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संतुलित आहार Balanced Diet

दीर्घ जीवन एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए दैनिक जीवन में संतुलित आहार का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। भोजन—जीवन के लिए है, न कि जीवन भेाजन के लिए। भेाजन करने का उद्देश्य केवल क्षुधा की संतुष्टि ही नहीं हैं, वरन् शरीर को पूर्णत: स्वस्थ, सबल एवं नीरोग रखना है। स्वस्थ और सबल रहने के लिए पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। स्वस्थ् रहने के लिए केवल पेट भर भोजन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि हमारे भोजन में पोषक तत्वेां की उपयुक्त मात्रा होनी चाहिए। भेाजन क्या, कैसे, कितना और कब करना चाहिए। इन सभी प्रश्नों का ध्यान रखने पर ही मनुष्य स्वस्थ रहकर अपनी शारीरिक, क्रियायें, भली—भॉति कर सकता है। भोजन में सभी पोषक तत्वों—प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड, वसा, खनिज लबण, विटामिन एवं जल—को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार उचित अनुपात में होना चाहिए। अगर हम केवल प्रोटीनयुक्त भोज्य पदार्थो कर सेवन करेंगे तो ऊतकों की मरम्मत एवं नई कोशिकाओं का निर्माण तो अवश्य होगा, परंतु कार्बोहाइड्रेट के अभाव में शरीर अपना उचित तापक्रम खो बैठेगा। अगर केवल वसायुक्त भोजन ही सेवन किया जाए तो मूत्र, पोषण एवं ह्दय—संबंधी रोगों के संभावना रहेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि निश्चित अनुपात में आयु, व्यवसाय, मौसम,​ लिंग आदि के अनुकूल भोज्य तत्व वाले पदार्थ मे हों। भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे हमारी सभाी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी हो।

संतुलित आहार की परिभाषा एवं विशेषता

वह आहार संतुलित होता है जिसमें सभी आहार वर्ग जैसे ऊर्जा देनेवाला, आहार, शरीर संवर्धन करनेवाला आहार और सुरक्षात्मक आहार, शरीर संवर्धन, करनेवाला आहार और सुरक्षात्मक आहार उचित परिमाण में हो, जिससे की व्यक्ति को सभी पोषक तत्व न्यूनतम मात्रा में प्राप्त हो जायें। उप​रोक्त परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि वह आहार जिसमें शरीर की समस्त पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए सभी पोषक तत्व उचित एवं अनुपात में पाए जाते है। संतुलित आहार कहलाता है। व्यवसाय — अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियेां (कुली, मजदूर, लकड़हारा, धोबी रिक्शाचालक) की शक्ति एवं गर्मी अधिक व्यय होती है। इसलिए उन्हें अधिक कैलोरी ताप की आवश्यकता होती है। ऐसे व्यक्तियों को भेाजन में अधिक कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है। आराम से बैठकर एवं मस्तिष्क से काम करने वालों (डॉक्टर, व​कील, टाइपिस्ट) को प्रोटीन अधिक एवं कम कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है। उन्हें अधिक परिश्रम करने वालों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है।
शारीरिक बनावट या आकार — लम्बे या मोटे शरीर के लोगों को छोटे एवं दुबले लोगों की अपेक्षा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। शरीर भार पर भोजन की मात्रा अधिक निर्भर करती है। लम्बे व्यक्ति के शरीर से ताप का अपव्यय नाटे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को अधिक भेाजन की आवश्यकता होती है। लिंग — स्त्रियों को पुरूषों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि स्त्रियों की लंम्बाई एवं भार पुरूषों की अपेक्षा कम होता है। उन्हें शारीरिक परिश्रम कम करना पड़ता है ।परंतु गर्भावस्था एवं स्तनपान अवस्था में उन्हें अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । आयु—बच्चों को युवा एवं प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि वे अधिक क्रियाशील होते हैं एवं उनका शारीरिक विकास होता है। भेाजन से उन्हें केवल शक्ति् एवं गर्मी ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी होता है। खेल—कूद में अधिक शक्ति का हा्स होता है। एक 14 वर्ष का बालक एक युवा के बराबर भोजन करता है। उनके भेाजन में निर्माणक तत्व (प्रोटीन) की अधिक आवश्यकता होती है। बाल्यावस्था एवं वृद्धावस्था में शारीरिक संवेदनशीलता बढ़ जाने के कारण सुरक्षात्मक तत्वों की आवश्यकता होती हैं, क्योकि शारीरिक परिश्रम कम होता है एवं पाचन—क्रिया कमजोर हो जाती है, इसलिए ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है।
जलवायु — ठंडे प्रदेशो में रहनेवालो को गर्म प्रदेशो की अपेक्षा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि शरीर ताप को बढ़ाने के लिए उन्हें अधिक कैलोरियों की आवश्यकता रहती है। उनके भेाजन में वसा प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिए। ऊष्णता—प्रधान देशों में कार्बोहाइड्रेट अधिक प्रयोग किया जाता है। जाड़े के मौसम में भूख अधिक लगती है, अधिक भोजन किया जाता है एवं शरीर भार भी बढ़ जाता है। इसलिए ऐसे मौसम में घी, मक्खन, मेवे आदि अधिक खाने की इच्छा होती है। गर्मी के मौसम में ताप उत्पन्न करने वाले भोजन कम पचते है, भूख कम लगती है एवं शरीर का भार कम हो जाता है। सर्दियों में मौसम में ऊष्मा के रूप में ऊर्जा लेने के कारण ही अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।

संतुलित भोजन नहीं लेने से हानियॉ —

संतुलित आहार नहीं लेने से निम्नलिखित हानियॉ होती है —
1. शरीर में रोगरोधन — क्षमता क्षीण हो जाती है जिस कारण अनेक प्रकार के रोगों के होने की संभावना रहती है।
2. शरीर की मांसपेशियॉ उचित रूप से विकसित नहीं हो पाती हैं।
3. भूख कम लगती है। हर समय आलस्य, थकान एवं नींद आती है।
4. शरीर दुर्बल एवं पीला दिखाई देने लगता है ।
5. थोड़ा भी शारीरिक परिश्रम करने के बाद अधिक थकान का अनुभव होने लगता है।
6. आँखे पीली—पीली दिखाई देती है एवं कमजोरी का अनुभव होने लगता है।
7. शरीर का पूर्ण विकास नहीं हो पाता हे।
8. संतुलित आहार के आभाव में बच्चों का मानसिक विकास अवरूद्ध हो जाता है।
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विटामिन ए Vitamin A

