सिंहासन बत्तीसी की कहानी भाग-2

 त्रिलोचनी पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की ग्यारहवीं कहानी

हर बार की तरह इस बार भी राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए राज दरबार पहुंचते हैं। इस बार सिंहासन की ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचना उन्हें रोक देती है। फिर वह राजा विक्रमादित्य के गुणों के बारे में बताने के लिए महायज्ञ का एक किस्सा सुनाने लगती है।
            एक बार राजा विक्रमादित्य ने राज्य की खुशहाली के लिए महायज्ञ करने की घोषणा की। इसमें उन्होंने सभी राजा-महाराजा, पंडित-ब्राह्मण, देवी-देवताओं और ऋषी-मुनियों को आमंत्रित करने का फैसला लिया। सभी को आमंत्रण भेजने के बाद राजा विक्रमादित्य ने पवन देव को खुद जाकर निमंत्रण देने की ठानी और समुद्र देव को आमंत्रित करने के लिए एक ब्राह्मण का चयन किया।
            राजा का आदेश मिलते ही ब्राह्मण देव निमंत्रण पत्र लेकर समुद्र देवता के पास जाने के लिए निकल पड़े। साथ ही राजा विक्रमादित्य भी पवन देव की खोज के लिए एक जंगल पहुंचे। यहां उन्होंने कुछ दिनों तक ध्यान लगाया, ताकि उन्हें पवन देव के बारे में कुछ जानकारी मिल सके। मां काली ने उनके ध्यान से खुश होकर राजा विक्रमादित्य को बताया कि पवन देव सुमेरू पर्वत पर रहते हैं।
            पवन देव के बारे में पता चलते ही राजा ने बेताल को बुलाया। बेताल कुछ ही देर में उन्हें लेकर सुमेरू पर्वत पर पहुंचा दिया। पर्वत पर तेज हवाएं चल रही थीं, लेकिन पवन देव कहीं नहीं दिखे। फिर राजा विक्रमादित्य ने पवन देव का ध्यान लगाया। उनकी साधना से खुश होकर पवन देव वहां प्रकट हुए और कहा, “हे राजन! बताओ, मुझे क्यों याद किया।” जवाब देते हुए महाराज ने कहा, “हे देव, मेरी इच्छा है कि आप मेरे राज्य में होने वाले महायज्ञ में आएं। यज्ञ का निमंत्रण देने के लिए ही मैंने आपका ध्यान किया था।”
            राजा विक्रमादित्य की बातें सुनने के बाद पवन देव ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह यज्ञ में नहीं आ सकते। राज्य में उनके आने से भयंकर तूफान आएगा, जिससे सब कुछ तबाह हो सकता है। पवन देव ने विक्रमादित्य को समझाते हुए कहा कि वो संसार के हर कोने में मौजूद हैं। उनके यज्ञ में भी वो उपस्थित रहेंगे, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से।
            पवन देव ने इतना कहने के बाद राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया कि उनके राज्य में कभी सूखा और अकाल नहीं पड़ेगा। साथ ही इच्छाओं को पूरा करने वाली एक कामधेनु गाय भी उन्हें दी और वहां से चले गए। उसके बाद राजा भी बेताल की मदद से राज्य वापस आ गए।
            इधर, राजा पवन देव से मिलकर लौट आए। उधर, समुद्र देवता से मिलने के लिए ब्राह्मण कई मुसीबतों का सामना कर रहे थे। जैसे-तैसे वह सागर के पास पहुंचे और समुद्र देवता को कई बार बुलाया, लेकिन समुद्र देवता प्रकट नहीं हुए। ब्राह्मण देव भी थकने वालों में से नहीं थे, वो बार-बार समुद्र देवता को बुलाते रहे। उनकी पुकार से खुश होकर समुद्र देवता प्रकट हुए और ब्राह्मण ने विक्रमादित्य के महायज्ञ के बारे में उन्हें बताया।
            निमंत्रण मिलने के बाद समुद्र देव ने कहा कि उन्हें पवन देव से इस महायज्ञ के बारे में पता चल गया था, लेकिन वो यज्ञ में नहीं आ सकते। उन्होंने बताया कि अगर वो प्रत्यक्ष रूप से वहां आएंगे, तो पूरा राज्य बह जाएगा। इसी वजह से वो यज्ञ के दौरान जल की हर बूंद में अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहेंगे।
            इतना कहकर समुद्र देवता ने ब्राह्मण को पांच रत्न और एक घोड़ा देते हुए कहा कि ये सब उपहार महाराज विक्रमादित्य को दे देना। इतना कहने के बाद समुद्र देवता अदृश्य हो गए। अब ब्राह्मण तेजी से सारे उपहार लेकर राज्य की ओर चलने लगे। ब्राह्मण को पैदल चलता देखकर समुद्र देवता से मिले घोड़े ने ब्राह्मण से पूछा कि आप पैदल जाने की जगह मुझे अपनी सवारी क्यों नहीं बना लेते? ब्राह्मण चलते रहे, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर घोड़े ने उन्हें समझाया कि वह राजा के दूत हैं, इसलिए उपहार का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सुनकर ब्राह्मण घोड़े पर बैठे और कुछ ही देर में राजमहल पहुंच गए।
            राज दरबार पहुंचते ही ब्राह्मण ने सारी बातें महाराज विक्रमादित्य को बताई। साथ ही समुद्र देवता द्वारा दिए गए उपहार भी उनको दे दिए। राजा ने खुश होकर कहा कि आपने अपना काम बहुत अच्छे से किया है, इसलिए इन सभी भेंट को आप रख लें। ब्राह्मण घोड़ा और रत्न लेकर खुशी-खुशी अपने घर को लौट गए।
            इस कहानी को सुनाने के बाद ग्यारहवीं पुतली सिंहासन से उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-
कोशिश करने से हर काम पूरा हो जाता है। राजा विक्रमादित्य ने भी अंतिम समय तक कोशिश नहीं छोड़ी और आखिरकार पवन देव को उनके सामने आना ही पड़ा। इसलिए, बच्चों आपको भी जब तक सफलता न मिले, प्रयास करते रहना चाहिए।

 

पद्मावती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की बारहवीं कहानी

विक्रमादित्य की खूबियों के बारे में बताने के लिए इस बार बारहवीं पुतली सिंहासन से निकलती है। वह राजाभोज को राजा विक्रमादित्य और एक राक्षस की कहानी सुनाती है।
            एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने राज-पाठ का काम खत्म करके सुहाने मौसम का आनंद उठा रहे थे। तभी उन्हें एक महिला की चीख सुनाई दी। वह मदद के लिए के लिए लोगों को पुकार रही थी। उसकी आवाज सुनते ही राजा तलवार लेकर घोड़े पर सवार हुए और तेजी से आगे बढ़ने लगे। कुछ समय बाद राजा उस जगह पहुंच गए, जहां से महिला के चीखने की आवाज आ रही थी।
            राजा ने देखा कि उस महिला के पीछे एक भयानक राक्षस पड़ा हुआ है। विक्रमादित्य बिना देरी किए अपने घोड़े से कूद गए। महाराज को अपने सामने देखकर महिला बिलखते हुए उनसे मदद मांगने लगी। तब राजा विक्रमादित्य ने कहा, “बहन, अब तुम्हारी जान मैं बचाऊंगा। तुम चिंता मत करो।”
            इतने में वहां राक्षस पहुंच गया और राजा विक्रमादित्य से कहने लगा कि एक साधारण इंसान उससे युद्ध में जीत नहीं सकता है। फिर जोर-जोर से हंसते हुए राक्षस कहता है कि मैं पल भर में तुम्हें मार सकता हूं। इतना कहते ही राक्षस, तुरंत महाराज पर हमला करने के लिए आगे बढ़ता है।
            राजा विक्रमादित्य राक्षस को चेतावनी देते हैं, लेकिन राक्षस ने उनकी एक नहीं सुनी। तभी विक्रमादित्य तलवार से राक्षस पर हमला कर देते हैं। राक्षस ने खुद को तलवार के हमले से बचाया और युद्ध करना शुरू किया। महाराज विक्रमादित्य काफी चतुर थे, इसलिए उन्होंने पहले राक्षस को थकाया। उसके बाद राक्षस का सिर काट दिया।
            सिर कटने के बाद राजा को लगा कि राक्षस मर गया, लेकिन तभी उसके शरीर पर दोबारा कटा हुआ सिर जुड़ गया। साथ ही जहां उस राक्षस का रक्त गिरा था, वहां से दूसरा राक्षस पैदा हो गया। यह देखकर राजा विक्रमादित्य हैरान हो गए। फिर दोनों राक्षसों ने महाराज से लड़ाई करना शुरू कर दिया।
            सबसे पहले रक्त से जन्मा हुआ राक्षस राजा पर हमला करता है। राजा चतुराई से उसके प्रहार से बचते हुए अपनी तलवार से उसके दोनों हाथ और पैर काट देते हैं। अपने साथी राक्षस को दर्द से तड़पता हुआ देखकर दूसरा राक्षस उसे लेकर वहां से भाग जाता है। राजा के पास उस दूसरे राक्षस पर हमला करने का मौका था, लेकिन राजा ने सोचा पीठ दिखाकर भागते हुए राक्षस पर हमला नहीं किया जाना चाहिए।
            इसके बाद राजा सीधे उस महिला के पास चले गए। विक्रमादित्य ने उससे कहा “राक्षस डर कर भाग गया है, तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें तुम्हारे माता-पिता के पास पहुंचा दूंगा।” तभी वह महिला कहती है “अभी खतरा टला नहीं है, क्योंकि राक्षस मरा नहीं सिर्फ भागा है। वो दोबारा से आएगा।” उसकी बातें सुनकर राजा ने उसका नाम पूछा।
            महिला बताती है “वह सिंहुल द्वीप में रहने वाले एक ब्राह्मण की बेटी है। एक दिन वो तालाब में अपनी सहेलियों के साथ नहाने गई थी। उसी दिन इस राक्षस की नजर मुझ पर पड़ी और वो मुझे उठाकर यहां अपने साथ ले आया। वह मुझसे शादी करना चाहता है, लेकिन मुझे उस राक्षस की पत्नी नहीं बनना।”
            यह सुनकर राजा उस ब्राह्मण पुत्री से कहते हैं “मैं उस राक्षस को मारकर तुम्हें उससे आजाद करा दूंगा।” फिर विक्रमादित्य ने उससे राक्षस के बारे में पूछा कि वो दोबारा जिंदा कैसे हो रहा है। तब उस महिला ने बताया “राक्षस के पेट में एक मोहिनी रहती है, जो तुरंत उसके मुंह में अमृत डाल देती है। इसलिए, वह दोबारा जीवित हो जाता है, लेकिन वह रक्त से जन्मे दूसरे राक्षस को अमृत नहीं दे सकती है। इसलिए, उसके रक्त से जन्मा राक्षस दर्द से तड़प रहा था।”
            फिर राजा ने स्त्री से मोहिनी के संबंध में पूछा, लेकिन ब्राह्मण पुत्री को उसके बारे में कुछ मालूम नहीं था। मोहिनी के बारे में सोचते हुए विक्रमादित्य पास के पेड़ के नीचे आराम करने लगे। तभी उन पर एक शेर ने हमला कर दिया। शेर के पहले हमले से राजा के हाथ पर चोट लग गई।
            जैसे ही शेर ने राजा पर दूसरा हमला किया, महाराज विक्रमादित्य ने उस शेर के पैरों को पकड़कर उसे दूर फेंक दिया। तभी शेर अपने राक्षस रूप में आ गया। यह देखकर राजा समझ जाते हैं कि यह मायावी राक्षस है, जो छल से मुझसे हराने की कोशिश कर रहा है।
            राजा तेजी से राक्षस के पीछे भागे और उससे युद्ध शुरू कर दिया। लड़ते-लड़ते जब राक्षस थक गया, तब राजा ने अपनी तलवार से उसके पेट पर हमला किया। राक्षस दर्द के कारण चिल्लाने लगा। इसके बाद विक्रमादित्य ने उसके पेट को तलवार से काट दिया। पेट के फटते ही मोहनी उससे बाहर निकलती है और अमृत लाने के लिए भागने लगती है।
            इस देखकर विक्रम अपने बेतालों को बुलाकर मोहिनी को पकड़ने का आदेश देते हैं। काफी देर तक अमृत न मिलने की वजह से राक्षस तड़पकर मर जाता है। फिर महाराज विक्रमादित्य उस मोहिनी से पूछते हैं कि तुम कौन हो? मोहिनी बताती है “वह भगवान शिव की एक भक्त है, जिसे उसकी गलती के वजह से राक्षस की सेवा करनी पड़ रही थी। अब वह श्राप मुक्त हो गई है।”
            इतना सुनते ही राजा अपने साथ मोहिनी और उस ब्राह्मण पुत्री को महल लेकर आते हैं। महिला के माता-पिता का पता लगाकर महाराज उसे उसके घर सकुशल पहुंचा देते हैं। उसके बाद राजा मोहिनी से शादी करके खुशी-खुशी अपने महल में रहने लगते हैं।
            यह कहानी सुनाने के बाद बारहवीं पुतली राजा भोज से पूछती है कि क्या आप में हैं राजा विक्रमादित्य जैसे गुण और फिर वहां से उड़ जाती है।
कहानी से शिक्षा :-

लोगों की मदद करने से बड़ा कोई धर्म नहीं होता है और किसी तरह का काम मुश्किल नहीं होता। बस थोड़ा सोच-विचार कर कदम उठाना पड़ता है। 

