाओं—शैशव, बचपन, किशोरावस्था इत्यादि से होता है वही इसका सम्बन्ध बालकों के सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश से भी होता है। प्रत्येक सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश अपने रीति—रिवाज, रहन—सहन के ढंग तथा समायोजन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुये विभिन्न विकासात्मक कालों में अपने बालकों से अलग—अलग प्रकार के विकासात्मक कार्यो के संपादन की अपेक्षा करता है। 
  • किस विकास स्तर पर बालकों द्वारा किस प्रकार के विकासात्मक कार्य किये जाने चाहिये इस बात का सही ज्ञान एक अध्यापक को अपने कत् र्तव्य निर्वाह में यथेष्ट सहयोगी सिद्ध हो सकता है। बालक विशेष का योग्यता और उपलब्धियेां की दृष्टि से क्या स्तर है और उसकी अपनी आयु तथा विकास काल की दृष्टि से उससे क्या कुछ अपेक्षित है इस बात की जानकारी अध्यापक को इस बात के लिये पूरी तरह तैयार कर सकती है कि वह अपनी ओर से ऐसे गंभीर प्रयत्न कर सके जिससे बालकों से उनके विकास स्तर के अनुरूप विकासात्मक कार्यो के सफल संपादन का लक्ष्य सही ढंग से पूरा हो सके। 
  • किशोरावस्था एक तरफ तो अत्यधिेक वृद्धि एवं विकास का काल है तो दूसरी ओर अत्यन्त तनाव एवं दबाव की अवस्थ। किशोर अपनी वय संधि के ऐसे चौराहे पर खड़ा होता है जहॉ उसे बचपन तथा वयस्क दोनों प्रकार की भूमिकाओं से उत्पन्न विरोधी अपेक्षाओं का शिकार होना पड़ता है तथा अपनी आवश्यकताओं, समस्याओं एवं महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के संदर्भ में आवश्यक मार्गदर्शन एवं परामर्श की आवश्यकता रहती है। मॉ—बाप अध्यापकों तथा समाज के उत्तरदायी सदस्यों को ऐसा सब कुछ प्रदान करने के लिये आगे आना चाहिये तथा किशोरों को सभी प्रकार से ऐसी शिक्षा तथा समायोजन सम्बन्धी परिस्थितियॉ प्रदान करनी चाहियें जिनसे उनका अधिक से अधिक सर्वागीण विकास हो सके। 
Share:

Popular Posts

Recent Posts