मेक्काॅलम एवं डेविस ने सन् 1913 में विटामिन ‘ए‘ की खोज की। उन्होंने छोटे चूहों को शुद्ध आहार पर रखा, जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी के रूप् एवं खनिज लवण थे। परंतु उनका विकास उचित रूप से नहीं हुआ। लेकिन जब उन्हें मक्खन, वसा और अंडे की चर्बी आहार मेें दी गई तब उनका विकास आरंभ हो गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मक्खन और अंडे की चर्बी में कुछ ऐसा पदार्थ है जो अन्य में नहीं पाया जाता और यह वृद्धि के लिए अत्यन्त आवष्यक है। उन्होंने इस तत्व को वसा में घुलनषील ‘ए‘ कहा। स्टीनवाक ने अपने अध्ययन (1991) में चूहों को जड़ युक्त सब्जियाॅ वसा-विलेय-बिटामिन के स्त्रोत के रूप में खिलाया। पीले रतालू और गाजर खिलाने से सामान्य वृद्धि हुई और प्रजनन के लिए अज्ञात पदार्थ का भी संररण हुआ। इस तरह उन्होंने केरोटनाॅइड्स की विटाामिन ‘ए‘ की क्रियाषीलता का पता लगाया। 1920 ई. में इसी वैज्ञानिक ने बताया कि मछली के यकृत के तेल में एक ऐसा अंष होता है जिसका साबुनीकरण नहीं किया जा सकता है। 1930 में मूर ने यह खोजा कि जब विटामिन ‘ए‘ की कमी वाले चूहों को केरोटीन खिलाया गया तो उनके यकृत में विटामिन ‘ए‘ पाया गया। 1929 ई. में जर्मन वैज्ञानिक हैनवान चूले चेपलिन ने रवेदार कैराटिन में विटामिन ‘ए‘ की उपस्थिति को बताया। कैरीट ने 1931 ई. में अत्यधिक संतृप्त रूप् में विटामिन ‘ए‘ प्राप्त किया और उसकी संरचना का पता लगाया।

रासायनिक संरचना -

विटामिन ‘ए‘ एक हल्का पीला पदार्थ है जो कार्बन हाइड्रोजन और आँक्सीजन से बना होता है। यह वसा में विलेय और पानी में अविलेय होता है तथा ऊष्मा में स्थायी है, अर्थात् साधारण पकाने के ताप को सह सकता है। आँक्सीकरण के समय यह बहुत आसानी से नष्ट हो जाता है। कैरोटिनयुक्त वर्णक वे यौगिक हैं जो केवल कार्बन और हाइड्रोजन से मिलकर बने हैं। कैरोटिन युक्त वर्णकों कके रबे गहरे लाल रंग के होते है, परन्तु घोल में बहुत पीले हो जाते हैं। कैरोटिन की रासायनिक संरचना ऐसी होती है जिससे विटामिन ‘ए‘ का निर्माण हो जाता है।
विटामिन ‘ए‘ दो रूप मे पहचान लिए गए है -
    विटामिन ‘ए‘ - यह खारे पानी की मछली के यकृत में होता है।
    विटामिन ‘ए‘ - यह ताजे पानी की मछलियों के यकृत में पाया जाता है ।
रासायनिक संरचना में ये दोनों एक दूसरे से बहुत कम भिन्न है, परन्तु शरीर में दोनों समान रूप से कार्य करते है।

विटामिन ‘ए‘ के कार्य -

वृद्धि के विभिन्न अध्ययनों में यह देखा गया है कि विटामिन ‘ए‘ शारीरिक वृद्धि के लिए नितांत आवष्यक हैं। इसके अभाव में वृद्धि में अवरोध होता है। अस्थियों के सामान्य निर्माण के लिए यह आवश्यक है।
    शरीर के उपकला ऊतकों का स्वास्थ्य - शरीर की बाह्य सतह उपकला ऊतकों से आवरित होती है और शरीर की आंतरिक गुहाओं में भी इसका स्तर होता है। विटामिन ‘ए‘ की कमी से उपकला ऊतक कठोर हो जाते है। त्वचा में अत्यधिक सूखापन अपर्याप्त अंतग्र्रहण के कारण हो सकता है। श्लेग्र्रमा झिल्ली समान्य रूप से स्त्राव नहीं कर पाती है और जीवाणुओं के प्रति कम प्रतिरोधी हो जाती है।
    त्वचा का स्वास्थ्य - विटामिन ‘ए‘ की कमी से त्वचा भी प्रभावित हो जाती है। यह शुष्क एवं खुरदरी हो जाती है। चेहरे की त्वचा भी शुष्क हो जाती है। विटामिन ‘ए‘त्वग्वसीय ग्रंथियाॅ को सुचारू रूप से कार्य करने में सहायता करता है। इससे त्वचा चिकनी एवं साफ रहती है।
    नेत्र को स्वस्थ रखना - मन्द प्रकाष में देखने की क्षमता रक्त में विटामिन ‘ए‘ की उपस्थिति के कारण ही होती है। आँखों के दृष्टि पटल के रंजक तत्व रोडोप्सिन और आयोडाप्सिन विटामिन ‘ए‘ एल्उिहाइड और एक विषिष्ट प्रोटीन से बने होते हैं। ये हल्के गुलाबी रंग के होते हैं। दिन की तेज रोषनी में इनका रंग मंद हो जाता है और मंद प्रकाष में गुलाबी हो जाता है। रक्त मे विटामिन ‘ए‘ होने पर ही इस वर्णक का निर्माण होता है। नेत्रों में रोगाणुओं के संक्रमण से बचने की क्षमता भी विटामिन ‘ए‘ द्वारा ही प्राप्त होती है।
    संक्रमण से बचाव - उचित मात्रा में विटामिन ‘ए‘ के प्रयोग से शरीर में रोग-रोधन क्षमता आ जाती है। शरीर को बल, शक्ति एवं स्फूर्ति देने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहता है। 
  • यह कुछ हार्मोन विषेषकर कोर्टीकोस्टीराॅन बनाने में सहायक होता है। 
  • प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम की उत्पत्ति में सहायक होता है। 
  • यह श्वेतसार के चयापचय में सहायता करता है। 
  • यह श्वेतसार के चयापचय में सहायता करता है। 
  • यह वृक्क एवं मूत्रनली पर लाभदायक प्रभाव डालता है। 
  • इससे घाव भरने में सुविधा होती है।
  • यह पाचन-क्रिया को ठीक रखना है।

विटामिन ‘ए‘ की कमी से हानि एवं इसके लक्षण -

  • आँखों के रोग - विटामिन ‘ए‘ की कमी से निम्नलिखित आँखों के रोग हो जाते है - 
  • रतौंधी - विटामिन ‘ए‘ की अधिक कमी होने से हल्की रोषनी में स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता है।  
  • जीरोससि कन्जक्टाइवा - इस रोग में आँखो के भीतरी भाग की झिल्ली मोटी, सूखी, रंगीन एवं झुरींदार हो जाती है जिसका मुख्य कारण एपिथीलियल ऊतको का कठोर होना होता है।  
  • जीरोसिस कार्निया - इस रोग में अश्रुगं्रथियाॅ तथा झिल्लियों से आँसू का निकलना बंद हो जाता है जिससे कार्निया शुष्क, प्रकाषहीन, निष्क्रिय एवं धुॅधली हो जाती है।
कन्जक्टासइवा तथा कार्निया में जीरोसिस हो जाने पर अगर उसकी दवा अच्छी तरह नहीं की जाय तो आँखों में एक और परिवर्तन हो जाता है जिसे कीरैटोमेलेषिया कहते है। इससे कर्निया अपारदर्षक हो जाती है, फूल जाती है और उसमें घाव हो जाता है जिससे आँखों की रोषनी समाप्त हो जाती है।