कीर्तिमती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की तेरहवीं कहानी

बारहवीं पुतली की कहानी को सुनकर जैसे ही राजा भोज महाराज विक्रमादित्य के सिंहासन की ओर बढ़े तभी वहां पर तेरहवीं पुतली आ गई। तेरहवीं पुतली का नाम कीर्तिमती था। उसने राजा भोज को यह पूछते हुए रोक लिया कि क्या राजा विक्रमादित्य में मौजूद सभी खूबियां आपके अंदर है? राजा भोज ने हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया कि हे देवी! क्या आप उस खूबी के बारे में मुझे बता सकती हैं। तब कीर्तिमती ने महाराज विक्रमादित्य की कहानी कहना शुरू की।
            बहुत समय पहले की बात है राजा विक्रमादित्य ने बड़े-बड़े विद्वानों को अपने दरबार में मंत्रणा के लिए बुलाया और निमंत्रण के तौर पर उन्हें खूब सारा धन दान में दिया। जब राजा विक्रमादित्य का दरबार लगा था, तो सभी विद्वान एक स्वर में बोलने लगे कि इस धरती पर महाराज विक्रमादित्य सबसे बड़े दानी है।
            वहीं, महाराज ने एक ब्राह्मण को देखा जो शांत बैठा था। महाराज ने जब ब्राह्मण से उसके शांत होने का कारण पूछा, ताे ब्राह्मण ने कहा कि यदि राजा उसे अभय दान दें, तो वह कुछ बोलने की हिम्मत करेगा। तब राजा ने उसे वचन दिया। इसके बाद ब्राह्मण ने कहा कि महाराज बेशक आप बहुत बड़े दानी हैं, लेकिन सबसे बड़े दानी नहीं हैं।
            ब्राह्मण के वचनों को सुनकर सभी दरबारी ब्राह्मण की ओर देखने लगे और महाराज ने ब्राह्मण की निडरता की तारीफ की। इसके बाद विक्रमादित्य ने पूछा कि तो फिर इस धरती पर सबसे बड़ा दानी कौन है? तब ब्राह्मण ने कहा कि समुद्र की दूसरी ओर बहुत सम्पन्न राज्य है, जिसके राजा कीर्कित्तध्वज सबसे बड़े दानी हैं। वे राेजाना जब तक एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दान नहीं करते, तब तक वह कुछ भी ग्रहण नहीं करते हैं। मैंने भी कुछ दिन तक उनके दरबार में जाकर दान ग्रहण किया था।
            महाराज विक्रमादित्य ने ब्राह्मण की यह बात सुनकर उन्हें बहुत सारा धन देकर विदा किया और स्वयं बेताल की मदद से समुद्र के पार राजा कीर्कित्तध्वज के राज्य पहुंच गए। वे सीधा कीर्कित्तध्वज के दरबार में पहुंचे और उनसे अपने लिए एक नौकरी की मांग की।
            कीर्कित्तध्वज ने महाराज से उनका परिचय पूछा, तो विक्रमादित्य ने कहा कि वे एक साधारण नागरिक हैं और नौकरी की तलाश कर रहे हैं। तब कीर्कित्तध्वज ने उनसे पूछा कि आप क्या काम कर सकते हैं। तब राजा विक्रमादित्य ने कहा कि जो काम कोई नहीं कर सकता, वह मैं कर सकता हूं।
            राजा कीर्कित्तध्वज ने महाराज की यह बात सुनकर उन्हें अंगरक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। महाराज ने देखा कि राजा कीर्कित्तध्वज सच में रोजाना एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दान करता है, लेकिन इतनी स्वर्ण मुद्राएं राजा कीर्कित्तध्वज कहां से लाता है, यह जानने की विक्रमादित्य के मन में लालसा हुई।
            महाराज विक्रमादित्य ने देखा था कि राजा कीर्कित्तध्वज रोज शाम को कहीं जाता है और लौटते समय एक थैली में स्वर्ण मुद्राएं लेकर आता है। आखिर कीर्कित्तध्वज स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली कहां से लाता है, यह जानने के लिए एक दिन विक्रमादित्य कीर्कित्तध्वज का पीछा करते हैं।
            विक्रमादित्य नें देखा कि कीर्कित्तध्वज एक मंदिर में जाता है और नहा धोकर वहां पर मौजूद देवी की मूर्ति के सामने बड़े कड़ाहे में तेल डालकर उसमें कूद जाता है। महाराज यह देखकर चौंक जाते हैं। विक्रमादित्य आगे बढ़ने वाले होते ही हैं, लेकिन यह देखकर रूक जाते हैं कि वहां पर दो जोगनियां आती हैं और कीर्कित्तध्वज के शरीर को नोच-नोच कर खा जाती हैं।
            जब जोगनियां चली जाती हैं, तो देवी प्रकट होती है और अमृत की बूंद से कीर्कित्तध्वज को जीवित कर देती हैं। कीर्कित्तध्वज के जीवित होने के बाद देवी कीर्कित्तध्वज को एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देती हैं। उसके बाद राजा कीर्कित्तध्वज उन मुद्राएं को पाकर खुश होता है और वहां से चला जाता है।
            राजा कीर्कित्तध्वज के जाने के बाद महाराज विक्रमादित्य ने भी स्नान करके वही प्रक्रिया दोहराई, जो राजा कीर्कित्तध्वज ने की थी। इसके बाद देवी ने प्रकट होकर महाराज विक्रमादित्य को भी जीवित कर दिया और उन्हें स्वर्ण मुद्राएं देनी चाही, लेकिन विक्रमादित्य ने यह कह कर मना कर दिया कि देवी की कृपा ही उनके लिए सब कुछ है।
            इस प्रकार से विक्रमादित्य ने 7 बार इस क्रिया को लगातार दोहराया और सातवीं बार देवी ने उनसे बहुत प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। तब महाराज ने देवी से उस थैली को मांग लिया, जिसमें से वह एक लाख स्वर्ण मुद्राएं निकाल कर कीर्कित्तध्वज को देती थीं।
            देवी वह थैली महाराज विक्रमादित्य को दे देती हैं, इसके बाद पूरा मंदिर वहां से गायब हो जाता है। दूसरे दिन जब राजा कीर्कित्तध्वज वहां जाता है, तो उसे वहां सिर्फ मैदान ही दिखाई देता है। मंदिर न मिलने पर कीर्कित्तध्वज दुखी हो जाता है। वह सोचता है कि उसकी रोजाना एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देने का नियम अब टूट जाएगा। इस विचार के साथ वह अपने महल वापस आ जाता है और उदास होकर बैठ जाता है।
            तभी विक्रमादित्य वहां पहुंच जाते हैं और कीर्कित्तध्वज से उनकी उदासी का कारण पूछते हैं। तब राजा कीर्कित्तध्वज उन्हें सारी बात बताते हैं। राजा कीर्कित्तध्वज की बात सुनकर महाराज विक्रमादित्य उनके हाथों में वह जादूई थैली रख देते हैं, जो उन्होंने देवी से हासिल की थी।
            थैली को पाकर राजा कीर्कित्तध्वज को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने विक्रमादित्य से उनकी सच्चाई जाननी चाही और पूछा कि आखिर देवी की यह थैली उन्हें कैसे मिली। तब महाराज विक्रमादित्य ने राजा कीर्कित्तध्वज को सारी बात बताई।
            राजा कीर्कित्तध्वज को जब विक्रमादित्य की असलियत पता चली, तो उन्होंने विक्रमादित्य को गले से लगा लिया और कहा कि आप ही इस धरा पर सबसे बड़े दानी है। राजा कीर्कित्तध्वज से विदा लेकर महाराज विक्रमादित्य अपने राज्य वापस आ गए।
            तेरहवीं पुतली से महाराज विक्रमादित्य के दान की बात सुनकर राजा भोज गदगद हो गए और इस कहानी को सुनाकर कीर्तिमती भी पहले वाली पुतलियों की तरह उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-
बच्चों इस कहानी से यही सीख मिलती है कि आप जितनी संयम और दयावान होंगे, आप विश्व में उतने ही ज्यादा प्रसिद्ध होंगे।

सुनयना पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की चौदहवीं कहानी

तेरहवीं पुतली कीर्तिमती की कहानी को सुनकर राजा भोज कुछ देर सोचने लगे और फिर वापस से सिंहासन पर बैठने के लिए आतुर हो गए। तभी उन्हें चौदहवीं पुतली जिसका नाम सुनयना था, उसने राेक लिया। उसने कहा कि राजा क्या आप में भी वो गुण है, जो आपको इस सिंहासन के योग्य बनाता है? जब राजा ने पूछा कि वो कौन-सा गुण है, जो महाराज विक्रमादित्य में था और मुझमें नहीं है। तब चौदहवीं पुतली ने उसे महाराज विक्रमादित्य की कहानी सुनाई।
            महाराज विक्रमादित्य एक सर्व गुण सम्पन्न राजा थे। उनके राज्य में कोई भी दुखी नहीं था और वे छोटे-छोटे नागरिक की समस्या का समाधान भी करते थे। एक दिन उनके दरबार में कुछ किसान आए और प्रार्थना करने लगे कि महाराज हमारे राज्य में जंगल से निकल कर एक शेर आ गया है। वो राेजाना हमारे पशुओं को मारकर खा जाता है। कृप्या आप हमें इस मुसीबत से बचाइए। तब राजा ने उनसे कहा कि चिंता न करें हम कल ही उस शेर को इस राज्य से दूर किसी जंगल की ओर भगा देंगे।
            चूंकि, महाराज विक्रमादित्य बहुत पराक्रमी थे, लेकिन वे किसी भी निहत्थे प्राणी को नहीं मारते थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि वे कल उस शेर को किसी दूर जंगल में छोड़ आएंगे। अगले ही दिन वो कुछ सैनिकों के साथ उस शेर की तलाश में निकल पड़े। वह किसी खेत के पास वाली झाड़ियों में छुपा हुआ था। राजा ने देखते ही उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ा दिया। शेर ने जैसे ही घोड़े की टापों को सुना वह जंगल की ओर भागने लगा।
            राजा विक्रमादित्य भी तेजी से उसका पीछा करने लगे और शेर का पीछा करते-करते वह अपने सभी सैनिकों को बहुत पीछे छोड़ देते हैं। वहीं, घना जंगल होने के कारण राजा रास्ता भी भटक जाते हैं। फिर भी वह शेर को ढूंढने का पूरा प्रयास करते हैं और एक जगह रूक कर अनुमान लगाने लगते हैं कि शेर किस ओर गया होगा।
            तभी अचानक शेर ने झाड़ियों के पीछे से छलांग लगाई और राजा के घोड़े को घायल कर दिया। राजा ने शेर के इस वार को अपनी तलवार से रोक लिया और शेर को घायल कर दिया। शेर घायल होकर जंगल में कहीं दूर चला गया।
            अब जबकि विक्रमादित्य का घोड़ा घायल हो गया था और वह रास्ता भी भटक गए थे, इसलिए वो चलते-चलते एक नदी के किनारे पर पहुंचे, जहां पर पानी पीते-पीते घोड़े ने दम तोड़ दिया। राजा को यह देखकर बहुत दुख हुआ। बहुत थका होने के कारण राजा वहीं एक पेड़ के नीचे बैठकर आराम करने लगे। तभी नदी में उन्हें एक शव बहता हुआ दिखाई दिया, जिसे दोनों ओर से कोई पकड़े हुए था। राजा ने गौर से देखा तो उसे पता चला कि शव को एक ओर से बेताल और दूसरी ओर से कापालिक ने पकड़ा हुआ है और दोनों शव पर अपना अधिकार जमा रहे हैं।
            दोनों लड़ते हुए शव को किनारे पर ले आते हैं और राजा को देखकर उससे ही न्याय करने को बोलने लगते हैं और साथ ही शर्त रखते है कि यदि सही न्याय नहीं किया, तो वो राजा का वध कर देंगे। कापालिक ने कहा कि मैं इस शव के द्वारा अपनी साधना करना चाहता हूं और बेताल ने कहा कि मैं इससे अपनी भूख मिटाऊंगा। दोनों की बात सुनकर राजा ने भी कहा कि मैं जो कहूंगा दोनों उस बात को मानेंगे और न्याय के लिए आपको शुल्क देना होगा।
            दोनों ने राजा की बात मान ली और बेताल ने राजा को एक मोहिनी काष्ठ का टुकड़ा दिया, जिसका चंदन घिसकर लगाकर राजा गायब हो सकते थे। कापालिक ने एक बटुआ दिया, जिससे कुछ भी मांगने पर वह दे सकता था। तब राजा ने बेताल से कहा कि तुम मेरे घोड़े से अपनी भूख मिटा सकते हो और कापालिक को उसने शव दे दिया। दोनों ने राजा के न्याय की प्रसंशा की और वहां से चले गए।
            राजा को भूख लगी, तो उसने बटुए से भोजन मांग लिया और जंगली जानवरों से बचने के लिए अदृश्य हो गया। अगली सुबह वह बेतालों का स्मरण कर राज्य की सीमा पर पहुंच गए। रास्ते में राजा को एक भिखारी मिला, तो उन्होंने उसे कापालिक वाला बटुआ दे दिया, ताकि जिससे उसे कभी भोजन की कमी न रहे।
कहानी से शिक्षा:-

हमें इस कहानी से यह सीख मिलती है कि मुसीबत आने पर भी हमको कभी नहीं डरना चाहिए और अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।

सुंदरवती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की पन्द्रहवीं कहानी

जब राजा भोज फिर से सिंहासन की ओर बढ़ने लगे, तो पंद्रहवीं पुतली सुंदरवती ने उन्हें रोक दिया। उसने पूछा कि क्या आपके अंदर भी महाराज विक्रमादित्य जैसे ही प्रजा प्रेमी हैं? इतना कहकर पंद्रहवीं पुतली ने एक किस्सा सुनाना शुरू किया।
            राजा विक्रमादित्य के शासन से उज्जैन की पूरी प्रजा खुश थी। सभी को राजा की दानवीरता और दयालुता पर गर्व था। उसी राज्य में महाराज विक्रमादित्य जैसा ही एक दयालु व्यापारी पन्नालाल भी रहता था। वो बिना किसी लालच के लोगों की हर दम मदद करता था। पन्नालाल का एक बेटा भी उसी के जैसा गुणवान था। दोनों बाप-बेटे की अच्छाई के बारे में पूरा उज्जैन जानता था।
            कुछ समय बाद व्यापारी अपने बेटे की शादी के लिए लड़की ढूंढने लगे। तभी एक पंडित ने उन्हें बताया कि समुद्र के दूसरी ओर धनी राम नाम का एक व्यापारी रहता है, जो अपनी सुंदर और गुणवान बेटी के लिए लड़का ढूंढ रहा है। यदि आप कहें, तो उनसे विवाह की बात कर सकता हूं।
            यह सुनते ही पन्नालाल ने पंडित को खर्च के लिए मुद्राएं देकर उसे धनी राम व्यापारी के पास भेज दिया। धनी राम को पंडित का प्रस्ताव अच्छा लगा और उन्होंने शादी के लिए हां कर दी। दोनों परिवार की सहमति के बाद शादी का शुभ मुहूर्त भी तय हो गया।
            विवाह होने के कुछ दिन पहले उज्जैन में बहुत तेज बारिश होने लगी। तब पन्नालाल सेठ ने सोचा कि अगर इसी तरह बारिश होती रही, तो दूसरे राज्य जाकर बेटे की शादी कैसे कराएंगे? अगर वहां नहीं पहुंच पाए, तो बदनामी भी होगी। वह ऐसा सोच ही रहे थे कि पंडित ने पन्नालाल के चेहरे को देखकर उनकी चिंता समझ ली। पंडित से कहा, “सेठ जी, चिंता मत कीजिए। बस आप अपनी सारी समस्या महाराज विक्रमादित्य को जाकर बता दीजिए। उनके पास हवा से भी तेज चलने वाले रथ और घोड़े हैं। वो जरूर आपकी मदद करेंगे।”
            सेठ सीधे महाराज विक्रमादित्य के दरबार पहुंचा और अपने मन की बात हिचकिचाते हुए कही। व्यापारी की परेशानी सुनकर महाराज ने कहा कि हर राजा की असली संपत्ति उसकी प्रजा ही होती है। आप राजमहल से रथ और घोड़े ले जा सकते हैं। व्यापारी के जाते ही विक्रमादित्य ने बेतालों को बुलाया और कहा कि बारिश बहुत तेज है, जाओ जाकर व्यापारी और उसके परिवार की रक्षा करो।
            तभी व्यापारी अपने बेटे की शादी के लिए पूरे परिवार और रिश्तेदारों के साथ रथ लेकर दूसरे राज्य के लिए निकल गए। चलते-चलते वो समुद्र के किनारे पहुंच गए। गहरा पानी देखते ही व्यापारी के मन में हुआ कि अब रथ से समुद्र कैसे पार हो पाएगा। पन्नालाल यह सोच ही रहा था कि देखते ही देखते रथ पानी पर दौड़ने लगा। व्यापारी समय रहते ही पूरे परिवार के साथ विवाह स्थल पर पहुंच गए और धूमधाम से बेटे की शादी करके अपने नगर वापस आ गए।
            नगर पहुंचते ही सबसे पहले पन्नालाल अपने बेटे और बहू को लेकर राज महल पहुंचे और राजा से मुलाकात की। राजा ने उन दोनों को आशीर्वाद देते हुए पन्नालाल को कहा कि आप रथ और घोड़े बच्चों को दे देना। ये सब मेरी तरफ से उनके लिए शादी का तोहफा है।
            इतनी कहानी सुनाकर पंद्रहवीं पुतली भी उड़ गई और राजा भोज महाराज विक्रमादित्य का प्रजा प्रेम का किस्सा सुनकर खुश हो गए।
कहानी से शिक्षा:-
जरूरत पड़ने पर हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।

सत्यवती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की सोलहवीं कहानी

राजा भोज दोबारा सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़े। तभी 16वीं पुतली सत्यवती सिंहासन से बाहर आई और राजा भोज को गद्दी पर बैठने से रोकते हुए कहा, “ हे राजन, मैं आपको राजा विक्रमादित्य का एक किस्सा सुनाऊंगी। अगर आपको लगता है कि आप भी उतने ही महान हैं, तो इस सिंहासन पर बैठ जाना।” इतना कहकर 16वीं पुलती सत्यवती ने कहानी सुनाना शुरू किया।
            उज्जैन शहर में राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उनके न्याय और महानता की चर्चा दूर-दूर तक थी। राजा ने अपने बड़े- बड़े फैसलों और सुझावों के लिए 9 लोगों की समिति बना रखी थी। इन लोगों से ही राजा विक्रमादित्य राज-काज संबंधित सुझाव भी लेते थे। एक बार धन-संपत्ति को लेकर कुछ बात शुरू हुई। तभी पाताल लोक की बात भी सामने आई और एक जानकार ने पाताल लोक के राजा शेषनाग की तारीफ की। उन्होंने बताया कि उनके लोक में सारी सुख-सुविधाएं हैं, क्योंकि वो भगवान विष्णु के खास सेवकों में से एक हैं। शेषनाग का स्थान भगवान के बराबर माना गया है और जो भी उनके दर्शन करता है उसका जीवन धन्य हो जाता है।
            इतना सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने पाताल लोक जाकर उनसे मिलने का मन बना लिया। तभी राजा विक्रमादित्य ने अपने बेतालों को याद किया और उनके साथ पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने जानकारों की कही सारी बातों को सही पाया। जब शेषनाग को राजा विक्रमादित्य के आने की खबर मिली, तो वो उनसे मिलने पहुंच गए। राजा विक्रमादित्य ने शेषनाग को नमस्ते करते हुए अपना नाम और पाताल लोक आने का कारण बताया। राजा विक्रमादित्य की बातें सुनकर और उनके व्यवहार से शेषनाग इतने खुश हुए कि राजा विक्रमादित्य को जाते-जाते उपहार के तौर पर चार चमत्कारी रत्न दिए।
            चारों रत्न की अपनी-अपनी खूबी थी। पहले रत्न से मनचाहा धन, दूसरे रत्न से मनचाहे कपड़े व गहने, तीसरे रत्न से किसी भी तरह की पालकी, घोड़ा या रथ और चौथे रत्न से मान-सम्मान मिल सकता था। रत्न मिलने के बाद राजा विक्रमादित्य ने शेषनाग को प्रणाम किया और अपने बेतालों के साथ राज्य लौट गए।
            चारों रत्न लेकर राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में प्रवेश कर ही रहे थे कि रास्ते में उनकी मुलाकात एक ब्राह्मण से हुई। ब्राह्मण ने राजा से पाताल लोक की यात्रा के बारे में पूछा। राजा ने वहां हुई सारी बातें बता दी। सब कुछ जानने के बाद अचानक ब्राह्मण ने राजा से कहा कि आपकी हर सफलता में प्रजा का भी सहयोग होता है। ब्राह्मण की इस बात को सुनते ही राजा विक्रमादित्य उनके मन की बात को समझ गए और तुरंत उन्होंने ब्राह्मण को अपनी इच्छा से एक रत्न लेने को कहा। यह देखकर ब्राह्मण थोड़ी उलझन में पड़ गए और उन्होंने कहा कि वो अपने परिवार के हर सदस्य की राय लेने के बाद ही रत्न लेंगे। राजा विक्रमादित्य उनकी बात मान गए।
            फिर ब्राह्मण अपने घर पहुंचे और अपने परिवार में पत्नी, बेटे और बेटी को सारी बात बताई। तीनों ने ही तीन अलग-अलग रत्न लेने की इच्छा जताई। ब्राह्मण की उलझन अब और बढ़ गई थी। परिवार वालों की बात सुनकर ब्राह्मण दोबारा राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे और उन्हें अपनी दुविधा बताई। ब्राह्मण की बात सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने हंसते हुए ब्राह्मण को चारों रत्न उपहार के रूप में दे दिए।
            इतना कहते ही 16वीं पुतली सत्यवती ने कहा, “क्या तुम भी इतने दानी हो? अगर तुम्हारा दिल भी राजा विक्रमादित्य जितना बड़ा है, तो सिंहासन पर बैठ जाओ। अगर यह गुण तुम में नहीं है, तो इस सिंहासन पर बैठने के लायक बनकर आओ।” इतना कहकर 16वीं पुतली सिंहासन से उड़ गई और एक बार फिर राजा भोज सिंहासन पर नहीं बैठ पाए।
कहानी से शिक्षा:-
सच्चा राजा, राजनेता या संचालक वही होता है, जो धन-दौलत का लालच न करते हुए अपनी प्रजा और अपने साथ कार्य करने वालों को प्राथमिकता दे।