अन्य रोग -

  विटाॅट्स स्पाॅटस - बच्चों में विटामिन ‘ए‘ की कमी से यह होता है। विटाॅट ने इसके लक्षण 1863 ई. में बताये थे। इसमें त्वचा पर भूरे एवं चमकदार धब्बे हो जाते हैं जो परत उतरी हुई कन्जक्टाइवा एपिथीलियम से बने होते है।
    फ्राइनेडर्मा - विटामिन ‘ए‘ की कमी से त्वचा की स्वेद ग्रंथियाॅ अपना काम सुचारू रूप  से नहीं कर पाती है, फलस्वरूप त्वचा खुरदरी एवं रूखी हो जाती है और उस पर छोटे-छोटे दाने निकल जाते हैं जिसे टोड त्वचा कहते है।
    वृक्क में पथरी - विटामिन ‘ए‘ की कमी से वृक्क में पथरी बनने लगती है जिससे मूत्र रूक-रूक कर आने लगता है।
    दाॅतो का कमजोर होना - विटामिन ‘ए‘ की कमी से दाॅतों के एनामेल कमजोर हो जाते है जिससे दाॅतों में गरम या ठंडा पदार्थ लगने से टीम होती है।

विटामिन 'ए' प्राप्ति के साधन -

मछली का तेल, मक्खन, घी एवं दूध इसकी प्राप्ति के अच्छे साधन हैं। हरी पत्तीदार सब्जियाॅ, पीले रंग एवं लाल फल विटामिन ‘ए‘ के अच्छे स्त्रोत है। प्रोविटामिन ‘ए‘ के सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत पीली और पीले रंग की तथा हरे रंग की सब्जियाॅ एवं फल हैं। हरे पदार्थो में पीला कैरोटिन क्लोरोफिल की उपस्थिति से उत्पन्न होता है। कैरोटिन के स्त्रोत गाजर, रतालू, खूबानी, पालक, केले, और टमाटर है। अधिक हरी पत्तेदार सब्जियों में कैरोटिन की मात्रा अधिक रहती है। अधिकतर खाद्यों का आधा या कम कैरोटिन विटामिन ‘ए‘ में रूपान्तरित हो जाता है।
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कैल्शियम Calcium

यह अकार्बनिक खनिज पदार्थ है। साधारण शब्दों में इसे चूना भी कहते हैं। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2 प्रतिशत तक होती है जिसमें 99 प्रतिशत अस्थियों एवं दॉतों में और शेष 1 प्रतिशत रक्त, विभिन्न द्रव एवं ऊतको में रहता है। कुछ खनिज तत्वों का 1/2 भाग कैल्शियम ही रहता है। नवजात शिशु के शरीर में इसकी मात्रा बहुत ही कम होती है क्योकि उनकी कोमल अस्थियॉ खनिज लवणों को अवशोषित नहीं कर पाती हैं। अवस्था बढ़ने के साथ—साथ इनका संग्रह भी शरीर में अधिक होता है। एक औसत व्यक्ति के शरीर 1000 — 1200 ग्राम तक कैल्श्यिम रहता है जबकि शिशु के शरीर में जन्म के समय लगभग 27.5 ग्राम रहता है। 

कैल्श्यिम के कार्य या उपयोगिता

कैल्शियम फॉस्फोरस के साथ हमारी अस्थ्यिों, दॉतों, एवं अन्य अंगों में पाया जाता है। यह दॉतों को स्वस्थ, शक्तिशाली और मांसपेशियों को क्रियाशील बनाए रखता है। अस्थियों में 60 — 70 प्रतिशत कैल्शियम फॉस्फोरस पाया जाता है। यह सोडियम पोटाशियम एवं मैग्नीशियम के साथ मांसपेशियों में संकुचन पैदा करता है जिससे हमारे हाथ, पॉव, गर्दन कमर एवं अन्य सभी अंगों में हरकत हो पाती है।

  • यह हृदय की मांसपेशियों में भी संकुचन के कार्य में सहायक होता हैं 
  • यह रक्त को थक्का (Coagulation) के रूप में जमाने में सहायता करता है।  
  • आंतरिक ग्रंथियों के स्त्राव निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम निर्माण में भी सहायता करता है । 
  • यह अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में संतुलित रखता है।  
  • यह कोशिका झिल्ली की पारगम्यता (Permeability) बनाये रखने में सहायक होता है।

अभी परीक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि शरीर में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम रहने से परमाणु परीक्षण के रेडियेशन (Radiation) से निकले स्ट्रोनियम (Strontium) अस्थियेां में जमने नहीं पाता। सट्रोनियम रेडियेशन अस्थियों को कमजोर बना देता है।

    कैल्शियम अस्थियों में संग्रहित रहता है और उसकी अतिरिक्त मात्रा अस्थियों के अंतिम सिरों में एकत्रित हो जाती है जो रक्त में कैल्शियम की कमी होने पर पहुॅच जाती है।

    यह शरीर वृद्धि करता है। अस्थियों में वृद्धि कैल्शियम से है और अस्थियों में वृद्धि होने से शरीर में वृद्धि होती है।
    यह रक्त शिराओं में रक्त के अभिसरंचरण (Permeation) के लिए आवश्यक है।

कैल्शियम प्राप्ति के साधन —

कैल्शियम दूध में अकार्बनिक लवण के रूप में विद्यमान रहता है। दूध और उससे बनी वस्तुएँ यथा मक्खन निकाला दूध, पाउडर दूध, सूखा दूध, मट्ठा कैल्शियम प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। दूध में कैल्शियम और फॉस्फोरस का ठीक अनुपात रहता है, फलत: कैल्शियम का शोषण अच्छी तरह होता रहता है। दूध में लैक्टोज की मात्रा रहती है जो कैल्शियम को शोषण में मदद करता है। बच्चों को अधिक दूध की आवश्यकता पड़ती है। आ​हार के साथ दूध लेने से ही कैल्शियम की पूर्ति शरीर में होती है। इसके अतिरिक्त पालक, हरी पत्तीदार सब्जियॉ मेथी साग, बथुआ, पत्तागोभी, फूलगोभी, शलजम, मछली तिल, सूखा नारियल एवं रागी इसकी प्राप्ति के अच्छे साधन है।

कैल्शियम की कमी के लक्षण

कैल्शियम की कमी से अस्थियों एवं दॉतों में कैल्शियम जमने की क्रिया नहीं हो पाती है, फलत: इनके बढ़ने, मजबूत होने एवं ठोस होने में कमी आ जाती है। अस्थियॉ निर्बल हो जाने से टूटने एवं विकृत होने की संभावना रहती है।
    शरीर में फॉस्फोरस एवं विटामिन 'डी' की कमी होने से भी कैल्शियम की कमी हो जाती है, जिससे बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इस रोग में बच्चों के शरीर की वृद्धि रूक जाती है, मांसपेशियॉ ढीली हो जाती है, टांगो की अस्थियॉ टेढी हो जाती है एवं शीघ्र टूटने वाली हो जाती है। बच्चों का माथा ललाट के पास बाहर निकला मालूम होता है।

  • वृद्धावस्था में कैल्शियम की कमी से जोड़ो में दर्द होना शुरू हो जाता हैं कैल्शियम की कमी से अस्थियॉ दुर्बल हो जाती है। इस रोग को आस्टोपोरोसिस कहते है। इसमें कैल्शियम की कमी हो जाती है। जिससे अस्थियॉ दुर्बल हो जाती है और साधारण सी दुर्घटना होने पर चटक जाती है। 
  • प्रौढ़ावस्था में कैल्शियम की कमी से आँस्टोमलेशिया नामक रोग हो जाता हैं । 
  • कैल्शियम की कमी से रक्त जमने में काफी समय लगता है और रक्तस्त्राव शीघ्र नहीं रूकता।  
  • रक्त में कैल्शियम की कमी से मांसपेशियॉ के संकुचन लगते हैं और उनमें ऐंठन होने लगती है जिसे टिटैनी रोग कहते है। 
  • कैल्शियम की कमी से बच्चों को कभी — कभी दौरे पड़ने लगते हैं।

कैल्शियम की अधिकता से हानियॉ —

बच्चों में कैल्शियम की अधिकता होने से भूख कम हो जाती है, वमन होने लगती है, कब्ज हो जाती है, मांसपेशियॉ ढीली हो जाती है एवं रक्त में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाती है एवं रक्त में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाने से रक्त में यूरिया, प्लाज्मा एवं कॉलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाती है। जो बच्चे विटामिन 'डी' अधिक लेते है उनमें कैल्शियम की अधिकता हो जाती है। प्रौढावस्था में क्षारीय तत्वों का अधिक सेवन करने से शरीर में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाती है। इसस तीव्र रक्तचाप, अमाशय एवं आँतों में रक्तस्त्राव हो जाता है। कैल्श्यिाम की अधिकता से गुर्दे में पथरी होने की संभावना रहती है।

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आयो​डीन (Iodine)

आयोडीन एक महत्वपर्ण आहारीय स्त्रोत के रूप में पहचानी जा चुकी है क्योकि थाइराइड ग्रंथि का सामान्य कार्य, शरीर में इसकी पर्याप्त पूर्ति पर ही निर्भर करता है। थाइराइड ग्रंथि का सक्रिय तत्व   ​थाइरॉक्सिन का घ्रटक है। शरीर में आयोडीन की मात्रा, थाइरॉइड ग्रॅथि में सबसे अधिक सॉद्रित होने के साथ, अत्याल्प है। सामान्य वयस्क व्यक्ति में थाइराइड ग्रॅथि का वजन लगभग 25 ग्राम होता है जिसमें आयोड़ीन की मात्रा केवल 10 मि.ग्रा. होती है। सारे शरीर में आयोडीनकी मात्रा लगभग 50 मि.ग्रा. होती है। कुछ अन्वेषणकों द्वारा थाइराइड  ग्रॅथि में इसकी कुल मात्रा का 70 से 80 प्रतिशत भाग मालूम किया गया है। शेष भाग शरीर में व्यापक रूप से विभाजित है। 

आयो​डीन प्राप्ति के साधन — 

साधारण भोज्य पदार्थो में इसकी मात्रा बहुत कम होती है। यदि मिट्टी में आयो​डीन की मात्रा कम है तो वहॉ उपजाए भोज्य पदार्थो में भी इसकी मात्रा कम हो जाती है। पहाड़ी भूमि में आयेाडीन की मात्रा कम होती हैं एवं समुद्री किनारों के मैदानों के मिट्टी में इसकी मात्रा अधिक होती है। सागर या गहरे समुद्र की मछली में आयोडीन तत्व अ​धिक होती है। पौधों की पत्त्यिों और फूलों में (पालक, हरी, शलजम) जड़ों से अधिक मात्रा में आयोडीन होता है।

आयोडीन के कार्य — 

शरीर मे आयोड़ीन का केवल एक कार्य थाइरॉक्सिन हार्मोन तैयार करना है। अत: जो थाइरॉक्सिन के शरीर क्रियात्मक कार्य है वे आयोडीन के भी है। थाइरॉक्सिन अणु में आयोडीन के चार परमाणु होते है। 
  1. ऊर्जा उपापचयन में — थाइराइड हार्मोन का प्रारंभिक कार्य शरीर मे कोशिकाओं में आॅक्सीकरण की दर को प्रभावित करना है। 
  2. वृद्धि और विकास में — थाइरॉक्सिन तरूणों की सामान्य वृद्धि और विकास के लिए अनिवार्य है। ग्रॅथि का कम स्त्राव वृद्धि को मंद कर सकता है और यदि हार्मोन की कमी गंभीर एवं दीर्घकालीन है तो शारीरिक एवं मानसिक प्रौढ़ता नहीं होने पाती है। इसकी गंभीर न्यूनता से पीड़ित बच्चे जड़वामनता कहलाते है, चेहरा सख्त एवं सूजा दिखता है, त्वचा मोटी शुष्क और चिपचिपी प्रतीत होती है एवं झुर्रिदार हो जाती है। उनकी जीभ बड़ी एवं होठ मोटे हो जाते है एवं खुले रहते हैं। वयस्कों में इसकी कमी होने से मिक्सिडीमा हो जाता है। त्वचा, चेहरा एवं भुजाएॅ मोटी हो जाती है एवं फूल जाती हैं और वह आलसी और निष्क्रिय हो जाता हैं।
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डायटीशियन की भूमिका और योगदान ( Dietician's Role and Contribution)

डायटीशियन चिकित्सक तथा रोग के बीच एक अपरिहार्य संपर्क—सूत्र है। रेाग विज्ञान तथा शरीर क्रिया विज्ञान के सिद्धान्त के आधार पर चिकित्सक रोगी के लिए पोषण सम्बन्धी कार्यक्रम तैयार करता है। डायटीशियन अपनी बुद्धिमता का प्रयोग करके रोगियों के लिए संतुलित तथा कम खर्च वाले आहार का सुझाव दे सकता है। इस प्रकार डायटीशियन भोजन के अपव्यय को कम करने तथा भोजन को रोगियो की आवश्यकता के अनुरूप बनाने में सहायता प्रदान कर सकता है। डायटीशियन (Dietition) को व्यक्ति विशेष तथा समाज की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं पर ध्यान रखने की शिक्षा दी जाती है। 
डायटीशियन की शिक्षा को क्रिया रूप में लाने का उद्देश्य — 
  1. डायटीशियन व्यक्ति विशेष तथा समाज की आहार सम्बन्धी आवश्यकताओं में उतकृष्टता लाने की कोशिश करता है। 
  2. वह व्यक्ति समाज के स्वास्थ्य के लिए आहार विज्ञान के सिद्धांतो का प्रयोग ​करता है। 
  3. उसे अपने विषय का ज्ञान तथा कार्य—संपादन का स्तर बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक अन्वेषण के ​महत्व को समझना चाहिए। 
  4. वह अपने सहयोगी व्यवसायों के लोगों को आहार सम्बन्धी विशेष ज्ञान देकर अपने उत्तरदायित्व को बॉटता है। 
  5. वह अपनी योजना तथा कार्य — सम्पादन को शारी​रक्रिया वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप बनाता है। 
  6. वह व्यक्ति विशेष को आहार—सम्बन्धी आदतों में परिवर्तन लाने को प्रोत्साहित करता है ं
  7. वह उपलब्ध साधनों के आधार पर व्यक्ति विशेष तथा समाज की आहार सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करता है। डायटीशियन को इस बात की पहचान होती है कि उसकी प्राबन्धिक योग्यता का महत्वपूर्ण स्त्रोत योग्यता एवं समय का प्रभावकारी उपयोग है। 
  8. वह संचार में निपुणता प्रदर्शित करता है। 
  9. वह अपने व्यवसाय के लोगों को अनुशासित करके विकास के लिए प्रोत्साहित करता है। डायटीशियन की राय टेलीफोन पर भी प्राप्त होने की सुविधा रहनी चाहिए, जिसमें कई फायदें है, जैसे — टेलीफोन पर उत्तर देने में कम समय लगता है, प्रश्नों की व्याख्या करने का अधिक अवसर प्राप्त होता है, साथ ही व्यक्तिगत सम्बन्ध बढ़तें हैं।