विद्यावती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की सत्रहवीं कहानी

राजा भोज एक बार फिर सिंहासन पर बैठने की इच्छा लेकर राजमहल पहुंचे। इस बार सिंहासन से 17वीं पुतली विद्यावती बाहर निकली और राजा भोज को सिंहासन पर बैठने से रोक दिया। 17वीं पुतली विद्यावती ने कहा, “सिंहासन पर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य की यह कहानी सुन लो।” इतना कहकर 17वीं पुतली ने विक्रमादित्य का किस्सा सुनाना शुरू किया।
            राजा विक्रमादित्य के राज्य में उनकी प्रजा को किसी बात की कमी नहीं थी। राजा अपनी प्रजा को खूब खुश रखते थे, जब भी उनके दरबार में कोई अपनी परेशानी लेकर आता, तो राजा उसे तुरंत हल कर देते थे। अगर उनकी प्रजा को कोई तंग करता था, तो उसे वो कठोर सजा देते थे। इतना ही नहीं राजा विक्रमादित्य एक आदमी बनकर राज्य का दौरा भी करते थे, इसलिए उनकी प्रजा हमेशा खुश, निडर और संतुष्ट रहती थी।
            एक बार राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर अपने राज्य में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक झोपड़ी से दो लोगों की आवाज सुनाई दी। उन्होंने सुना कि एक महिला राजा को जाकर कुछ बताने को कह रही थी, लेकिन वो व्यक्ति कह रहा था कि वो अपने स्वार्थ के लिए राजा की जान खतरे में नहीं डाल सकता है।
            इन बातों को सुनते ही राजा समझ गए कि उन्हें कोई समस्या है और राजा भी इससे जुड़े हुए हैं। राजा विक्रमादित्य हमेशा अपनी प्रजा की परेशानियों को हल करना अपना कर्तव्य मानते थे। ऐसे में राजा विक्रमादित्य से रहा नहीं गया और उन्होंने झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया। दरवाजे पर आवाज सुनकर ब्राह्मण दंपत्ति ने दरवाजा खोला। उनके दरवाजा खोलते ही राजा विक्रमादित्य ने अपने बारे में बताया और उनकी परेशानी पूछी।
            राजा घर आए हैं जानते ही, दोनों पति-पत्नी डर गए। राजा ने उन्हें हिम्मत और भरोसा दिलाते हुए कहा कि आप अपनी बात बिना डरे कह सकते हैं। तब उन्होंने बताया कि उनकी शादी को बारह साल हो गए हैं, लेकिन उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ।
            इन बारह सालों में उन्होंने संतान सुख के लिए कई व्रत-उपवास, पूजा-पाठ किए, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। फिर एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने सपना देखा कि एक देवी ने उन्हें कहा है कि तीस कोस दूर पूर्व दिशा में एक घने जंगल में कुछ साधु-संन्यासी शिव की आराधना करते हुए भगवान शिव को खुश करने के लिए वो हवन कुंड में अपने अंगों को काटकर डाल रहे हैं। उनकी तरह ही अगर राजा विक्रमादित्य भी वहां जाकर हवन कुंड में अपने अंग काटकर डाल दे, तो भगवान शिव उनसे खुश होकर उनकी इच्छा पूछेंगे। फिर राजा विक्रमादित्य भगवान शिव से उनके लिए बच्चे की मांग करेंगे। ऐसा करने से उन्हें संतान सुख मिल जाएगा।
            इतना सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण पति-पत्नी को भरोसा दिलाते हुए कहा कि वो ये सब जरूर करेंगे। इतना कहते ही राजा विक्रमादित्य वहां से निकल गए और रास्ते में बेतालों को याद किया। बेताल उनके सामने प्रकट हुए, तो राजा विक्रमादित्य ने उन्हें हवन की जगह पहुंचाने को कहा। राजा जैसे ही उस जगह पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि वहां सच में कुछ साधु बैठकर हवन करते हुए अपने अंगों को काटकर हवन में डाल रहा था।
            ये देखते ही राजा विक्रमादित्य भी वहां संन्यासी के बगल में बैठकर उनकी तरह ही अपने अंगों को काटकर हवन कुंड में डालने लगे। जब राजा विक्रमादित्य और साधु सारे जल गए, तो वहां एक शिवगण पहुंचा और सभी साधुओं को अमृत देकर जिंदा कर दिया, लेकिन गलती से उसने राजा विक्रमादित्य को अमृत नहीं दिया।
            जब सारे साधु जिंदा हो गए, तो उनका ध्यान विक्रम पर गया, जो राख बन चुके थे। फिर सभी संन्यासियों ने मिलकर शिव की पूजा की और विक्रम को जिंदा करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना सुन ली और राजा विक्रमादित्य को अमृत डालकर जिंदा कर दिया।
            राजा विक्रमादित्य जैसे ही जीवित हुए, तो उन्होंने भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर ब्राह्मण दंपत्ति के लिए संतान मांगी। भगवान शिव, राजा विक्रमादित्य के त्याग से खुश हुए और उनकी प्रार्थना सुन ली। इसके कुछ वक्त बाद ही ब्राह्मण दंपत्ति को संतान सुख प्राप्त हुआ।
            ये कहानी सुनाते ही 17वीं पुतली विद्यावती ने राजा भोज से कहा, “क्या तुम में भी है ऐसी हिम्मत और त्याग की भावना? अगर हां, तो तुम इस सिंहासन के योग्य हो।” इतना कहने के बाद 17वीं पुतली विद्यावती उस सिंहासन से उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-
अगर कोई बिना किसी स्वार्थ के त्याग करता है, तो उसका कभी कुछ बुरा नहीं होता।

तारामती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की अठारहवीं कहानी

18वीं बार फिर राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ें। उन्होंने सोचा कि इस बार चाहे कुछ भी हो जाए, वो सिंहासन पर बैठकर ही रहेंगे। तभी सिंहासन से 18वीं पुतली तारामती बाहर निकली और राजा भोज को रोकते हुए बोली, “सिंहासन पर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य का यह किस्सा सुनिए।” उसके बाद पुतली तारामती ने कहानी सुनाना शुरू किया।
            राजा विक्रमादित्य कलाकारों और विद्वानों का खूब सम्मान किया करते थे। उनके दरबार में कई महान कलाकार थे। अन्य राज्यों से भी योग्य कलाकार उनके दरबार आते-जाते रहते थे। एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में दक्षिण भारत से एक विद्वान पहुंचे। उनका मानना था कि किसी को धोखा देना सबसे बुरा और गिरा हुआ काम होता है। अपनी बात सही साबित करने के लिए उस विद्वान ने राजा विक्रमादित्य को एक कहानी सुनाई।
            उस विद्वान ने कहा कि सालों पहले आर्यावर्त राज्य में एक राजा राज करता था। उसका भरा-पूरा और सुखी परिवार था। उस राजा ने सत्तर साल की उम्र में एक लड़की से शादी कर ली। वो नई रानी की खूबसूरती से इतना आकर्षित था कि उससे एक पल भी अलग नहीं होता था। राजा चाहता था कि हर वक्त रानी का चेहरा उसके सामने रहे। यहां तक कि राज दरबार में भी वो अपने बगल में नई रानी को बैठाने लगा।
            नई रानी को बगल में बैठा देख कई लोग राजा के पीठ पीछे उनका मजाक बनाने लगे। राजा के महामंत्री को इस बात का बहुत बुरा लगता। एक दिन अकेले में महामंत्री ने राजा को इस बात की जानकारी दी। उसने राजा को कहा कि अगर वो हर पल रानी को अपने सामने देखना चाहते हैं, तो उनकी एक सुंदर तस्वीर बनवाकर राज दरबार में सिंहासन के सामने लगवा लें। जैसे कि राज दरबार में राजा के अकेले बैठने की ही परंपरा सालों से चली आ रही है। ऐसे में रानी को राज दरबार ले जाना उन्हें शोभा नहीं देता है।
            महामंत्री राजा का खास था, इसलिए राजा ने उसकी बात को गंभीरता से लेते हुए अच्छे चित्रकार से रानी की तस्वीर बनाने को कहा। चित्रकार ने भी राजा का आदेश मिलने के बाद जल्दी रानी की तस्वीर बनाई और उसे राज दरबार लेकर चला गया। राज दरबार में जब लोगों ने रानी का चित्र देखा, तो हर कोई चित्रकार की तारीफ करने लगा। उस चित्रकार ने रानी की तस्वीर ऐसी बनाई थी कि वो तस्वीर एकदम असली लगती थी। राजा को भी रानी की तस्वीर बहुत पसंद आई।
            तस्वीर को निहारते हुए राजा की नजर चित्र में रानी की जंघा पर गई। उस जगह पर चित्रकार ने एक तिल बनाया था। राजा को इस बात पर काफी गुस्सा आया। उन्हें लगा कि चित्रकार ने जांघों में तिल कैसे बना दिया। यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया और उसने चित्रकार से इसको लेकर सवाल पूछा। जवाब देते हुए चित्रकार ने कहा कि प्रकृति से उसे ऐसा गुण मिला है कि वो छिपी हुई बातें भी जान सकता है। इसी गुण की वजह से उसने यह तिल बनाया। साथ ही तिल से तस्वीर की सुंदरता भी बढ़ती है, इसलिए उसने तिल बनाया है।
            राजा को उसकी बात पर भरोसा नहीं हुआ। उसने बिना देर किए जल्लादों को बुलाया और चित्रकार को जंगल ले जाकर मारने का आदेश दे दिया। साथ ही उसकी आंखें निकालकर राजमहल लाने को भी कहा। भले ही राजा को चित्रकार की बात पर भरोसा नहीं था, लेकिन महामंत्री को चित्रकार की विश्वास था। ऐसे में जंगल ले जाने के बाद मंत्री ने जल्लादों को धन का लालच देकर चित्रकार को रिहा करवा दिया। साथ ही उन्हें यह सुझाव दिया कि सबूत के तौर पर वो किसी हिरण की आंखें ले जाकर राजा को दे दें। इसी बीच महामंत्री चित्रकार को अपने घर ले आया और वो रूप बदलकर महामंत्री के घर में रहने लगा।
            इतना सब होने के कुछ दिनों बाद राजा का बेटा शिकार करने के लिए जंगल गया। तभी उसके पीछे एक शेर पड़ गया। राजकुमार अपनी जान बचाने के लिए एक पेड़ पर जा चढ़ा। पेड़ पर वह बैठा ही था कि उसकी नजर वहां पहले से ही बैठे भालू पर पड़ी। राजकुमार और डर गया। उसको डरा हुआ देखकर भालू ने कहा, “ तुम डरो मत, मैं भी तुम्हारी तरह ही पेड़ पर शेर को देखकर चढ़ा हूं।” इसी बीच भूखा शेर उसी पेड़ के नीचे उन दोनों पर नजरें जमाकर बैठ गया। काफी देर तक पेड़ पर बैठे-बैठे राजकुमार को नींद आने लगी।
            यह देखकर भालू ने राजकुमार को अपनी तरफ आने का इशारा किया और कहा कि वो थोड़ी देर उसका सहारा लेकर सो सकता है। भालू ने राजकुमार से कहा कि जबतक तुम सोओगे मैं तुम्हारी रखवाली करूंगा। फिर तुम जागने के बाद मेरी रखवाली करना और मैं सो जाऊंगा।”
            राजकुमार ने भालू की बात मान ली और वो सो गया। इसी बीच शेर ने भालू को फुसलाते हुए कहा कि वो और भालू जंगल के जानवर हैं और उन दोनों को एक दूसरे का साथ देना चाहिए। मनुष्य कभी जंगल के जानवर के दोस्त नहीं हो सकते हैं। यह सब कहते हुए शेर ने राजकुमार को नीचे गिरा देने की बात कही, लेकिन भालू ने शेर की बात नहीं मानी और कहा कि वो राजकुमार के साथ धोखा नहीं कर सकता है।
            शेर दुखी होकर चुपचाप वहीं बैठा रहा। इतने में कुछ घंटों की नींद पूरी करके राजकुमार उठ गया। उसके उठने के बाद अब भालू की सोने की बारी आई। जैसे ही भालू सोया, तो शेर ने राजकुमार को बहलाने-फुसलाने की कोशिश की। उसने राजकुमार से कहा कि वो भालू को नीचे गिरा दे, तो शेर उसे खाकर अपनी भूख मिटा लेगा और राजकुमार आराम से राजमहल लौट सकेगा।
            राजकुमार शेर की बातों में आ गया और भालू को पेड़ से गिराने की कोशिश करने लगा। इसी बीच भालू की नींद खुल गई और भालू ने राजकुमार को विश्वासघाती बोलकर खूब खरी-खोटी सुनाई। राजकुमार को मन ही मन बहुत बुरा लगा। तभी उसकी आवाज चली गई और वो गूंगा हो गया।
            इसी बीच शेर थक-हारकर जंगल की ओर अन्य शिकार ढूंढ़ने के लिए वहां से चला गया। फिर राजकुमार वापस अपने महल पहुंचा। उसकी आवाज जाने की वजह से वो कुछ नहीं बोल पा रहा था। राजकुमार की आवाज जाने से हर कोई परेशान हो गया। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और वैद्य राजकुमार को देखने के लिए आएं, लेकिन राजकुमार की इस अवस्था का वो पता नहीं लगा पाएं।
            इतने में महामंत्री अपने घर में छुपे उस चित्रकार को चिकित्सक बनाकर वहां ले आएं। चिकित्सक बने चित्रकार ने राजकुमार के चेहरे के हाव-भाव से सारी बात जान ली। उसने इशारों-इशारों में राजकुमार से पूछा कि क्या मन ही मन वो खुद को दोषी समझकर अपनी आवाज खो बैठा है?
            इशारों में राजकुमार उसकी बात समझ गया और फिर फूट-फूट कर रोने लगा। रोती ही उसकी आवाज वापस आ गई। राजा बहुत हैरान हो गए और उन्होंने सोचा कि यह चिकित्सक राजकुमार का चेहरे देखकर सारी कैसे जान सकता है। तब उस चित्रकार ने कहा कि जैसे एक चित्रकार ने रानी का तिल देख लिया था, वैसे ही मैंने आपके बेटे का चेहरा देखकर ही सब कुछ जान लिया।
            यह सुनते ही राजा को समझ आ गया कि वो कोई चिकित्सक नहीं, बल्कि कलाकार है। राजा ने चित्रकार से अपनी गलती की माफी मांगी और उसे कुछ उपहार देकर सम्मानित किया।
            इतनी कहानी राजा विक्रमादित्य को सुनाकर विद्वान चुप हो गया। राजा विक्रमादित्य इस कहानी को सुनकर बहुत खुश हुए और उनकी बात मान ली कि धोखा देना सबसे बुरा काम है। इसके बाद राजा ने विद्वान को एक लाख सोने के सिक्कों से सम्मानित किया।
            इतना कहते ही अठारहवीं पुतली तारामती ने कहा कि अगर तुम में भी दूसरों की बातों से सहमत होने और दूसरों की बातों का सम्मान करने का गुण है, तो तुम इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। इतना कहकर अठारहवीं पुतली तारामती सिंहासन से उड़ गई और राजा भोज एक बार फिर सिंहासन पर बैठते-बैठते रह गए।
कहानी से शिक्षा : –
किसी के साथ कभी धोखा नहीं करना चाहिए। विश्वासघात का अंजाम बहुत बुरा होता है।