डायटीशियन कई प्रकार के होते हैं। भोजन सूची तथा भोजन तैयार करने का प्रबन्ध करने वाले डायटीशिन प्रशासनिक डायटीशियन कहलाते है। दूसरे प्रकार के डायटीशियन जो आहार सम्बन्धी योजना बनाते है, चिकित्सकीय डायटीशियन कहलाते हैं। तीसरे प्रकार के डायटीशियन वह है, जो लोगों को आहार विज्ञान के सिद्धांतो की जानकारी देते हैंं।

प्रशास​निक डायटीशियन (Administration Dietitian)

प्रशासनिक डायटीशियन इनके निम्नलिखित कार्य है — 
  1. मेनु—प्लानिंग (Menu Planning) अर्थात् भेाजन की तैयारी तथा सर्विस (Service) में वह पोषण और प्रबंध के सिद्धांतों को अपनाता है।
  2. उपकरणों के खरीद, आपूर्ति में उपयुक्त स्तर कायम करता है। 
  3. कर्मचारियों के चुनाव, प्रशिक्षण तथा पर्यवेक्षण की जिम्मेवारी डायटीशियन की है। 
  4. वह आर्थिक प्रबंध "Safety practices" तथा प्रशिक्षण की रिपोर्ट तैयार करता है।
  5. उपकरण, तरीका, कर्मचारी के उपयोग इत्यादि का मूल्यांकन कर वह 'Cost Control' करता है। 
  6. वह 'Dietary Services' में अन्य विभागों के साथ सहयोग करता है। 
  7. अस्पताल के विभिन्न क्रियाओं में एकता बनाये रखता है। 
  8. वह शिक्षा तथा शोध कार्यक्रम में भाग लेता है। 
  9. वह अस्पताल के प्रबन्ध प्रगति को सभा में भाग लेता है तथा कर्मचारियों को अस्पताल तथा रोगी के वातावरण के अनुरूप सुव्यवस्थित ढंग से प्रशिक्षण देने का सुझाव देता है ं
  10. अस्पताल के आवश्यकतानुरूप ' Patient Case Report" बनाता है। 
  11. सभी क्षेत्रों के लिए विशेष 'Sanitation control' करता है। 
चिकित्सकीय डायटीशियन (Dietitian Therapeutic)
चिकित्सकीय डायटीशियन इसके मुख्य कार्य इस प्रकार होते है — 
  1. वह व्यक्ति विशेष के लिए डाक्टर के द्वारा बतायी गयी - (1) पोषण आवश्यकता तथा (2) शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के आधार पर मेनु (Menu) तैयार करता है।
  2. आधारभूत संस्थागत भोजन—सूचियों में तथा अपनी भोजन सूची में सामंजस्य स्थापित करता है। 
  3. मरीजों के पोषण सम्बन्धी आदतों तथा आवश्यकता के लिए चिकित्सा 'Nursing' तथा 'Social Service Staff' से सम्पर्क स्थापित करता है। 
  4. चिकित्सक रिकॉर्ड तथा बतायी गयी 'Medical treatment' से सम्बन्धित आहार का 'Systematic record maintain' करता हैं 
  5. आवश्यकता पड़ने पर बताये गये आहार का "Standardization' करना। 
  6. मरीज के रोग से सम्बन्धित बीमारी के विषय में उन्हें पोषण की जानकारी देता हैं 
  7. मरीज को सामान्य आहार तथा रूपान्तरित आहार के विषय में बताता है। 

शिक्षक डायटीशियन (Teacher Dietitian)

शिक्षक डायटीशियन के कार्य निम्नलिखित है — 
  1. यह अस्पताल तथा उसके बाहर भी लोगों को आहार सम्बन्धी सूचनाएॅ देता है।
  2. यह आहार विज्ञान का पाठ्यक्रम तैयार करता है तथा उसकी शिक्षा की व्यवस्था करता है, यथा आहार रसोईघर में छात्र 'Nurse' को कार्य करते समय निरीक्षण करता है। 
  3. लोगों में पोषण विज्ञान की जानकारी देता है, जिसमें वे स्वास्थ्य की देखरेख ठीक कर सके, एवं घातक बीमारियों से रक्षा कर सकें।
इस प्रकार डायटीशियन की भूमिका आहार सम्बन्धी ज्ञान में महत्वपूर्ण है। वह लोगों के स्वास्थ्य ज्ञान के अनुकूल भोजन की सूची तैयार करता है। वह लोगों के स्वास्थ्य को बनाये रखने में मदद करता है। 

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पोषण शिक्षा (Nutrition Education)

पोषण सम्बन्धी शिक्षा देने के तीन माध्यम हैं। पहली बात कि कुछ विशेष लोगों को इस शिक्षा में निपुण और दक्ष बनाया जाए, ताकि बाद में उनके जरिए इस ज्ञान को अधिक व्यापक क्षेत्र में लोगों तक पहुॅचाया जा सके। ऐसे विशेषज्ञ तैयार हो जाएॅ तो हेल्थ सेण्टर या मातृ—शिशु कल्याण केन्द्र जैसे सार्वजनिक स्थानों पर इनकी नियुक्ति , इस उद्देश्य से की जा सकती है कि वे पोषण शिक्षा का प्रसार करें और हर व्यक्ति् को इस संदर्भ में जागरूक बनाएॅ। दूसरी बात यह है कि अन्य पेशों के लोगों को जैसे — शिक्षक वर्ग, समाज कल्याण कार्य में लगे कर्मचारी, जन स्वास्थ्य अधिकरी, नर्से, सामुदायिक परियोजनाओं के कर्मचारीगण, विविध प्रोजेक्टों में काम करने वाले लोगों को पेाषण सम्बन्धी शिक्षा से प्रशिक्षित किया जाय, जिसे निश्चित अवधि के प्रशिक्षण के रूप में अनिवार्य बनाया जाए तथा बाद में इन्हीं के माध्यम से अधिकाधिक लोगों तक इस ज्ञान का प्रसार किया जाय। चूॅकि प्राय: इस प्रकार के पेशों में लोग जनसमूह के सम्पर्क में आते हैं तो सहज—स्वाभाविक है कि आहार के पोषक तत्व, उनका महत्व, उनके अभाव से होने वाले भयंकर रोग, उनके गलत प्रयोगजनित हानियों, आहार का चिकित्सीय प्रयोग, आहार के द्वारा रोग से मुक्ति् आदि की जानकासरी यदि उन्हें दी जाएगी तो उन्हीं केे द्वारा ये सब जानकारी तमाम लोगों तक और उनके द्वारा आगे बढ़ती हुई और अधिक लोगों तक पहुॅच सकेगी। शायद लक्ष्य तक, यानी ​अन्तिम आदमी तक भी पहुॅच सकती है। तीसरा उपाय है कि सरकार की ओर से राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम चलाए जाएॅ। इन कार्यक्रमों की अपने निर्धारित कार्यक्रमों क्षरा ही—बहुत बड़े जनमसुदाय तक पहुॅच हो जाती है। इस तरह पोषण शिक्षा का स्वत: प्रसार होता रहता है। 
अन्तर्राष्ट्रीय ऐजेन्सियों के द्वारा भी पेाषण शिक्षा का प्रसार किया गया है और अब भी हो रहा है। ये हैं, फाओ (FAO), हू (WHO), केयर (CARE),  यूनिसेफ (UNICEF)  तथा वलर्ड फॅूड प्रोग्राम (WFP) आदि। इनके उद्देश्य यद्यपि अनेकानेक हैं और ये कुपोषण के निवारण के कार्यक्रमों को चलाती है, ये पोष्टिक आहारों का जरूरतमन्द लोगों में वितरण करती हैं परन्तु, इनका योगदान पोषण शिक्षा में भी कम नहीं है। इनके प्रयासों से लोग पोषण के महत्व को समझने का प्रयास करने लगे है। पेाषण सम्बन्धी अनुसंधान करने वाली संस्थाएॅ — जैस — सेण्ट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल इन्स्टीट्यूट (मैसूर) तथा नेशनल इन्स्टीट्यूट आॅफ न्यूट्रीशन (हैदराबाद) आदि, अपने यहॉ से अल्पावधि के शोषण शिक्षण कार्यक्रम जब—तब आयोजित करती रहती है और पेाषण के प्रसार में हाथ बटाती है। ये अपने यहॉ से पोषण सम्बन्धी जानकारी देने वाले पैम्पलेट और पत्रिकाएॅ भी निकालती हैं, जो प्रसार के श्रेष्ठ माध्यम हैं।
पोषण शिक्षा के प्रसार का एक अच्छा साधन नारी संघ या महिला मंडल है। आजकल आयेाजित किए जाने वाले आंगनबाड़ी कार्यक्रमों में महिलाएॅ एक स्थान पर एकत्रित होती है। यह एक अच्छा अवसर रहता है। महिलाओं को पोषण शिक्षा देने का। इनकों व्यावहारिक प्रदर्शन से बड़ा लाभ पहुॅचाया जा सकता है। प्राय: घर का आहार प्रबन्ध महिलाओं केे हाथ में ही होता है और वे खाने की चीज सिखाने से, उन्हें पोषण सम्बन्धी जानकारी देने से, उन्हें सस्ते और सहज उपलब्ध मसामानों से पौष्टिक व्यंजन बनाने से, सम्पूर्ण समाज का लाभ होता है। इसी अवसर का लाभ उठा कर उन्हें पोषण विज्ञान के मूल सिद्धान्तों का सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान कराया जा सकता है। विभिन्न पदार्थो में मिलने वाले पोषक तत्वों की जानकारी देकर महिलाओं के सहयोग से सम्पूर्ण समुदाय की आहार सम्बन्धी आदतों को भी बदला जा सकता है। प्रत्येक समुदाय में आहार सम्बन्धी कुछ भ्रामक आस्थाएॅ भी फैली होती है। उन्हें दूर करवाने का एकमात्र श्रेष्ठ जरिया महिलाएॅ अर्थात् गृहिणियॉ ही है।
तीसरा जरिया पोषक शिक्षा के प्रसार के लिए है — स्कूल, पाठशाला और विद्यालय के पाठ्यक्रम में पोषण विज्ञान के आरम्भिक ज्ञान को रखकर इसी स्तर पर जानकारी दी जा सकती है। अधिक जानकारी की जिज्ञासा भी उनमें पैदा की जा सकती है। पाठशाला में वाटिका लगाकर सब्जियॉ उगाने में सफलता प्राप्त करके बच्चे घरों में भी साग—सब्जी उगाने के लिए प्रेरित होत हैं। आरम्भिक शिक्षा में ही इस ज्ञान की नींव उालने से एक सजग ​सक्रियता (पोषण के प्रति) से सम्पन्न नई पीढ़ी का निर्माण को सकता है, जो आगे स्वत: इस संदर्भ में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छुक रहेगी। इनकी भावी राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इताना तो पक्की तौर से कहा जा सकता है कि संतोषजनक पोषण स्तर की प्राप्ति के लिए सुलभ, सस्ते भोज्य पदार्थो की उपयोग में लाने की कला—सम्बन्धी शिक्षा छात्र—छात्राओं को दी जानी चाहिए। इसी प्रकार से अन्य स्थलों और अन्य अवसरों का जहॉ जनसमुदाय एकत्रित होता है, (जैसे मेला, झॉकी आदि) पूरा लाभ उठाया जा सकता है। प्रदर्शनी लगाकर भी सीधे—सरल ढंग से पोषण शिक्षा का प्रसार किया जा सकता है।


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पोषण की स्थिति का अनुमान (Measurement And Situation of Nutrition)

पोषण की स्थिति का अनुमान चिकित्सकों द्वारा लगाया जाता है, जो निम्नलिखित परीक्षणों के आधार पर किया जाता है — 
  1. लक्षण परीक्षण 
  2. मानवमिति परीक्षण 
  3. जैव रासायनिक परीक्षण 
  4. खुराक सर्वेक्षण

लक्षण परीक्षण

लक्षण परीक्षण द्वारा पोषण की स्थिति का अनुमान प्राय: पूर्ण सकूलगामी बच्चों में लगाया जाता है, क्येाकि इस आयु वर्ग में पोषक तत्वों के अभाव व अधिकता के लक्षण शीघ्र दिखाई देते हैं। इसमें बच्चों के शारीरिक संगठन, बाल, मुंह, होठ, त्वचा, आॅख आदि का निरीक्षण किया जाता है। 

मानवमिति परीक्षण

इस परीक्षण के अंतर्गत व्यक्ति की ऊॅचाई, भार के सूचकांक द्वारा पोषण स्तर का पता लगाया जाता है। 

खुराक सर्वेक्षण 

पारिवारिक खुराक सर्वेक्षण द्वारा व्यक्ति के प्रतिदिन के पोषक तत्वों की ग्रहण की गई मात्रा का पता लगाकर उसकी आहार त्रुटियों को दूर करने का सुझाव दिया जाता है। 

जैव रासायनिक परीक्षण

इस परीक्षण में व्यक्ति के रक्त, मल, मूत्र, की जॉच के आधार पर पोषक तत्वों की कमी अथवा अधिकता की मात्रा का पता लगाया जाता है। 

पोषण के आधारभूत सिद्धान्त (Basic Principles of Nutrition)