रूपरेखा पुतली की कथा - सिंहासन बत्तीसी की उन्नीसवी कहानी

हर बार की तरह इस बार भी राज भोज फिर से सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ते हैं, लेकिन तभी सिंहासन की उन्नीसवीं पुतली रूपरेखा उन्हें रोकती है और राजा विक्रमादित्य के गुणों की चर्चा करते हुए एक कहानी सुनाती है। अब पढ़ें आगे –
            एक समय की बात है, राजा विक्रमादित्य के दरबार में दो तपस्वी अपने सवाल लेकर आए। राजा ने उनसे कहा, “हे साधु! बताइए आप दोनों के मन में कौन-से सवाल हैं।” इस पर एक तपस्वी ने कहा, “हे राजन! मेरा मानना है कि मनुष्य के मन का नियंत्रण उसके सभी कामों पर रहता है। वह कभी भी उसके खिलाफ नहीं जा सकता है।” जबकि, साथ आए दूसरे तपस्वी ने कहा, “नहीं राजन, मेरा मानना है कि मनुष्य का ज्ञान ही उसके सभी कामों को नियंत्रित करता है और मन भी
            ज्ञान के अनुसार ही चलता है।”
राजा विक्रमादित्य ने दोनों तपस्वियों की बातें सुनी और उन्हें कुछ दिन बाद दरबार में आने को कहा। तपस्वियों के जाने के बाद राजा विक्रमादित्य दोनों सवालों के बारे में सोचने लगे और उन्हें ये सवाल बड़े अटपटे लगे।
            एक पल के लिए उन्होंने सोचा कि पहले तपस्वी का कथन सही है। मन सच में चंचल होता है और इंसान उसके वश में आसानी से आ जाता है। दूसरे ही पल राजा ने ज्ञान के बारे में सोचा। उन्हें लगा कि दूसरे तपस्वी की बातें भी सही है। इंसान अपने मन की करने से पहले जरूर सोचता है और तभी निर्णय लेता है, ऐसे तो ज्ञान मन से ज्यादा प्रभावी है।
            इन दोनों उलझे सवालों का जवाब ढूंढने के लिए राजा वेश बदलकर राज्य में निकल पड़े। कुछ दिनों तक घुमने के बाद उनकी नजर एक गरीब युवक पर पड़ी, जो एक पेड़ के नीचे बैठकर आराम कर रहा था। उस युवक के बगल में उसकी बैलगाड़ी खड़ी थी। राजा विक्रमादित्य उस युवक के पास गए और उन्होंने उस युवक को पहचान लिया। पेड़ के नीचे बैठा वह युवक उनके दोस्त सेठ गोपाल दास का छोटा बेटा था।
            राजा को याद आया कि उनका दोस्त तो एक बहुत बड़ा व्यापारी था, जिसने खूब सारा धन कमाया था, लेकिन उनके छोटे बेटे की हालत देखकर महाराजा विक्रमादित्य सोच में पड़ गए। उन्होंने उस युवक से पूछा, “बालक तुम्हारा यह हाल कैसे हो गया? तुम्हारे पिता ने तो मरने से पहले सारा धन तुम दोनों भाइयों में बांट दिया था। तुम्हें तो इतना धन मिला होगा कि तुम्हारी जिंदगी आसानी से कट सकती थी, लेकिन तुम तो गरीब नजर आ रहे हो।”
            इस पर युवक ने कहा, “पिता द्वारा धन बांटने के बाद उसके भाई ने बड़ी समझदारी के साथ धन का उपयोग किया। उसने अपने मन की चंचलता को शांत रखकर जरूरतों के हिसाब से पैसे खर्च किए। साथ ही दिन-रात मेहनत की और अपने व्यापार को आगे बढ़ाया, लेकिन मैंने धन को केवल बुरी आदतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया। मैंने जरा-सी भी सूझबूझ नहीं दिखाई। धन के नशे में मैं इतना चूर हो गया था कि अपने भाई के दिए हुए ज्ञान को समझ न पाया और आज मेरी यह हालत है।”
            युवक ने आगे कहा, “अपने चंचल मन को नियंत्रित न कर पाने के कारण मैं एक साल के अंदर ही कंगाल हो गया। आज मैं दर-दर की ठोकरें खाता फिर रहा हूं, लेकिन मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है।”
            पूरी बात सुनकर राजा विक्रमादित्य ने युवक से पूछा, “क्या दोबारा धन मिलने पर तुम फिर से अपने मन का ही सुनोगे?” युवक ने कहा, “नहीं, अब ऐसा कभी नहीं करूंगा। इन ठोकरों को खाने के बाद यह ज्ञान मुझे मिल गया है कि इंसान ज्ञान के बल पर अपने मन को भी वश में कर सकता है।”
            युवक की बातों को सुनने के बाद राजा ने उसे अपना परिचय दिया। साथ ही कई स्वर्ण मुद्राएं देकर सद्बुद्धि के साथ व्यापार शुरू करने की सलाह दी। इसके बाद राजा वापस अपने महल लौट आए।
            उस युवक से मिलने के बाद राजा विक्रमादित्य को दोनों तपस्वियों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब मिल गए थे। इसलिए, उन्होंने अगले दिन दोनों को दरबार में बुलवाया। दोनों तपस्वी जब राजा के सामने पेश हुए, तो उन्होंने उन सवालों के जवाब दिए।
            राजा ने कहा, “इंसान का मन बार-बार उसके शरीर पर नियंत्रण पाने की कोशिश करता है, लेकिन उसका ज्ञान उसे कभी हावी होने नहीं देता है। एक ज्ञानी व्यक्ति कभी भी मन के आगे नहीं हारता है और वह हमेशा अपने ज्ञान से ही चलता है।”
            राजा ने उन दोनों तपस्वियों को उस गरीब युवक की कहानी सुनाई और कहा, “अगर मन रथ है, तो ज्ञान उसका सारथी होता है। बिना सारथी के रथ कुछ नहीं है।” राजा की बातें सुनने के बाद दोनों तपस्वियों को अपने सवालों के जवाब मिल गए थे।
            राजा की बातों से प्रसन्न होकर दोनों तपस्वियों ने उन्हें एक खड़िया उपहार में दिया। इस खड़िया की एक खासियत थी कि इससे बनाए गए चित्र रात में जीवित हो सकते थे और उनकी बातों को भी सुना जा सकता है।
            राजा विक्रमादित्य ने यह जानने के लिए कि खड़िया सच्चा है या नहीं, उन्होंने कई चित्र बनाए। खड़िया सचमुच वैसा ही निकला जैसा तपस्वी ने कहा था।
            धीरे-धीरे राजा उसमें मग्न होते चले गए। यहां तक कि उन्हें अपनी रानियों की भी चिंता नहीं थी। कई दिनों बाद जब रानियां उनसे मिलने आईं, तो राजा का ध्यान बंटा। राजा ने जब खुद को देखा, तो जोर से हंस पड़े। इसपर रानियों ने पूछा, ” महाराज आप हंस क्यों रहे हैं?” तब राजा ने कहा, “दूसरों को शिक्षा देने वाला मैं खुद भी मन के आगे विवश हो गया था, लेकिन अब मुझे अपने कर्तव्य का पूरा ज्ञान है।”
            इस कहानी को सुनाने के बाद उन्नीसवीं पुतली रूपरेखा राजा भोज से कहती है, “अगर तुम्हारे पास भी राजा विक्रमादित्य जैसी काबिलियत है, तो ही सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ना।” इतना कहकर पुतली वहां से उड़ जाती है और राजा भोज भी वहां से चले जाते हैं।
कहानी से शिक्षा :-

इस कहानी को पढ़ने के बाद बच्चों हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को अपने मन को नियंत्रण में रखना चाहिए और सद्बुद्धि से काम लेना चाहिए। ऐसा नहीं करने वाला इंसान बर्बादी की तरफ ही बढ़ता है।

ज्ञानवती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की बीसवीं कहानी

उन्नीसवीं पुतली की कहानी सुनने के बाद राजा भोज अगले दिन फिर से सिंहासन बत्तीसी पर बैठने आते हैं, तभी बीसवीं पुतली ज्ञानवती प्रकट होती है और उन्हें रोकती है। ज्ञानवती कहती है, “रुको राजन! इसपर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य के इस गुण के बारे में तो जान लो। इतना कहने के बाद बीसवीं पुतली ज्ञानवती कहानी सुनाना शुरू करती है, जो इस प्रकार है –
            एक समय की बात है, राजा विक्रमादित्य जंगल में भ्रमण के लिए निकले थे। इसी दौरान उन्होंने दो लोगों को आपस में बातें करते सुना, जिनमें से एक ज्योतिषी था। ज्योतिषी ने वहां मौजूद अपने दोस्त से कहा, “मुझे ज्योतिष विद्या का पूरा ज्ञान प्राप्त है। मैं तुम्हारे भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सब कुछ बता सकता हूं।” लेकिन, उसके दोस्त को उसकी बातों में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए, उसने ज्योतिषी से कहा, “तुम्हें मेरे भूत और वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी है, इसलिए तुम ये सब बता सकते हो और भविष्य के बारे में जानने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। इसलिए, अच्छा होगा अगर तुम अपने ज्ञान का बखान न करो।”
            ज्योतिषी इतने पर भी नहीं चुप हुआ। उसने आगे कहा, “जंगल में बिखरी हुई इन हड्डियों को देखकर मैं यह बता सकता हूं कि यह कौन से जानवर की है और उसकी मृत्यु कैसे हुई।” इस बात में भी उसके दोस्त ने रुचि नहीं ली।
            इसी दौरान उस ज्योतिषी की नजर जमीन पर छपे पंजों के निशानों पर पड़ी। यह देख उसने कहा, “ये पंजों के निशान किसी राजा के हैं, तुम चाहो तो इसकी जांच कर सकते हो।” ज्योतिषी ने बताया, “राजा-महाराजा के पैरों पर कमल के निशान होते हैं, जो यहां भी हैं। ये बात बिल्कुल सत्य है।” इस पर उसके दोस्त ने सोचा कि क्यों ने इस बार ज्योतिषी की बात की जांच कर ली जाए, नहीं तो वो अपने ज्ञान का बखान ऐसे ही करता रहेगा।
            इसके बाद दोनों दोस्तों ने उन निशानों का पीछा करना शुरू किया और चलते-चलते उसकी समाप्ति तक पहुंचे। वहां उन्होंने एक लकड़हारे को देखा। ज्योतिषी ने उसे अपने पैरों को दिखाने को कहा। जब लकड़हारे ने अपना पैर दिखाया, तो ज्योतिषी चौंक गया। उसके पैरों पर वो कमल के निशान मौजूद थे। ज्योतिषी को लगा कि वह किसी राजा का ही पुत्र होगा, लेकिन शायद वो किसी कारण वश इस काम को करने के लिए मजबूर होगा। इसलिए, उसने लकड़हारे से उसका परिचय पूछा। तब लकड़हारे में बताया कि उसका जन्म लकड़हारे के घर में ही हुआ है। सदियों से उसके यहां यही काम चलता आ रहा है।
            यह सुनने के बाद ज्योतिषी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसका भरोसा ज्योतिष विद्या से उठने लगा। उसका दोस्त भी उसकी इस विद्या का मजाक उड़ाने लगा। इसपर ज्योतिषी ने कहा, “ऐसा कैसे हो सकता है, चलो एक बार चलकर राजा विक्रमादित्य के पैरों को देखते हैं। अगर उनके पैरों पर ये निशान नहीं हुए, तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूंगा और समझूंगा कि ये सब बेकार है।” इस पर उसका दोस्त भी राजी हो गया और दोनों राजमहल की ओर चल दिए।
            राज दरबार पहुंचकर उन्होंने महाराजा विक्रमादित्य से मिलने की इच्छा जताई। राजा ने दोनों को अंदर आने का आदेश दिया। यहां उस ज्योतिष ने राजा से अपना पैर दिखाने का आग्रह किया। राजा विक्रमादित्य ने जब अपने पैर दिखाए, तो ज्योतिषी फिर चकित हुआ। उसके बताए अनुसार राजा के पैरों पर किसी प्रकार के कोई चिन्ह नहीं थे, बल्कि उनका पैर भी आम लोगों जैसा ही था।
            यह देखने बाद उस ज्योतिषी का भरोसा पूरे ज्योतिष विज्ञान से उठ गया। उसने राजा को बताया, “ज्योतिष विद्या के अनुसार, राजा-महाराजा के पैरों पर कमल का निशान होता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। जबकि जंगल में एक लकड़हारे के पैरों पर ऐसा निशान मौजूद है, जिसका संबंध किसी भी राजघराने से नहीं है।”
            ज्योतिषी की बातों को सुनने के बाद राजा विक्रमादित्य को बहुत हंसी आई। उन्होंने उससे पूछा, “ये सब देखने के बाद क्या तुम्हारा विश्वास ज्योतिष विद्या से उठ गया?” ज्योतिषी ने कहा, “जी महाराज, ये सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद मेरा अब ज्योतिष विद्या पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रहा।” इतना कहकर उसने राजा को प्रणाम किया और अपने दोस्त के साथ जाने की आज्ञा ली।
            तभी राजा विक्रमादित्य ने दोनों को रुकने का आदेश दिया। फिर उन्होंने अपने सेवक से एक चाकू मंगवाया और अपने पैरों को कुरेदने लगे। जैसे-जैसे उनके पैरों की नकली चमड़ी हटती गई, कमल का निशान दिखने लगा। यह देखकर ज्योतिषी और उसका दोस्त चकित रह गए। उन्होंने राजा से पूछा, “हे राजन ये सब क्या है।” इस पर राजा ने कहा, “आप बहुत बड़े ज्ञानी हैं। आपके ज्ञान की सीमा बहुत बड़ी है, लेकिन यह तब तक अधूरी रहेगी जब तक आप इसका बखान करते रहेंगे।”
            राजा ने बताया, “जंगल में आप दोनों की बातें मैंने सुन ली थी। वन में आपने जिस लकड़हारे से मुलाकात की वह मैं ही था। यह सब मैंने इसलिए किया ताकि आपको यह समझा सकूं कि एक ज्ञानी को कभी अपने ज्ञान का बखान करने की आवश्यकता नहीं होती।”
            इस कहानी को सुनाने के बाद बीसवीं पुतली ज्ञानवती ने राजा भोज से कहा कि अगर आप भी राजा विक्रमादित्य की तरह गुणवान हैं, तो ही सिंहासन की ओर बढ़ें। इतना कहकर बीसवीं पुतली ज्ञानवती वहां से उड़ जाती है।

कहानी से शिक्षा :-
इस कहानी को पढ़ने के बाद बच्चों हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को कभी भी अपने ज्ञान का बखान नहीं करना चाहिए। जिसके पास ज्ञान होता है, वह कभी उसका प्रचार नहीं करता है, बल्कि समय आने पर अपने ज्ञान का इस्तेमाल करता है।

चन्द्रज्योति पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की इक्कीसवीं कहानी

इस बार भी राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ते हैं और तभी इक्कीसवीं पुतली चन्द्रज्योति वहां प्रकट होती है। चन्द्रज्योति राजा भोज को रोकती है और साथ ही उन्हें राजा विक्रमादित्य के गुणों से जुड़ी एक कहानी सुनाती है, जो इस प्रकार है –
            एक बार राजा विक्रमादित्य ने राज्य में एक यज्ञ कराने का सोचा। वह उस यज्ञ में चंद्र देव को भी बुलाना चाहते थे, लेकिन वो इस सोच में पड़ गए कि आखिर चंद्र देव को बुलाने कौन जाएगा। कुछ देर तक सोचने के बाद उन्होंने इस काम के लिए अपने महामंत्री को चुना।
            राजा ने महामंत्री को अपने पास बुलाया और अपने विचार प्रकट किए। तभी एक नौकर दौड़ते-दौड़ते वहां पहुंचा। नौकर को देखकर महामंत्री उसके पास गए। नौकर ने उनके कान में धीरे से कुछ कहा, जिसे सुनने के बाद महामंत्री दुखी हो गए और राजा से विदा लेकर वहां से चले गए।
            महामंत्री के यूं अचानक जाने से राजा को लगा कि कुछ परेशानी की बात है। इस बारे में उन्होंने उस नौकर से पूछा। तब नौकर ने बताया, “महामंत्री की एक ही बेटी है, जो लंबे समय से बीमार है। उसका इलाज कई वैद्य-हकीमों से कराया गया, पर वो ठीक नहीं हुई। दुनिया की हर दवाई और औषधि उसे दी गई, पर उसकी तबीयत और खराब होते जा रही है। आज तो उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि वह हिल भी नहीं पा रही है, उसका बचना मुश्किल लग रहा है।”
            इन बातों को सुनकर राजा बहुत दुखी हुए। उन्होंने तुरंत राजवैद्य को बुलवाया और पूछा, “क्या उन्होंने महामंत्री की बेटी का इलाज किया है?” इसपर राजवैद्य ने कहा, “महामंत्री की बेटी को अब बस ख्वांग बूटी से ही बचाया जा सकता है। इसके अलावा, उसका इलाज किसी और चीजों से नहीं हो सकता है। लेकिन यह बूटी बहुत मुश्किल से मिलती है। उसे खोजने में कई महीने लग जाएंगे।”
            यह सुनने के बाद राजा ने वैद्य से पूछा, “वो जगह कौन सी है, जहां यह बूटी मिलती है?” तब राजवैद्य ने बताया, “नील रत्नागिरी की घाटियों में यह बूटी मिलती है, लेकिन इसे खोजना बहुत मुश्किल है। इसका रास्ता बहुत ही कठिन है।” लेकिन राजा इससे डरे नहीं। उन्होंने राज वैद्य से उस बूटी की पहचान पूछी, ताकि वो उसे पहचान सके। राज वैद्य ने बताया, “उस पौधे में आधे नीले और आधे पीले रंग का फूल खिलता है। उसकी पत्तियां लाजवन्ती नामक पौधे की तरह ही होती हैं और छूने से वे सिकुड़ जाती हैं।
            इतना सुनने के बाद राजा यज्ञ को छोड़कर बूटी लाने के लिए निकल गए। उन्होंने तुरंत दोनों बैतालों को याद किया। बैताल उन्हें लेकर नील रत्नागिरी पहुंचे। राजा यहां से अकेले बूटी खोजने के लिए आगे बढ़ गए। तभी उन पर एक शेर ने हमला कर दिया। लेकिन राजा इतने ताकतवर थे कि उन्होंने शेर को मार दिया।
            इसके बाद वो और आगे बढ़े, तभी एक बड़े से सांप ने उन्हें खा लिया। लेकिन राजा ने उसके पेट में चाकू मार कर खुद को बचा लिया। बूटी खोजते-खोजते शाम हो गई। राज ने सोचा कि थोड़ा आराम कर लिया जाए, फिर बूटी खोजेंगे। रात में उन्होंने सोचा कि काश चंद्र देव बूटी खोजने में उनकी मदद कर दें। तभी एक चमत्कार हुआ और चारों तरफ रोशनी फैल गई।
            राजा ने जब उठकर देखा, तो उन्हें वो नीले और पीले रंग का फूल लगा पौधा दिखाई दिया। जब उन्होंने उसकी पत्तियों को छूआ, तो वो सिकुड़ गईं। राजा को समझ आ गया कि यह वही बूटी है, जिसे वो ढूंढने आए थे। उन्होंने तुरंत उस बूटी को अपने झोले में भर लिया। जैसे ही वो जाने लगे, तभी चंद्र देव उनके सामने आ गए और उन्होंने राजा को अमृत दिया। साथ ही कहा कि अब यह अमृत ही महामंत्री की बेटी को ठीक कर सकता है।
            चंद्र देव ने राजा को कहा कि तुम्हारी मदद की भावना देख मैं बहुत खुश हूं। उन्होंने राजा को यह भी बताया कि अगर वो यज्ञ में आएंगे, तो दुनिया के कई भागों में अंधेरा छा जाएगा। इसलिए, वो वहां नहीं आ सकते। इसके बाद उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। इसके बाद राज तुरंत अपने महामंत्री के घर पहुंचे और अमृत पिलाकर उनकी बेटी को ठीक कर दिया। इसके बाद महामंत्री खुश हो गए और उन्होंने राजा को धन्यवाद दिया।
            कहानी समाप्त होते ही इक्कीसवीं पुतली चन्द्रज्योति ने राजा भोज से कहा कि अगर आप में भी राजा विक्रमादित्य की तरह हिम्मत और अपनी प्रजा के लिए प्रेम की भावना है, तो ही सिंहासन की ओर आगे बढ़ें। यह कहकर चन्द्रज्योति वहां से उड़ जाती है और राजा भोज सोच में पड़ जाते हैं।
कहानी से शिक्षा :-

इस कहानी को पढ़ने के बाद बच्चों हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए। जैसा इस कहानी में राजा ने मंत्री की बेटी के लिए किया।

बत्तीस पुतलियों के नाम :-

  1. रत्नमंजरी  
  2. चित्रलेखा  
  3. चन्द्रकला  
  4. कामकंदला  
  5. लीलावती  
  6. रविभामा  
  7. कौमुदी  
  8. पुष्पवती  
  9. मधुमालती  
  10. प्रभावती  
  11. त्रिलोचना  
  12. पद्मावती  
  13. कीर्तिमती  
  14. सुनयना  
  15. सुन्दरवती  
  16. सत्यवती  
  17. विद्यावती  
  18. तारावती  
  19. रुपरेखा  
  20. ज्ञानवती  
  21. चन्द्रज्योति  
  22. अनुरोधवती  
  23. धर्मवती  
  24. करुणावती  
  25. त्रिनेत्री  
  26. मृगनयनी  
  27. मलयवती  
  28. वैदेही  
  29. मानवती  
  30. जयलक्ष्मी  
  31. कौशल्या  
  32. रानी रुपवती  

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सिंहासन बत्तीसी की कहानी भाग-1

 रत्नमंजरी पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की पहली कहानी

राजा भोज पहले दिन ही सिंहासन पर बैठने के लिए उत्सुक थे। जब पहले दिन राजा भोज ने सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तभी सिंहासन से पहली पुतली रत्नमंजरी प्रकट हुई। पहली पुतली रत्नमंजरी ने राजा को अपना परिचय दिया और कहा कि यह सिंहासन विक्रमादित्य का है और उनके जैसा गुणवान और बुद्धिमान ही इस पर बैठने योग्य है। अगर यकीन नहीं होता, तो राजा विक्रमादित्य की यह कहानी सुनकर फैसला करना कि तुम में ऐसे गुण हैं या नहीं। इतना कहने के बाद पहली पुतली रत्नमंजरी ने राजा भोज को कहानी सुनाना शुरू किया।
            एक बार की बात है, अम्बावती नाम का एक राज्य था। वहां के राजा धर्मसेन ने चार वर्णों की स्त्रियों से चार शादियां की थीं। पहली स्त्री ब्राह्मण थी, दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र थी। ब्राह्मण स्त्री से हुए पुत्र का नाम ब्राह्मणीत था। क्षत्राणी से उन्हें तीन पुत्र थे, जिनके नाम थे  शंख, विक्रमादित्‍य और भर्तृहरि। वैश्‍य पत्नी से हुए पुत्र का नाम चंद्र था और शूद्राणी के बेटे का नाम धन्‍वतारि था। जब सभी लड़के बड़े हुए, तो ब्राह्मणी के बेटे को राजा ने दीवान बनाया। लेकिन, वह अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से संभाल न सका और वो राज्य छोड़कर चला गया। कुछ वक्त तक वो कई जगहों में भटका और फिर वह धारानगरी नाम के राज्य में पहुंचा और वहां उसे एक अच्छा ओहदा मिला। लेकिन, एक दिन उसने वहां के राजा को मार दिया और खुद राजा बन गया।
            कुछ वक्त बाद उसने उज्जैन आने का फैसला किया, लेकिन उज्जैन पहुंचते ही उसकी मौत हो गई। उसके बाद क्षत्राणी के बड़े बेटे शंख को लगा कि उसके पिता विक्रम को राज्य का राजा बना सकते हैं। ऐसे में उसने अपने सोते हुए पिता पर हमला कर उसे मार डाला और खुद को राजा घोषित कर दिया। सभी भाइयों को शंख के षड्यंत्र का पता चल गया और सब इधर-उधर निकल पड़ें। शंख ने ज्योतिषियों का सहारा लिया और उन्हें अपने भाइयों के बारे में ज्योतिष विद्या के सहारे से पता लगाने को कहा।
            ज्योतिषियों ने बताया कि विक्रम को छोड़कर उनके सभी भाई जंगली जानवरों का शिकार बन गए थे। विक्रम अब बहुत ज्ञानी हो चुका है और आगे चलकर बहुत बड़ा सम्राट बनेगा। यह सुनकर शंख को बहुत चिंता होने लगी और उसने विक्रम को मारने की योजना बनाई। शंख के मंत्रियों ने विक्रम को ढूंढ निकाला और शंख को इसकी जानकारी दी। शंख ने एक तांत्रिक के साथ विक्रम को मारने की योजना बनाई। उसने तांत्रिक से कहा कि वो विक्रम को काली की आराधना की बात बताए और उसे सिर झुकाकर काली की पूजा करने को कहे। जैसे ही विक्रम गर्दन झुकाएगा, तो वो उसकी गर्दन काट देगा। तांत्रिक विक्रम के पास गया और उसने शंख के कहे अनुसार विक्रम को काली की अराधना के लिए सिर झुकाने को कहा। शंख भी वहीं छिपा बैठा था। विक्रम ने खतरा महसूस कर लिया था। उसने तांत्रिक को सिर झुकाने की विधि बताने को कहा और तांत्रिक जैसे ही झुका शंख ने उसे विक्रम समझ कर उसकी गर्दन काट दी। इतने में विक्रमादित्य ने शंख के हाथ से तलवार लेकर उसकी भी गर्दन काट दी और अपने पिता की हत्या का बदला ले लिया।
            फिर विक्रमादित्य राजा बने और अपने राज्य और प्रजा का पूरा ध्यान रखने लगे। हर तरफ उनकी जय-जयकार होने लगी। एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार करने जंगल गए। उस जंगल में जाने के बाद राजा विक्रमादित्य को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। इतने में उनकी नजर एक खूबसूरत महल पर पड़ी। वो अपने घोड़े पर सवार होकर उस महल में पहुंचे। वो महल राजा बाहुबल का था। राजा विक्रम जैसे ही वहां पहुंचे, तो वहां के दीवान ने राजा विक्रमादित्य को कहा कि वो बहुत मशहूर राजा बनेंगे। लेकिन, उसके लिए राजा बाहुबल को उनका राजतिलक करना होगा। साथ ही उसने यह भी कहा कि राजा बाहुबल बहुत दानी है और जैसे ही विक्रमादित्य को मौका मिले वो राजा से स्वर्ण जड़ित सिंहासन मांग लें। यह स्वर्ण जड़ित सिंहासन भगवान शंकर ने राजा को भेंट दिया था। वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य को सम्राट बना सकता है।
            राजा बाहुबल ने विक्रमादित्य का अतिथि सत्कार और राज तिलक किया। इस दौरान विक्रमादित्य ने सिंहासन की मांग की और राजा बाहुबल ने विक्रमादित्य को उसका सही हकदार समझते हुए बिना संकोच सिंहासन दे दिया। कुछ दिनों तक बाहुबल के महल में रहने के बाद राजा विक्रमादित्य सिंहासन लेकर अपने राज्य वापस आ गए। सिंहासन की बात दूर-दूर तक फैल गई। हर कोई राजा विक्रमादित्य को बधाई दे रहा था।
            इतना सुनाते ही पुतली रत्नमंजरी ने कहा कि राजा भोज अगर ऐसा कोई काम आपने भी किया है, तो आप इस सिंहासन पर बैठ सकते हैं। यह कहने के बाद पहली पुतली रत्नमंजरी उड़ गई। यह सुनकर राजा भोज ने उस दिन सिंहासन पर बैठने का फैसला टाल दिया और सोचा कि अगले दिन आऊंगा और सिंहासन पर बैठूंगा।

कहानी से शिक्षा – इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि कभी लालच नहीं करना चाहिए और दूसरों का बुरा नहीं सोचना चाहिए। जो दूसरों का बुरा चाहते हैं, उनके साथ कभी अच्छा नहीं होता है।

चित्रलेखा पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की दूसरी कहानी

एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधने की हुई। अपना राजपाट अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर जंगल में चले गए।
            एक दिन राजा भर्तृहरि शिकार खेलते-खेलते एक ऊँचे पहाड़ पर आए। वहाँ उन्होंने देखा एक साधु तपस्या कर रहा है। साधु की तपस्या में विघ्न नहीं पड़े यह सोचकर वे उसे श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके लौटने लगे। उनके मुड़ते ही साधु ने आवाज़ दी और उन्हें रुकने को कहा। राजा भर्तृहरि रुक गए और साधु ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें एक फल दिया। उसने कहा- "जो भी इस फल को खाएगा तेजस्वी और यशस्वी पुत्र प्राप्त करेगा। फल प्राप्त कर जब वे लौट रहे थे, तो उनकी नज़र एक तेज़ी से दौड़ती महिला पर पड़ी। दौड़ते-दौड़ते एक कुँए के पास आई और छलांग लगाने को उद्यत हुई। राजा भर्तृहरि ने उसे थाम लिया और इस प्रकार आत्महत्या करने का कारण जानना चाहा। महिला ने बताया कि उसकी कई लड़कियाँ हैं पर पुत्र एक भी नहीं। चूँकि हर बार लड़की ही जन्म लेती है, इसलिए उसका पति उससे नाराज है और गाली-गलौज तथा मार-पीट करता है। वह इस दुर्दशा से तंग होकर आत्महत्या करने जा रही थी। राजा ने साधु वाला फल उसे दे दिया तथा आश्वासन दिया कि अगर उसका पति फल खाएगा, तो इस बार उसे पुत्र ही होगा। कुछ दिन बीत गए।
            एक दिन एक ब्राह्मण राजा भर्तृहरि के पास आया और उसने वही फल उसे भेट किया। ब्राह्मण को विदा करने के बाद वे फल लेकर अपनी पत्नी के पास आए और उसे वह फल दे दिया। राजा की पत्नी भी चरित्रहीन थी और नगर के कोतवाल से प्रेम करती थी। उसने वह फल नगर कोतवाल को दिया ताकि उसके घर यशस्वी पुत्र जन्म ले। नगर कोतवाल एक वेश्या के प्रेम में पागल था और उसने वह फल उस वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा कि वेश्या का पुत्र लाख यशस्वी हो तो भी उसे सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त हो सकती है। उसने काफी सोचने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि इस फल को खाने का असली अधिकारी राजा ही है। उसका पुत्र उसी की तरह योग्य और सामर्थ्यवान होगा तो प्रजा की देख-रेख अच्छी तरहा होगी और सभी खुश रहेगे। यही सोचकर उसने राजा को वह फल भेंट कर दिया। फल को देखकर राजा ठगे-से रह गए। उन्होंने पड़ताल कराई तो नगर कोतवाल और रानी के सम्बन्ध का पता चल गया। वे इतने दुखी और खिन्न हो गए कि राज्य को ज्यों का त्यों छोड़कर वन चले गए और कठिन तपस्या करने लगे।
            चूँकि विक्रमादित्य देवताओं और मनुष्यों को समान रुप से प्रिय थे, देवराज इन्द्र ने उनकी अनुपस्थिति में राज्य की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली देव भेज दिया। वह देव नृपविहीन राज्य की बड़ी मुस्तैदी से रक्षा तथा पहरेदारी करने लगा। कुछ दिनों के बाद विक्रमादित्य का मन अपनी प्रजा को देखने को करने लगा। जब उन्होंने अपने राज्य में प्रवेश करने की चेष्टा की तो देव सामने आ खड़ा हुआ। उसे अपनी वास्तविक पहचान देने के लिए विक्रम ने उससे युद्ध किया और पराजित किया। पराजित देव मान गया कि उसे हराने वाले विक्रमादित्य ही हैं और उसने उन्हें बताया कि उनका एक पिछले जन्म का शत्रु यहाँ आ पहुँचा है और सिद्धि कर रहा है। वह उन्हें खत्म करने का हर सम्भव प्रयास करेगा।
            यदि विक्रम ने उसका वध कर दिया तो लम्बे समय तक वे निर्विघ्न राज्य करेंगे। योगी के बारे में सब कुछ बताकर उस देव ने राजा से अनुमति ली और चला गया। राजा की चरित्रहीन पत्नी तब तक ग्लानि से विष खाकर मर चुकी थी। विक्रम ने आकर अपना राजपाट सम्भाल लिया और राज्य का सभी काम सुचारुपूर्वक चलने लगा। कुछ दिनों के बाद उनके दरबार में वह योगी आ पहुँचा। उसने विक्रम को एक ऐसा फल दिया जिसे काटने पर एक कीमती रत्न निकला। पारितोषिक के बदले उसने विक्रम से उनकी सहायता की कामना की। विक्रम सहर्ष तैयार हो गए और उसके साथ चल पड़े। वे दोनों श्मशान पहुँचे तो योगी ने बताया कि एक पेड़ पर बेताल लटक रहा है और एक सिद्धि के लिए उसे बेताल की आवश्यकता है। उसने विक्रम से अनुरोध किया कि वे बेताल को उतार कर उसके पास ले आएँ।
            विक्रम उस पेड़ से बेताल को उतार कर कंधे पर लादकर लाने की कोशिश करने लगे। बेताल बार-बार उनकी असावधानी का फायदा उठा कर उड़ जाता और पेड़ पर लटक जाता। ऐसा चौबीस बार हुआ। हर बार बेताल रास्ते में विक्रम को एक कहानी सुनाता। पच्चीसवीं बार बेताल ने विक्रम को बताया कि जिस योगी ने उसे लाने भेजा है वह दुष्ट और धोखेबाज़ है। उसकी तांत्रिक सिद्धी की आज समाप्ति है तथा आज वह विक्रम की बलि दे देगा जब विक्रम देवी के सामने सर झुकाएगा। राजा की बलि से ही उसकी सिद्धि पूरी हो सकती है।
            विक्रम को तुरन्त इन्द्र के देव की चेतावनी याद आई। उन्होंने बेताल को धन्यवाद दिया और उसे लादकर योगी के पास आए। योगी उसे देखकर अत्यन्त हर्षित हुआ और विक्रम से देवी के चरणों में सर झुकाने को कहा। विक्रम ने योगी को सर झुकाकर सर झुकाने की विधि बतलाने को कहा। ज्योंहि योगी ने अपना सर देवी चरणों में झुकाया कि विक्रम ने तलवार से उसकी गर्दन काट दी। देवी बलि पाकर प्रसन्न हुईं और उन्होंने विक्रम को दो बेताल सेवक दिए। उन्होंने कहा कि स्मरण करते ही ये दोनों बेताल विक्रम की सेवा में उपस्थित हो जाएँगे। विक्रम देवी का आशीष पाकर आनन्दपूर्वक वापस महल लौटे।
कहानी से शिक्षा :-
अपनी जानकारी पर भरोसा रखना चाहिए। कई बार गलतफहमी की वजह से लोग ऐसी जानकारी दे देते हैं, जो सही नहीं होती। 