पोषण सभी जीवित जीवों की प्राथमिक आवश्यकता है, उसके बिना उसका जीवित रहना असम्भव है। पोषण विज्ञान अध्ययन की वह शाखा है जिसमें भोजन और उसके शरीर के द्वारा उपयोग पर प्रकाश डाला जाता है। पोषण हेतु सन्तुलित आहार की आवश्यकता पड़ती है, और यही हमारे शरीर को विशिष्ट कार्य हेतु आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराता है। 
आहार ही वह सामग्री भी उपलब्ध कराता है जिससे हमारा शरीर अपने टिशुओं का निर्माण एवं क्षतिग्रस्त टिशुओं की मरम्मत करता है, अंगों एवं अंगतन्त्र को नियन्त्रित करता है। व्यक्ति किसी जाति, समुदाय अथवा आर्थिक वर्ग का हो भोजन ही उसके स्वास्थ्य का आधार होता है। 
पौष्टिक भोजन द्वारा ही मानव शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक जीवन का सन्तुलित विकास कर सकता है। सभी भोजन को पोषक आहार के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। पोषक तत्वों को ध्यान में रखते हुए, कोई भी भोजन न ही अच्छा और न बुरा होता है। 
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रत्येक व्यक्ति की अवस्था, कार्य की प्रकृति तथा शारीरिक आवश्यकता होती है। प्रात: काल का नाश्ता विशेषकर शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के लिए ऊर्जा के रूप में महत्वपूर्ण है।

महत्वपर्ण पोषक

शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए तथा बाह्य रोगों से रक्षा करने के लिए भोजन के सभी पौष्टिक पदा​र्थो का विभिन्न अनुपातों में पाया जाना आवश्यक है। पौष्टिक तत्वों के सापेक्षि​क महत्व को ध्यान मे रखते हुए खाद्य पदार्थो को निम्नलिखित तीन भागों में बांटा जा सकता है।
  1.  वैसे भोज्य पदार्थ जिसमें प्रोटीन तत्वों की मात्रा अधिक हो। 
  2. वैसा भोजन जिसमें कार्बोज की मात्रा अधिक हो।
  3. वैसे भोज्य पदार्थ जिसमें शारीरिक रक्षात्मक तत्वों की अधिकता हो जैसे विटाामिन तथा खनिज लवण। 
अर्थात् भेाजन में पोषकों की किस्में मुख्यत: छ: प्रकार की होती है।
(1) कार्बोहाइड्रेट्स (2)  प्रोटीन (3)  वसा/चर्बी  (4) विटामिन  (5)  जल   (6) खनिज लवण
कार्यो के आधार पर पोषक तत्वों को चार वर्गो में बांटा जाता है —
  1. ऊर्जा उत्पादक पोषक तत्व — कार्बोज, वसा, प्रोटीन। 
  2. शरीर निर्माणक पोषक तत्व — प्रोटीन खनिज, लवण, जल। 
  3. सुरक्षात्मक पोषक तत्व — विटाामिन, खनिज लवण, जल।
  4. नियमात्मक पोषक तत्व—जल व फोक।  

वृद्धि और विकास के लिए पोषण — 

शारीरकि तथा मानसिक विकास को समूचित बनाए रखने के लिए शरीर को उत्तम पोषण की आवश्यकता होती है। इससे शरीर का उत्तम, विकास, जिसके अंतर्गत सीधी अस्थियॉ तथा भुजाएॅ चौड़ी, सपाट छाती, मजबूत एवं स्वस्थ दांत, कान्तिमय त्वचा सभी कुछ सम्मिलित है।
शरीर में पोषक तत्वों की मात्रा हमारे भेाजन की आदत एवं भोज्य पदार्थो के गुणों से निर्धारित करता है। हमारे शरीर की सबसे छोटी क्रियाशील इकाई कोशिका से लेकर अंगों का विकास इसी भोजन की उपलब्धता से सम्भव है।
पोषण के द्वारा ही हमारे शरीर को आवपश्यक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। शरीर में ऊष्मा बनाए रखने शारीरिनक कार्य करने के लिए मांसपेशियों को सक्रियता प्रदान करने के लिए एवं हमारे दैनिक कार्यो को सम्प्न्न करने हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
सामान्यत: शारीरिक श्रम करने वालों को मानसिक​ श्रम करने वालेां की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। भोजन में प्रोटीन के तत्व हमारे ​शरीर का निर्माण करते हैं। खनिज लवण तथा विटाामिन जैसे पोषक तत्व हमारे शरीर के लिए सुरक्षात्मक कार्य करते है।

अल्प पोषण तथा कुपोषण — 

जब शरीर को आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्व नहीं मिलते हैं तथा पोषण गुणात्मक स्तर पर भी निम्न स्तर के होते हैं तो उस अवस्था को अल्प पोषण कहा जाता है। यह शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के विकास में हास लाता है तथा हीनता जन्य रोग का शिकार हो जाता है।

अल्प पोषण के कारण — 

इसके दो महत्वपूर्ण कारण है —
  1. परिस्थितियों का अनुकूल न होना। 
  2. भेाजन का मात्रा तथा गुणवत्ता के आधार पर दोषपूर्ण होना। 
अल्प पोषण भारत की एक महत्वपूर्ण समस्या है। क्योंकि यहां पर जिस परिस्थिति में कार्य किया जाता है उस स्तर का पोषण उपलब्ध नहीं हो पाता है। इसकी अनेक वजहें हैं जैसे अत्यधिक कार्य, अस्वस्थ वातावरण, अनियमित तथा अल्प भेाजन आदि।
यह पूर्णतया सत्य है कि अल्प पोषण मानव शरीर को क्षीण बना देता है तथा धीरे—धीरे मानव अनेको रोगों से ग्रस्त हो जाता है। शरीर की वृद्धि रूक जाती है, बाल झड़ने लगते हैं, आखों की रेाशनी कम हो जाती है तथा रोग से लड़ने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
कुपोषण के कारण कई प्रकार की बीमारियां हो जाती है जो निम्नलिखित है —

क्वाशियोरकर 

यह प्राय: बच्चों में प्रोटीन की कमी के कारण होता है। जब बच्चों को दूध छुडाने के पश्चात् पूरक आहार सही तरीके से नहीं मिल पाता है तब यह रोग होता है।

मैरास्मस — 

यह छोटे बच्चों में तब होता है जब कैलोरी की अधिक कमी हो जाती है। इसके कारण बच्चों के चेहरे सिकुडें तथा झुरींदार हो जाते हैं तथा शरीर से बड़ा सिर दिखाई पड़ता है।

रक्ताल्पता — 

यह शरीर में लौह लवण की कमी तथा प्रोटीन की कमी के कारण होता है। इसमें शरीर में लाल रक्त की कमी हो जाती है तथा व्यक्ति की आंखो में पीलापन तथा शीघ्र ािकावअ की अनुभूति होती है। यह अधिकंशतया बच्चों एवं महिलाओं में होता है।

फ्लॉरोसिस — 

यह रोग जल में फ्लोरीन की अधिकता के कारण होता है। रोग के कारण दांतों में धब्बे पड़ जाते है तथा उनमें गड्ढे हो जाते है। भारत में कुपोषण की समस्या अत्यधिक है तथा इसे दूर करने की शीघ्र आवश्यकता है। पोषण विज्ञान के अंतर्गत मुख्यत: शारीरिक पोषण की आवश्यकता तथा प्राप्ति के स्त्रोत एवं इसकी कमी से होने वाली बीमारियों का अध्ययन किया जाता है इसमें खाने की आदतें, भार का नियन्त्रण, पौष्टिक तत्वों की मात्रा आदि इसके सिद्धान्त है।
भार को उचित रखने का सबसे आसान तरीका है भेाजन की आदतों को ठीक करना तथा शारीरिक व्यायाम को दिनचर्या में शा​मिल करना। इन दोनों के कारण शरीर कम मोटा होता है तािा मांसपेशियों की बनावट भी उचित रहती है। आदर्श वजन तय करते समय शारीरिक बनावट पर ध्यान देना आवश्यक होता है। पुरूषों में शारीरिक वसा का वजन शरीर के कुल वजन के 20 प्रतिशत और स्त्रियों के लिए 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। 
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पोषण एवं स्वास्थ्य (Nutrition And Health)