चन्द्रकला पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की तीसरी कहानी

राजा विक्रमादित्य के गुणों का बखान करने के लिए उनके सिंहासन से इस बार तीसरी पुतली निकलती है। वह राजाभोज को विक्रमादित्य की ‘भाग्य और पुरुषार्थ’ की कहानी सुनाती है, जो इस प्रकार है।
            एक बार भाग्य और पुरुषार्थ के बीच इस बात को लेकर बहस हुई कि उन दोनों में से सबसे बड़ा कौन है। भाग्य ने कहा कि हर किसी को जो भी मिलता है, वह भाग्य से ही मिलता है। यह सुनकर पुरुषार्थ कहने लगा कि बिना मेहनत किए कुछ भी हासिल नहीं होता है। दोनों के बीच कई दिनों तक इस बात पर बहस होती रही। देखते-ही-देखते बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने इसके समाधान के लिए देवताओं के राजा इन्द्र के पास जाने की ठान ली।
            दोनों इंद्र देव के पास पहुंचकर इस सवाल का जवाब मांगने लगे, लेकिन मामला गंभीर होने की वजह से देवराज को भी कुछ समझ नहीं आया। फिर देवराज इंद्र ने उन दोनों को राजा विक्रमादित्य के पास जाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि राजा ही इस बात का जवाब दे सकते हैं कि आप दोनों में से कौन सबसे बड़ा है। इतना सुनते ही भाग्य और पुरुषार्थ तुरंत मानव भेष में विक्रमादित्य के पास पहुंच गए।
            राजा के दरबार पहुंचकर भाग्य और पुरुषार्थ ने अपने झगड़े की वजह उन्हें बताई। उस वक्त विक्रमादित्य को भी इसका कोई उचित जवाब नहीं सूझा। तब राजा ने दोनों से 6 महीने का समय मांगा। इस दौरान भाग्य और पुरुषार्थ के सवाल का उन्हें कोई जवाब समझ नहीं आता। तब राजा सही जवाब की तलाश में अपने राज्य में जनता के बीच सामान्य नागरिक का भेष बनकर घूमने लगते हैं।
            राजा को काफी कोशिश के बाद भी अपने राज्य में इस बात का सही जवाब नहीं मिलता। फिर राजा भेष बदलकर दूसरे राज्य में जाने का फैसला लेते हैं। ऐसा करते-करते राजा कई राज्य पहुंच जाते हैं, लेकिन उन्हें जवाब नहीं मिलता। इस दौरान राजा एक व्यापारी के पास जाकर काम मांगते हैं और कहते हैं कि वो ऐसे काम कर सकते हैं, जो कोई अन्य नहीं कर सकता।
            कुछ दिन बाद व्यापारी बाहर काम के लिए राजा विक्रमादित्य के साथ जहाज से जाता है। कुछ दूर जाते ही अचानक तेज तूफान आने लगता है और जहाज एक टापू के पास फंस जाता है। तूफान थमने के बाद जहाज को टापू से बाहर निकालने के लिए लोहे का कांटा उठाना होता है। व्यापारी ने राजा को उसे उठाने के लिए कहा। जैसे ही राजा ऐसा करता है, तो जहाज तेजी से आगे निकल जाता है और विक्रमादित्य टापू पर ही छूट जाते हैं।
            टापू पर छूटने के बाद राजा कुछ देर आगे चलते हैं, तो उन्हें वहां एक नगर दिखाई दिया। नगर के गेट में लिखा हुआ था कि यहां के राजा की बेटी का विवाह महाराज विक्रमादित्य के साथ होगा। यह पढ़कर राजा चौंक गए और महल में चले गए। वहां पहुंचते ही उनकी मुलाकात राजकुमारी से होती है। कुछ दिनों के बाद दोनों की शादी हो जाती है।
            महल में कुछ दिन बीताने के बाद राजा विक्रमादित्य अपनी पत्नी व राज्य की राजकुमारी को लेकर अपने राज्य की ओर निकल जाते हैं। रास्ते में राजा की भेंट एक संन्यासी से होती है। वह संन्यासी चमत्कारी माला व एक छड़ी राजा को देता है। संन्यासी ने राजा को बताया कि इस माला को पहनने पर व्यक्ति अदृश्य हो जाता है और छड़ी से सोने से पहले जो भी मांगा जाए, वो मिल जाता है। राजा संन्यासी को उपहार के लिए धन्यवाद कहते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
            राजा महल पहुंचकर राजकुमारी को अंदर कमरे में भेज देते हैं और खुद बगीचे में चले जाते हैं। वहां उनकी मुलाकात एक गायक और ब्राह्मण से होती है। दोनों ने राजा को बताया कि वो इस दिन का सालों से इंतजार कर रहे थे। राजा विक्रमादित्य ने पूछा कि ऐसी क्या बात है कि वो सालों से उनकी राह देख रहे थे। दोनों ने बताया कि वो गरीब हैं और सालों से बगीचे में ये सोचकर मेहनत कर रहे हैं कि एक दिन राजा उनके सब दुखों को दूर कर देंगे।
            इतना सब सुनते ही राजा ने संन्यासी से मिली माला गायक को दे दी और छड़ी ब्राह्मण को। उसके बाद राजा अपने दरबार चले गए। 6 महीने बीतने के बाद भाग्य और पुरुषार्थ दोनों राजा के सभा में आए। विक्रमादित्य उन दोनों को बीते छह महीने की सभी घटनाएं सुनाते हैं। इतना कहकर राजा दोनों को समझते हुए कहते हैं कि छड़ी और माला का उन्हें मिलना भाग्य था और गायक व ब्राह्मण को यह पुरुषार्थ की वजह से मिला। इसी वजह से भाग्य और पुरुषार्थ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं हो सकता है। दोनों राजा का जवाब सुनकर संतुष्ट हो गए और वहां से चले गए।
                        इतनी कहानी सुनाकर पुतली राजा विक्रमादित्य के सिंहासन से उड़ जाती है।
कहानी से शिक्षा :-
कोई भी बड़ा और छोटा नहीं होता। हर चीज और हर कर्म का अपना महत्व होता है।

कामकंदला पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की चौथी कहानी

एक बार फिर राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए पहुंचते हैं। इस बार उन्हें चौथी पुतली रोककर राजा विक्रामादित्य की दानवीरता और त्याग की कहानी सुनाने लगती है।
            एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य से दरबार में मिलने के लिए कुछ लोग पहुंचे। तभी एक ब्राह्मण भी भागते हुए वहां आए और कहने लगे कि मुझे आपको कुछ जरूरी बात बतानी है। राजा ने पूछा ऐसा क्या जरूरी है कि आपको इतनी तेजी से भागते हुए आना पड़ा?
            जवाब में ब्राह्मण ने कहा कि मानसरोवर में अजीब-सी घटना हो रही है। वहां सूरज उगने के साथ ही एक खंभा भी जमीन से निकलता है। यह खंभा सूरज की रोशनी के साथ-साथ ऊपर बढ़ता है। जैसे ही सूरज की किरणें तेज हो जाती हैं, तो खंभा सूरज को छू लेता है। जब धीरे-धीरे सूरज की रोशनी कम होती है, तो खंभा छोटा हो जाता है। फिर सूरज के ढलते ही खंभा भी गायब हो जाता है।
            इन बातों को सुनने के बाद राजा विक्रामादित्य हैरान रह गए। उनके मन में सवाल आया कि आखिर ऐसी कौन सी चीज है, जो सूरज को छू रही है। तभी ब्राह्मण ने बताया कि वह खंभा भगवान इंद्र का रूप है। सूर्य देव को घमंड है कि उनके तेज को कोई सहन नहीं कर सकता, लेकिन इंद्र देव ने उनसे दावा किया है कि धरती का एक राजा उनका तेज सहन कर सकता है।
            यह सब सुनकर राजा विक्रमादित्य सारी बात समझ गए। तभी ब्राह्मण ने बताया कि देवराज इंद्र ने ही उन्हें राजमहल भेजा है। महाराज ने ब्राह्मण को ढेर सारी मुद्रा देकर महल से विदा किया। उनके जाते ही विक्रमादित्य ने अपने बेताल को बुलाकर मानसरोवर पहुंचाने को कहा। वहां पहुंचते ही विक्रमादित्य खंभा निकलने वाली जगह पर गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे।
            सुबह सूरज के उगते ही खंभा भी निकल गया। राजा विक्रमादित्य ने जैसे ही खंभे को देखा, वो उस पर चढ़ गए। धीरे-धीरे सूरज की रोशनी बढ़ने लगी और खंभा भी ऊपर बढ़ता गया। उस खंभे के साथ-साथ राजा विक्रमादित्य भी सूरज के करीब पहुंचते गए। दोपहर होते-होते खंभा सूरज के एकदम नजदीक पहुंच गया, लेकिन तब तक राजा पूरी तरह से जल कर राख हो गए।
            जब सूर्य देवता ने खंभे पर जला हुआ मानव शरीर देखा, तो वो समझ गए कि यह राजा विक्रमादित्य ही हैं। उन्होंने भगवान इंद्र के दावे को बिल्कुल सही पाया और तुरंत अमृत की कुछ बूंदे राजा के मुंह में डालकर उन्हें जिंदा कर दिया। सूर्य देवता ने राजा की हिम्मत से खुश होकर उन्हें ऐसे सोने के कुंडल दिए, जो व्यक्ति की हर इच्छा को पूरा करते थे। फिर सूरज की रोशनी कम होने लगी और खंभा भी नीचे आ गया।

            नीचे आते ही राजा विक्रमादित्य ने बेताल को बुलाया और अपने महल वापस चले गए। उसी दौरान उन्हें एक ब्राह्मण मिला, जिसने राजा से कुछ दान करने को कहा। महाराज ने खुशी-खुशी उस ब्राह्मण को सूर्य देव से मिले कुंडल दे दिए और बताया कि कुंडल उनकी सभी इच्छा को पूरी कर सकते हैं। 
इतना कहकर राजा अपने कमरे में चले गए।

यह कहानी सुनाने के बाद चौथी पुतली सिंहासन से उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-

इंसान के मन में हमेशा त्याग और दान की भावना होनी चाहिए। जैसे इस कहानी में राजा विक्रमादित्य ने उपहार में मिले कुंडल ब्राह्मण को दान में दे दिए, उसी तरह हमें भी निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करनी चाहिए।

लीलावती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की पांचवीं कहानी

हर बार की तरह पांचवें दिन फिर से राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए उत्सुकता से आगे बढ़े। सिंहासन की तरफ कदम बढ़ाते ही उसमें से पांचवीं पुतली बाहर आई और उसने अपना नाम लीलावती बताया। लीलावती ने राजा भोज से कहा, “राजन, राजा विक्रमादित्य वीर होने के साथ-साथ बड़े दानी भी थे। अगर आप भी उन्हीं की तरह एक दानवीर हैं, तो ही आप इस सिंहासन पर बैठ सकते हैं। इतना कहकर लीलावती ने विक्रमादित्य की दानवीरता की कथा सुनानी शुरू की।
            एक बार राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक ब्राह्मण आया। वह राजा से मिला और उसने कहा कि अगर आप तुला लग्न में एक महल बनवाएंगे, तो उनकी प्रजा में खुशहाली आएगी और उनकी कीर्ति चारों ओर हो जाएगी। राजा को उस ब्राह्मण की बात सही लगी और उन्होंने महल बनवाने का फैसला लिया।
            हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी और मोती से उन्होंने एक भव्य महल का निर्माण करवाया। महल तैयार होने के बाद राजा का पूरा परिवार, उनके रिश्तेदार और प्रजा उस महल को देखने के लिए आई। राजा विक्रमादित्य ने उस ब्राह्मण को भी आकर महल देखने का न्योता भेजा। सभी महल की खूबसूरती को देखते ही रह गए। वह ब्राह्मण भी महल देखकर दंग रह गया।
            महल की सुंदरता देखने के बाद ब्राह्मण के मुंह से अचानक निकल गया, “काश! यह महल मेरा होता।” ब्राह्मण की इच्छा जानकर राजा ने तुरंत वह महल उस ब्राह्मण को दान में देने की घोषणा कर दी। महाराज की बात सुनकर ब्राह्मण हैरान रह गया। वह दौड़ता हुआ अपने घर पहुंचा और उसने यह बात अपनी पत्नी को बताई। उसकी पत्नी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और उसने सोचा कि ब्राह्मण पागल हो गया है। अपनी पत्नी को यकीन दिलाने के लिए वह उसे महल लेकर गया।
            महल को देखकर और लोगों की बातें सुनकर ब्राह्मणी भी हैरान रह गई। उसने पूरा महल देखने की इच्छा जताई। पत्नी की इच्छा को पूरा करने के लिए ब्राह्मण उसे महल दिखाने लगा। महल इतना बड़ा था कि देखते-ही-देखते रात हो गई और वो दोनों बहुत थक गए। थकान की वजह से दोनों महल के ही एक कमरे में सो गए।
            आधी रात को कुछ आवाजें आने लगीं, तो उन दोनों की नींद खुल गई। महल में भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी और ठंडी हवा चल रही थी। उसी समय उनका पूरा कमरा रोशनी से भर गया और फिर उन्होंने एक महिला की आवाज सुनी। उनकी आवाज सुनकर दोनों को ऐसा लगा, जैसे मां लक्ष्मी धरती पर आ गई हों।
            उन्हें बार-बार एक ही आवाज सुनाई दे रही थी, “मैं, तुम्हारी इच्छा पूरी करने आई हूं। तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते हो।” यह आवाज सुनकर वो दोनों डर गए। मां लक्ष्मी ने अपनी बात तीन बार दोहराई, लेकिन उन दोनों ने कुछ नहीं मांगा तो वो वहां से चली गईं।
            इसके बाद ब्राह्मणी बोली, “जरूर इस महल में भूतों का साया है, तभी राजा ने हमें यह महल दान में दिया है। तुम कल ही जाकर उनसे कहो कि हमें यह महल नहीं चाहिए। हम अपनी कुटिया में ही ठीक हैं। वहां कम से कम हम चैन से सो तो पाते थे।” ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात बिल्कुल सही लगी और किसी तरह महल में रात काटकर दोनों सुबह वापस अपनी कुटिया में चले गए।
            हाथ-मुंह धोकर ब्राह्मण तुरंत राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचा और कहा कि महल वापस ले लीजिए। हम इतने भव्य महल में नहीं रह सकते। इस पर राजा ने कहा, “हे ब्राह्मण देव, वो महल मैंने आपको दान में दिया है। उसे मैं वापस कैसे ले सकता हूं?” ब्राह्मण ने राजा की एक बात नहीं सुनी और बार-बार उनसे महल वापस लेने को कहने लगा।
            ब्राह्मण की जिद को देखते हुए राजा विक्रमादित्य ने कहा कि वह उस महल को उनसे वापस नहीं लेंगे, लेकिन खरीद सकते हैं। ब्राह्मण ने राजा की बात मान ली। विक्रमादित्य ने महल का उचित मूल्य देकर ब्राह्मण से वह महल खरीद लिया और अपने पूरे परिवार के साथ नए महल में रहने आ गए।
            एक रात जब राजा विक्रमादित्य महल में सो रहे थे, तो दोबारा मां लक्ष्मी वहां आईं। उन्होंने कहा, “राजन, तुम्हें जो चाहिए मुझसे मांग लो। मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर सकती हूं।” इस पर राजा ने कहा, “मां, आपके आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है। मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। हां, अगर आप कुछ देना ही चाहती हैं, तो मेरी पूरी प्रजा पर धन की वर्षा कर दीजिए। ऐसा होने पर मेरी पूरी प्रजा संपन्न हो जाएगी।”
            राजा की इच्छा जानकर, मां लक्ष्मी ने पूरी रात राज्य पर धन की वर्षा कर दी। सुबह उठकर जब लोगों ने इतना धन देखा, तो वो सारा धन राजा विक्रमादित्य को सौंपने के लिए महल आ गए। राजा ने प्रजा के इस प्यार को देखकर उन्हें बताया कि यह सारा धन उनकी प्रजा के लिए ही है। इसी वजह से सब अपने-अपने हिस्से का धन अपने पास ही  रखें। उनकी बात सुनते ही पूरी जनता प्रसन्न हो गई और राजा की जय-जयकार करने लगे।
इतनी कहानी सुनाते ही पांचवीं पुतली वहां से उड़ गई।

कहानी से शिक्षा :-
हमेशा अपना दिल बड़ा रखना चाहिए। खुद के पास अगर सबकुछ हो, तो दूसरों की भलाई के बारे में सोचना चाहिए।

रविभामा पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की छठी कहानी

पांचवीं पुतली से महाराज विक्रमादित्य की कहानी सुनकर जैसे ही राजा भोज सिंहासन पर बैठने लगे, तभी उन्हें छठवीं पुतली रविभामा ने रोक लिया। उसने राजा से पूछा कि क्या सच में वो इस सिंहासन पर बैठने योग्य हैं। रविभामा ने पूछा, क्या आप में महाराज विक्रमादित्य का वो गुण है, जो उन्हें सिंहासन पर बैठने योग्य बनाता था। जब राजा भोज ने निवेदन किया कि आप मुझे महाराज विक्रमादित्य के उस गुण के बारे में विस्तार से बताएं। तब राजा के निवेदन करने पर पुतली ने राजा विक्रमादित्य के छठवें गुण की कहानी शुरू की, जो कुछ इस प्रकार है।
            बहुत समय पहले जब महाराज विक्रमादित्य का राज्य था और चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली थी, तब एक दिन महाराज वन विहार के लिए अपने रथ पर सवार होकर निकले। वह नदी के किनारे-किनारे अपने रथ पर सवार होकर जा रहे थे कि उन्हें कुछ दूरी पर एक परिवार नदी के किनारे खड़ा दिखाई दिया।
            उस परिवार में एक पुरुष एक स्त्री और साथ में उनका एक पुत्र था। उनके कपड़े देखने भर से उनकी गरीबी साफ पता चल रही थी। उन सभी के चेहरे चिंता और परेशानी से भरे दिखाई दे रहे थे। विक्रमादित्य उन सभी को देख ही रहे थे कि अचानक तीनों ने नदी में छलांग लगा दी।
            राजा ने जैसे ही उन सभी को नदी में डूबते देखा, वह फौरन उन्हें बचाने के लिए खुद नदी में कूद पड़े। वह अकेले उन तीनों को नहीं बचा सकते थे, इसलिए उन्होंने मदद के लिए वरदान में मिले दो बेतालों को बुलाया। राजा विक्रमादित्य ने परिवार में शामिल पुरुष को बचाया। वहीं बेतालों ने स्त्री और पुत्र की जान बचाई।
            सभी को सुरक्षित नदी से बाहर निकालने के बाद राजा ने उस पुरुष से पूछा कि आप कौन हो और क्यों ऐसे अपने पूरे परिवार के साथ नदी में कूद गए? तब पुरुष ने रोते हुए कहा कि मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं और आपके ही राज्य में रहता हूं। आपके राज्य में सभी आत्मनिर्भर हैं, इसलिए कोई भी मुझे काम देने के लिए तैयार नहीं है।
            इस हालात में न तो मेरे पास रहने के लिए घर है और न ही खाने के लिए भोजन। इस कारण मेरा पूरा परिवार कई दिनों से भूखा है। मैं अपने परिवार को इस तरह भूख से बिलखते नहीं देख सकता। यही वजह है कि प्राण त्यागने का विचार बनाकर मैं और मेरा परिवार नदी में कूद गए थे।
            राजा ने उनकी बात सुनी और निवेदन किया कि हे ब्राह्मण देव! आपको प्राण त्यागने की जरूरत नहीं है। कृप्या करके आप मेरे अतिथि भवन में चलकर रहिए। वहां आप जब तक चाहे सुख पूर्वक रह सकते हैं। राजा की बात सुनकर ब्राह्मण ने कहा कि अगर कुछ समय के बाद हमसे कुछ गलती हो और हमें अपमानित करके निकाल दिया गया, तो हम कहां जाएंगे।
            राजा ने उसकी यह बात सुनकर वचन दिया कि उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होगा और वह जब तक चाहें तब तक सपरिवार उनके अतिथि भवन में आराम से रह सकते हैं। ब्राह्मण ने राजा के वचन को स्वीकार किया और राजा के साथ अपने परिवार को लेकर अतिथि भवन में रहने चले गए। वहां वे सुख और आराम से रहने लगे। उनकी सेवा में कभी कोई कमी नहीं की जाती थी।
            ब्राह्मण परिवार अच्छे से रहने लगा, लेकिन उनकी एक आदत बहुत खराब थी। वह यह थी कि वे जहां रहते और खाते-पीते थे, वहीं गंदगी कर देते थे। पहने हुए कपड़े कई दिनों तक नहीं बदलते थे। इस वजह से धीरे-धीरे पूरा अतिथि भवन गंदा हो गया और वहां चारों ओर उस गंदगी की वजह से बदबू भी फैल गई। इस वजह से ब्राह्मण परिवार की सेवा में लगाए गए सभी नौकर वहां से भाग गए।
            राजा को जब इस बात का पता चला तो उसने दूसरे नौकरों को वहां भेजा, लेकिन वो भी उस गंदगी और बदबू को अधिक दिन सहन नहीं कर पाए। इस वजह से परेशान होकर वो नौकर भी वहां से भाग खड़े हुए। तब राजा ने खुद ब्राह्मण परिवार की सेवा करने की जिम्मेदारी ली।
            राजा विक्रमादित्य ने खूब मन लगाकर उस ब्राह्मण परिवार की सेवा की और समय पड़ने पर वह ब्राह्मण के पैर दबाने से भी पीछे नहीं हिचकते थे। ब्राह्मण ने राजा के वचन का फायदा उठाते हुए एक दिन उनसे कहा कि मेरे शरीर पर लगा हुआ मल साफ करके मुझे अच्छी तरह से स्नान करा दो और साफ वस्त्र पहना दो।
            राजा ने खुशी से उनकी यह बात भी स्वीकार की और जैसे ही वे मल साफ करने के लिए आगे बड़े अचानक वह ब्राह्मण देव देवता के रूप में सामने आ गए। अतिथि गृह में फैली सारी गंदगी अपने आप साफ हो गई। इतना ही नहीं वह स्थान स्वर्ग के जैसा हो गया और चारों ओर सुगंधित हवा भी बहने लगी।
            तब देवता ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं वरुण देव हूं और आपके नगर में आपकी परीक्षा लेने के लिए आया था। हमने आपके आतिथ्य की बहुत प्रसंशा सुनी थी, जिस कारण मैं पूरे परिवार के साथ यहां आया था। मैं आपकी इस सेवा से बहुत प्रसन्न हूं और वरदान देता हूं कि आपके नगर में कभी सूखा नहीं पड़ेगा। आपके नगर के हर खेत से तीन प्रकार की फसलें उगेंगी। राजा ने हाथ जोड़कर वरुण देव को नमस्कार किया और इसके बाद वरुण देव परिवार के साथ वहां से स्वर्ग की ओर चल दिए।
महाराज विक्रमादित्य की यह कहानी सुनाते ही रविभामा वहां से उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-

हमें भी अपने घर आए अतिथि की अच्छे से सेवा करना चाहिए और उन्हें पूरा सम्मान देना चाहिए। हमारे देश में अतिथि को देवता का स्थान दिया गया है, इसीलिए कहा जाता है “अतिथि देवो भव:”।

कौमुदी पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की सातवीं कहानी

राजा भोज सातवें दिन फिर दरबार पहुंचकर सिंहासन की तरफ बढ़ने लगे, तभी सातवीं पुतली कौमुदी ने राजा से कहा, “यहां बैठने की जिद छोड़ दो, इस पर सिर्फ राजा विक्रमादित्य जैसा गुणवान ही बैठ सकता है।” राजा के गुणों को बताने के लिए सातवीं पुतली ने एक कहानी सुनानी शुरू की।
            एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने कमरे में सो रहे थे। आधी रात में उन्हें रोने की आवाज सुनाई दी। इस आवाज को सुनकर राजा बाहर निकले। जैसे ही वह क्षिप्रा के तट पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि एक महिला जोर-जोर से रो रही है। वो उससे उसके रोने का कारण पूछने लगे।
            तब महिला ने बताया कि वो चोर की पत्नी है और राजा ने उसे पेड़ से उल्टा लटका दिया है। राजा ने पूछा, “तो क्या तुम्हें इस सजा से कोई परेशानी है?” उसने कहा, “सजा के फैसले से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन यह बात बुरी लग रही है कि मेरा पति भूखा-प्यासा उल्टा लटका हुआ है।”
            इतना सुनकर राजा ने झट से पूछ लिया कि उसने अब तक उसे कुछ खिलाया-पिलाया क्यों नहीं? तब उसने कहा,  “वो बहुत ऊंचाई पर लटका हुआ है और मैं किसी की मदद के बिना उस तक खाना नहीं पहुंचा सकती हूं।” तब विक्रामादित्य ने कहा, “चलो! मैं तुम्हारे साथ चलता हूं?”
            यह सब सुनकर महिला बहुत खुश हुई। वो महिला उस व्यक्ति की पत्नी नहीं, बल्कि एक भूत थी, जो उस लटके हुए शख्स को खाना चाहती थी। उसने राजा विक्रमादित्य के साथ वहां पहुंचकर उस इंसान को खा लिया। भूख मिटते ही उसने राजा से मनचाहा वरदान मांगने को कहा। तब नरेश विक्रमादित्य ने उससे अन्नपूर्णा पात्र मांगते हुए कहा कि इससे उनकी प्रजा का भला होगा। इस वरदान को सुनने के बाद उस राक्षसी ने कहा कि अन्नपूर्णा पात्र देना उसके बस में नहीं है, लेकिन वो अपनी बहन को कहकर उसे दिला सकती है।
            वह राक्षसी अपनी बहन के पास पहुंची और सारी बात बताते हुए उससे अन्नपूर्णा पात्र मांगा। उसकी बहन ने खुशी-खुशी वह पात्र राजा विक्रमादित्य को दे दिया। उस पात्र को लेकर राजा आगे बढ़ ही रहे थे कि उन्हें एक ब्राह्मण रास्ते में भूख से तड़पता हुआ दिखाई दिया। उसने कहा, “हे राजन! मैंने बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है। मुझे जल्दी से कुछ खिला दो।” राजा ने तुरंत अन्नपूर्णा पात्र से भोजन मांगा और ब्राह्मण को खिला दिया। भोजन खिलाने के बाद राजा ने ब्राह्मण से दक्षिणा मांगने को कहा। ब्राह्मण ने राजा से वह पात्र मांग लिया और कहा कि इसकी मदद से वो कभी भूखा नहीं रहेगा। राजा ने बिना किसी झिझक के उसे तुरंत पात्र दे दिया और राजमहल की ओर आगे बढ़ गए।
            इतनी कहानी सुनाते ही सातवीं पुतली उड़ गई। यह सब सुनकर राजा भोज सोच में पड़ गए। उन्होंने मन में सोचा कि अब यहां बैठने का कोई और उपाय सोचना पड़ेगा।
कहानी से शिक्षा :-

निस्वार्थ भाव से सभी की मदद करनी चाहिए। दूसरों के लिए अच्छा सोचने वाले के साथ अच्छा ही होता है।