पोषण से आशय (Meaning of Nutrition) 

जीवों की वृद्धि, विकास तथा अनुरक्षण एवं सभी प्रकार के जैव प्रक्रमों के सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक सभी पोषक पदार्थो के अधिग्रहण को पोषण कहा जाता है। 
अत: पोषण वह विज्ञान है जिसके अध्ययन से हमें निम्नलिखित प्रक्रियाओं का ज्ञान होता है — 
  1. जीवति जीवों के द्वारा भोजन को ग्रहण करना और उसकी पाचन क्रिया। 
  2. पाचन क्रिया के उपरान्त भोजन के पोषक तत्वों का रक्त द्वारा अवशोषण। 
  3. सभी प्रकार के अवशोषित पोषक तत्वों की शारीरिक कोशिकाओं के द्वारा उपयोग की प्रक्रिया
अत: पोषक तत्वों की उपरोक्त प्रक्रियाओं से गुजरने के फलस्वरूप शरीर को ऊर्जा तथा कार्यक्षमता मिलती है। 
  1. इन पोषक तत्वों के कारण शरीर को ऊर्जा तथा रोगों से लड़ने की क्षमता हासिल होती है।
  2. इस कारण शरीर से व्यर्थ पदार्थो का निष्कासन हो जाता है। 
  3. शरीर की कोशिकाओं का निर्माण, ऊतकों और अंगों का विकास होता है। 
वे पदार्थ जो प्राणी के विभिन्न प्रकार के जैविक कार्यो के संचालन एवं सम्पादन के लिए आवश्यक होते हैं, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। पोषण तीन प्रकार के होते हैं — पूर्णभोजी पोषण, परजीवी पोषण तथा मृतपजीवी पोषण। 

पोषण के महत्वपूर्ण चरण 

प्राणियों के पोषण के निम्नलिखित महत्वपूर्ण चरण है — 
  1. अन्तर्ग्रहण — भोजन को शरीर के भीतर पहुंचाने की प्रक्रिया को अंतर्ग्रहण कहते है। 
  2. पाचन — ठोस, जटिल, बड़े—बड़े अघुलशील भोजन अणुओं का विभिन्न एन्जाअमों की सहायता से तथा विभिन्न क्रियाओं द्वारा तरल, सरल, छोटे—छोटे घुलनशील अणुओं में निम्नीकरण को पाचन कहते है।
  3. अवशोषण — कोशिकाओं द्वारा पचे हुए भेाजन को अपने भीतर सोख लेने की प्रक्रिया ​अवशोषण कहलाती है। 
  4. स्वांगीकरण — कोशिकाओं के भीतर पचे हुए भोजन से नए जीवद्रव्य के संश्लेषण की प्रक्रिया अथवा फिर संचित भोजन आक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा—मुक्ति की प्रक्रिया को स्वांगीकरण कहते है। 
  5. बहिष्करण — मल के रूप में अनपचे भोजन की गुदा द्वारा शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को बहिष्करण कहते हैं। पोषण विज्ञान द्वारा हम मनुष्य के शरीर की वृद्धि व विकास कार्यक्षमता व क्रियाशाीलता, स्वास्थ्य, मनोवृत्ति व व्यवहार संबंधी सभी, आवश्यकताओं व प्रक्रियाओं जिनका आहार से स्पष्ट संबंध है, अध्ययन करते हैं। 

पोषण के प्रकार 

पृथ्वी पर स्थित सभी जीवित प्राणियों द्वारा भोजन ग्रहण किया जाता है और पोषण प्रक्रिया द्वारा उसका शारीरिक उपयोग किया जाता है जिससे उसके शरीर का निर्माण तथा विकास होता है अर्थात् किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य पोषण की स्थिति पर निर्भर करता है। 
पोषण की स्थिति निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है — 
  1. सुपोषण (Good Nutrition)
  2. कुपोषण ( Mal Nutrition)
कुपोषण के अन्तर्गत निम्नलिखित स्थिति सम्भव हो सकती है — 
  1. अत्यधिक पोषण 
  2. अपर्याप्त पोषण 
  3. असन्तुलन 

सुपोषण 

मानव आहार में वे सभी तत्व शामिल हों जिससे उसके शरीर को आवश्यकतानुसार सभी पेाषक तत्व मिल सकें, तो इसे सुपोषण/ उत्तम पोषण कहा जाता है। यह व्यक्ति् का शरीर भार, आकार व अनुपात में उचित होता है अर्थात् इनकी मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित, सुदृढ़ व सुगठित होती हैं। यह व्यक्ति सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक रूप से सशक्त होता है। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती हैं। सुपोषित व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित व खुश रहता है। यही कारण है कि वह किसी भी कार्य को उत्साहपर्वक तथा एकाग्रचित होकर सम्पन्न कर पाता है। यह किसी राष्ट्र की महत्वपर्ण नागरिक सम्पत्ति है। 

कुपोषण 

कुपोषण उस अवस्था को कहा जाता है जब मनुष्य को उसकी शारीरकि आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्व नहीं मिलते हैं अथवा कोई तत्व आवश्यकता से अधिक या कम मिलते हैं। अथवा कोई तत्व आवश्यकता से अधिक या कम मिलते हैं। इस कारण मनुष्य की शारीरिक वृद्धि, समुचित विकास तथा कार्य क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह मुख्यत: समाज के निम्न वर्गो में पाया जाता है जहॉ का प्रदूषित वातावरण व संक्रामण इस स्थिति को और अधिक उग्र बना देता है। कुपोषण के लिए जागरूकता रिबन 'नारंगी रंग' का होता है। कुपोषण को तीन भागों में बांटा जा सकता है।

अपर्याप्त पोषण 

जब मानव को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं से कम मात्रा में पौष्टिक तत्व मिलते हैं तो उसे अपर्याप्त पोषण कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर की अपेक्षित वृद्धि और विकास नहीं हो पात है जिससे पौष्टिक तत्वों की हीनता जनित रोग उत्पन्न होने लगते है।

अत्यधिक पोषण 

जब व्यक्ति को उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा से अधिक मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं तो उसे अत्यधिक पोषण कहते है। अधिक पोषण तत्वों की मात्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। जैसे — विटामिन ए, डी, लोहा, खनिज, लवण, आदि। मोटापे का कारण भी अत्यधिक पोषण होता है। यह मुख्यत: समाज के सम्पन्न वर्गो में पाया जाता है तथा अनेक बीमारी के पीछे यही वज​ह होती है।

असन्तुलन 

शरीर को पोषक तत्वेां की आवश्यकता तो होती है परन्तु एक सन्तुलित मात्रा में, जब यह मात्रा सन्तुलित नहीं रहती है तो स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है। 
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