पुष्पवती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की आठवीं कहानी

आठवीं बार राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए राज दरबार पहुंचे। रोज-रोज पुतलियों से राजा विक्रमादित्य की महानता के किस्से सुनकर वो तंग आ चुके थे। फिर भी सत्ता और उस सिंहासन का मोह उन्हें राज दरबार खींच लाता था। इस बार उन्हें आठवीं पुतली ने राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से रोक दिया और उनकी महानता का एक किस्सा सुनाया।
            राजा विक्रमादित्य को अपने दरबार में सुंदर चीजें रखने का शौक था। एक दिन उनके दरबार में एक बढ़ई आया। उसके पास साज-सज्जा के कई सामान थे। बढ़ई को देखते ही दरबान उसे सीधे राजा के पास लेकर गया। राजा विक्रमादित्य ने उसे देखकर पूछा, “क्या आपके पास ऐसा कुछ है, जो इस महल की शोभा बन सके या फिर हमारे काम आ सके।”
            बढ़ई ने कहा, “महाराज! सामान तो बहुत हैं, लेकिन आपके लायक मुझे यह काठ का घोड़ा लगता है।” राजा ने दूर से उसे देखा, तो वह लकड़ी का घोड़ा नहीं असली घोड़ा लग रहा था। कुछ देर सोचने के बाद विक्रमादित्य ने बढ़ई से पूछा, “जरा इसकी खूबियां तो बताओ।”
            उनके सवाल के जवाब में बढ़ई ने कहा, “हे राजन! आप इसे देख ही चुके हैं। इसे कुछ ऐसे बनाया गया है कि यह असली घोड़ा लगता है। साथ ही इस पर कोई सवार हो जाए, तो यह इतनी तेज दौड़ता है कि व्यक्ति हवा से बाते करने लगे। इसे न कुछ खाने की जरूरत पड़ती है और न किसी तरह के देखभाल की। बिना किसी खर्च के यह आपकी सेवा कर सकता है।”
            राजा यह सब बात सुनकर खुश हुए। उन्होंने बढ़ई से उस काठ के घोड़े की कीमत पूछी। बढ़ई ने कहा, “देखिए महाराज आपसे क्या छुपाना। मेरे पूरे जीवन की मेहनत यह काठ का घोड़ा ही है। इसे बेचने की कीमत मैं कैसे लगाऊं। आप जान ही गए हैं कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी इसे बनाने में दी है। अब खुद ही इसका मोल लगाकर पैसे दे दीजिए।” विक्रमादित्य ने तुरंत मंत्री से बढ़ई को एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देने को कहा। इतनी बड़ी कीमत सुनकर बढ़ई का मन प्रसन्न हो गया।
            इधर, बढ़ई एक लाख स्वर्ण मुद्राएं लेकर अपने घर को चला गया। उधर, राजा ने काठ का घोड़ा सुरक्षित तरीके से तबेले में रखने का सेवक को आदेश दिया। कई दिन बीतने के बाद विक्रमादित्य के मन में हुआ कि क्यों न काठ के घोड़े की सवारी की जाए। पता भी चल जाएगा कि घोड़ा कैसा दौड़ता है। उन्होंने अपने मंत्रियों से जंगल विचरण के लिए काठ का घोड़ा तैयार करने को कहा। उसे अच्छे से सजाकर अन्य मंत्री भी राजा के साथ जाने को तैयार हो गए।
            सभी असली घोड़े पर बैठे और राजा काठ के घोड़े पर बैठ गए। राजा ने घोड़े को दौड़ने के लिए जैसे ही पैर मारा घोड़ा तेजी से दौड़ने लगा। वह घोड़ा राजा को तेज गति से बहुत दूर ले आया। राजा ने आस-पास देखा, तो उनके मंत्री और दरबार के लोग कहीं दिखाई नहीं दिए। राजा अनजान व सुनसान जगह पहुंच चुके थे।
            कुछ देर बाद राजा ने एक बार फिर अपना पैर मारा। फिर से राजा का इशारा मिलने पर घोड़ा ऊपर आसामन में हवा की गति से दौड़ने लगा। अब राजा को घबराहट होने लगी। उन्होंने तुरंत घोड़े को जमीन पर उतरने का इशारा दिया। घोड़ा आज्ञा का पालन करते हुए नीचे आने लगा, लेकिन घोड़े की रफ्तार इतनी तेज थी कि वो एक पेड़ से टकरा गया। पेड़ से टकराते ही घोड़ा चूर-चूर हो गया और राजा किसी जंगल में गिए गए। नीचे गिरते ही उन्होंने अपने पास एक बंदरी को देखा, वो राजा को कुछ इशारा कर रही थी। विक्रमादित्य उसकी बात को नहीं समझ पाए।
            राजा जैसे ही जमीन से उठे, तो उन्हें पास में ही एक कुटिया दिखी। वहां जाकर राजा ने हाथ-पैर धोए और पेड़ से कुछ फल तोड़कर खा लिए। अब राजा एक पेड़ पर चढ़कर विश्राम करने लगे। शाम के समय उस कुटिया में एक संन्यासी पहुंचा। उसने भी हाथ-पैर धोकर पानी पिया और कुछ पानी की बूंदों को बंदरी पर छिड़क दिया। शरीर पर पानी पड़ते ही वह बंदरी एक सुंदर राजकुमारी बन गई। उस राजकुमारी ने जल्दी-जल्दी संन्यासी के लिए खाना बनाया और फिर उनके पैर दबाने लगी।
            सुबह होते ही दोबारा संन्यासी कुटिया से बाहर चला गया, लेकिन जाने से पहले उसने राजकुमारी पर जल छिड़क कर उसे दोबारा से बंदरी बना दिया। अब विक्रमादित्य भी नींद से जागे और पेड़ से नीचे उतरे। फिर बंदरी उन्हें देखकर कुछ संकेत करने लगी। राजा उसे नहीं समझ पाए और अंदर जाकर हाथ-मुंह धोया। उसी जगह पर बंदरी आकर खड़ी हो गई। उसी समय बंदरी पर पानी की कुछ छींटे पड़ गईं। देखते-ही-देखते बंदरी फिर राजकुमारी बन गई। राजा ने जैसे ही बंदरी को राजकुमारी बनते देखा, तो वह हैरान रह गए। विक्रमादित्य ने उससे इस बारे में पूछा।
            राजकुमारी ने बताया, “मैं कामदेव-पुष्पावती की बेटी हूं। सालों पहले मुझसे गलती से एक बाण संन्यासी को लग गया था। तब उन्होंने गुस्से में मुझे श्राप दे दिया कि मुझे उम्र भर बंदरिया बनकर संन्यासी की सेवा करनी होगी। मैंने संन्यासी को बहुत समझाया कि तीर उन्हें गलती से लगा था, लेकिन गुस्से में उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी। कुछ देर बाद संन्यासी ने बताया कि राजा विक्रमादित्य आकर मुझे इस श्राप से मुक्ति दिलाएंगे और पत्नी बनाकर अपने साथ हमेशा रखेंगे, लेकिन ऐसा तभी हो पाएगा जब संन्यासी से मुझे कुछ भेंट में मिले।”
            राजा विक्रमादित्य सब कुछ समझ गए। उस राजकुमारी की परेशानी को देखकर उन्होंने उससे शाम को संन्यासी से उपहार मांगने को कहा और संग ले जाने का वादा कर दिया। इसके बाद राजा ने उस राजकुमारी पर पानी डालकर उसे दोबारा बंदरी बना दिया।
            शाम को फिर संन्यासी घर आया और उसने बंदरी पर पानी छिड़कर उसे राजकुमारी बना दिया। राजकुमारी बनते ही उस महिला ने कहा कि उसे कुछ उपहार में चाहिए। उन्होंने तुरंत एक कमल का फूल उसे दे दिया। संन्यासी ने राजकुमारी को बताया कि यह फूल कभी नहीं मुरझाएगा और रोज एक विशेष रत्न देगा। फिर संन्यासी ने कहा, “हे सुंदरी! मुझे पता है विक्रमादित्य यहां आ चुके हैं। तुम उन्हें बुला लो और खुशी-खुशी उनके राजमहल चली जाओ।” इतना सुनते ही राजा स्वयं वहां आ गए और राजकुमारी को अपने संग लेकर जाने के लिए अपने बेतालों को वहां बुला लिया।
            अपने राज्य पहुंचते ही राजा को देखकर एक बच्चा रोने लगा। विक्रमादित्य ने जब उससे रोने की वजह पूछी, तो उसने राजा से वह कमल मांग लिया। उन्होंने खुशी-खुशी उस बच्चे को कमल दे दिया और अपनी पत्नी के साथ राजमहल पहुंच गए। कुछ दिनों बाद दरबार में एक व्यक्ति को रत्न चुराने वाला चोर कहकर पेश किया गया। राजा ने जब व्यक्ति से पूछा, तो उसने बताया, “महाराज मेरा बेटा एक दिन घर में कमल का फूल लेकर आया। वो रोज एक कीमती रत्न देता है। उन्हीं को लेकर मैं बाजार में बेचने को निकला था, लेकिन आपके सिपाहियों ने मुझे पकड़ लिया।”
            व्यक्ति की इस बात को सुनकर राजा को बहुत दुख हुआ। सिपाहियों पर गुस्सा करते हुए राजा ने कहा, “बिना सोचे समझे किसी को भी चोर बोलकर पकड़ लेना सरासर गलत है। आगे से इस तरह की हरकत नहीं होनी चाहिए।” इसके बाद राजा ने उस व्यक्ति को छोड़ने का आदेश दिया। उसकी परेशानी को देखकर राजा ने पूछा, “बताओ यह रत्न तुम कितने में बेचना चाहते हो।” वह गरीब डर के मारे कुछ नहीं बोल पाया। राजा ने तुरंत दीवान को रत्न के बदले एक लाख मुद्राएं देने को कहा।
            इतना सुनाते ही आठवीं पुतली पुष्पवती ने कहा, “राजा को इतना महान और दानी होना चाहिए। क्या ये सब गुण तुम में हैं बताओ। अगर ये गुण हैं, तभी इस सिंहासन पर बैठना वरना नहीं।” इतना कहकर वह पुतली विक्रमादित्य के सिंहासन से उड़ गई।
कहानी से शिक्षा :-
बिना सोचे समझे किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए। 

मधुमालती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की नौवीं कहानी

नवें दिन राजा भोज दरबार पहुंचे और विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे। इस बार उन्हें नवीं पुतली ने सिंहासन पर बैठने से रोक दिया। उसने कहा, “यहां बैठने के लिए तुम्हें राजा विक्रमादित्य जैसा होना पड़ेगा।” इतना कहकर वह विक्रमादित्य के गुणों को बताने के लिए कहानी सुनाने लगी।
            सालों से शासन करते हुए एक बार राजा विक्रमादित्य के मन में हुआ कि प्रजा की खुशहाली के लिए एक यज्ञ करना चाहिए। उन्होंने शुभ मुहूर्त देखकर कई हफ्ते तक चलने वाला विशाल यज्ञ शुरू किया। राजा रोज मंत्रों का उच्चारण करके अग्नि में आहुति देते थे। एक दिन यज्ञ के बीच में ही गुरुकुल के एक ऋषि वहां पहुंचे। उन्हें देखकर राजा विक्रमादित्य उठकर उन्हें नमस्कार करना चाहते थे, लेकिन यज्ञ की वजह से वो ऐसा नहीं कर पाए। उन्होंने मन ही मन ऋषि को प्रणाम किया। राजा की विवशता को देखकर उन्होंने विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया।
            कुछ देर बाद यज्ञ खत्म होने पर राजा ने ऋषि को दोबारा प्रणाम किया और आने का कारण पूछा। ऋषि ने बताया, “मेरे आठ शिष्यों का जीवन खतरे में पड़ गया है। वो लकड़ी लेने के लिए जंगल गए थे और तभी वहां दो राक्षस आए और उन सभी को पकड़कर पहाड़ी की ऊंचाई पर ले गए। शिष्यों को ढूंढते हुए जब मैं वहां पहुंचा, तो राक्षस ने बताया कि उन्हें मां काली के समक्ष बलि के लिए तंदुरुस्त क्षत्रिय चाहिए थे, इसलिए उनके शिष्यों को पकड़ा है। साथ ही राक्षसों ने चेतावनी दी है कि अगर कोई वहां उन बालकों को छुड़ाने के लिए गया, तो वो उन्हें पहाड़ी से फेंक देगा। हां, अगर कोई मोटे पुरुष को बलि के लिए लेकर आएगा, तो वो बच्चों को छोड़ देंगे।”
            ऋषि की पूरी बात सुनने और उन्हें इस तरह परेशान देखकर राजा विक्रमादित्य ने उस पहाड़ पर जाने की इच्छा जाहिर की। राजा ने कहा, “हे ऋषिवर! मैं क्षत्रिय और हट्टा-कट्टा दोनों हूं। वहां जाकर मैं स्वयं मां की बलि बन जाऊंगा और आपके शिष्यों को राक्षस छोड़ देंगे।” राजा की यह बात सुनकर ऋषि बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता है। मैंने स्वयं को बलि बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन राक्षसों ने ठुकरा दिया। अब स्वयं राजा की बलि न तो राक्षस स्वीकार करेंगे और न मैं ऐसा होने दूंगा। कुछ बच्चों के लिए प्रजा के दाता की बलि चढ़ाना गलत है।”
            ऋषि की किसी बात को राजा ने नहीं सुना और पहाड़ पर जाने की जिद करने लगे। आखिर में उन्होंने ऋषि से कहा, “देखिए, मान्यवर राजा का धर्म होता है कि वो प्रजा की रक्षा करे। चाहे उसके लिए राजा को अपनी जान ही दांव पर क्यों न लगानी पड़े।” राजा का हठ देखकर ऋषि उन्हें अपने साथ लेकर चले गए। दोनों कुछ घंटों बाद पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। राक्षसों ने राजा विक्रमादित्य को देखकर पूछा, “यहां आ तो गए हो, लेकिन शर्त के बारे में पता है न।” राजा ने जवाब दिया, “हे राक्षसगण! मुझे सब पता है। मैं अपनी इच्छा से ही यहां आया हूं। अब जल्दी से सारे बच्चों को छोड़ दो।”
            राजा विक्रमादित्य की बात सुनकर एक राक्षस सभी बच्चों को लेकर उन्हें पहाड़ी की चोटी से नीचे छोड़ आया। अब जीवन के अंतिम क्षण में राजा ने भगवान को याद किया और मां काली के आगे अपना सिर झुका दिया। तभी दूसरा राक्षस अपनी तलवार लेकर उनके सिर पर प्रहार करने लगा। राजा थोड़े भी परेशान नहीं हुए और लगातार भगवान का नाम जपने लगे। तभी अचानक राक्षस ने अपने हाथों से तलावर को नीचे फेंक दिया।
            सिर न कटने पर राजा ने जब पीछे मुड़कर देखा, तो वो हैरान हो गए। दोनों राक्षस बहुत सुंदर युवराज जैसे दिख रहे थे। उस समय पर्वत की पूरी चोटी चमकने लगी और वातावरण में फूलों की खुशबू फैली गई। राजा कुछ समझ नहीं पाए और आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगे।
            तब दोनों ने राजा को बताया कि वो इंद्र और वरुण देवता हैं, जो उनकी परीक्षा लेने के लिए आए थे। दोनों देवों ने कहा, “हमने तुम्हारी बहुत तारीफ सुनी थी, इसलिए देखना चाहते थे कि तुम अपनी प्रजा के लिए क्या कुछ कर सकते हो। अपनी प्रजा के लिए जान दांव पर लगाने में तुम संकोच करोगे या नहीं। हे राजन! आपके अंदर प्रजा के लिए इतना प्रेम देखकर हम बहुत प्रसन्न हैं।” इतना कहने के बाद दोनों देवों ने राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया और अपने लोक चले गए।
            कहानी पूरी होते ही नवीं पुतली मधुमालती ने राजा भोज से कहा कि अगर आपके अंदर भी ऐसे गुण हैं, तो ही सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ना, वरना इस बारे में कभी सोचना भी नहीं। इतना कहकर नवीं पुतली वहां से उड़ गई। नवीं पुतली की बात सुनकर राजा भोज सोच में पड़ गए और वहां से चले गए।
कहानी से शिक्षा :-
हिम्मत और साहस से हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए। किसी को मुसीबत में अकेले छोड़ने की जगह उसे उससे बचाने की कोशिश की जानी चाहिए।

प्रभावती पुतली की कहानी - सिंहासन बत्तीसी की दसवीं कहानी

दसवें दिन दोबारा राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए दरबार पहुंचे, तभी दसवीं पुतली प्रभावती ने सिंहासन से निकलकर उन्हें वहां बैठने से रोक दिया। प्रभावती ने कहा कि पहले आप राजा विक्रमादित्य की दयालुता की कथा सुनिए। अगर आप भी विक्रमादित्य जैसे दयालु होंगे, तो सिंहासन पर बैठ जाना। इतना कहने के बाद दसवीं पुतली राजा भोज को कहानी सुनाना शुरू करती है।
            एक बार की बात है, जब राजा विक्रमादित्य शिकार करने अपने सैनिकों के साथ जंगल गए। चलते-चलते राजा इतना आगे निकल गए कि उन्हें दूर-दूर तक सैनिक नहीं दिखे। तभी उनकी नजर एक पेड़ पर गई, जहां एक लड़का रस्सी डालकर उससे लटकने की कोशिश कर रहा था। यह देखकर विक्रमादित्य तुरंत उस पेड़ के पास पहुंचे और लड़के को समझाया कि आत्महत्या करना पाप है।
            राजा ने आगे कहा कि खुद को मारना पाप ही नहीं, बल्कि अपराध भी है और इसके लिए मैं तुम्हें सजा भी दे सकता हूं। तुम इतने स्वस्थ हो, लेकिन ऐसी डरपोक जैसी हरकत करने के पीछे क्या कारण है। वह लड़का सहमी आवाज में बोला कि मैं अपने प्रेम की वजह से जान देना चाहता हूं।
            इतना सुनकर राजा विक्रमादित्य ने लड़के से पूछा कि आखिर उसके साथ ऐसा क्या हुआ है? तब लड़के ने बताया कि उसका नाम वसु है और वह कलिंग का रहने वाला है। एक दिन वह जंगल से गुजर रहा था, तभी उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी। युवती को देखते ही उसने शादी करने का प्रस्ताव रख दिया, लेकिन लड़की ने विवाह करने से मना कर दिया। इसकी वजह उसके पंडित की भविष्यवाणी थी कि वो  जिससे भी प्यार करेगी उसकी मौत हो जाएगी। इसी वजह से उसके पिता ने भी उसे पैदा होते ही दूर एक कुटिया में भेज दिया था।
            दर्द भरी आवाज में युवक ने आगे कहा कि लड़की से विवाह करने के लिए मुझे गर्म तेल की कड़ाही में कूदकर जिंदा निकलना होगा, जो संभव नहीं है। इसी वजह से अब मैं जीना नहीं चाहता।
            वसु की बातों को सुनने के बाद राजा विक्रमादित्य ने उसे वचन दिया कि वो उसका विवाह उसी लड़की से कराएंगे, जिससे वो प्यार करता है। इतना कहकर राजा अपने साथ वसु को लेकर लड़की की कुटिया में पहुंच गए। वहां पहुंचते ही विक्रमादित्य ने कुटिया के तपस्वी से उस युवती का विवाह वसु से करने की बात कही।
            इस प्रस्ताव को सुनते ही तपस्वी ने कहा, “खौलते तेल की कड़ाही से जिंदा बाहर आने वाला ही उस युवती से विवाह कर सकता है।” फिर राजा ने कहा कि लड़के की जगह वह तेल की कड़ाही में कूदने को तैयार हैं।
            राजा के इस आत्मविश्वास को देखने के बाद तपस्वी ने गर्म तेल की कड़ाही मंगवाई। कड़ाही के आते ही महाराज विक्रमादित्य ने मां काली को याद किया और उसमें कूद पड़े। खौलते तेल की वजह से राजा की मौत हो गई। यह सब देखकर मां काली को अपने प्रिय भक्त पर दया आई और उन्होंने तुरंत बेतालों से राजा को जिंदा करने को कहा। काली मां का आदेश मिलते ही बेतालों ने अमृत की कुछ बूंदें महाराज विक्रमादित्य के मुंह में डालीं, जिससे राजा तुरंंत जीवित हो गए।
            विक्रमादित्य ने जिंदा होते ही वसु के लिए उस सुंदर लड़की का हाथ मांगा। तपस्वी ने तुरंत इसकी सूचना सुंदरी के पिता को भेजी और दोनों की शादी करा दी। विवाह संपन्न होते ही वसु ने राजा विक्रमादित्य को शुक्रिया कहा और खुशी-खुशी लड़की के साथ अपने घर की ओर निकल पड़ा।
इतनी कहानी सुनाने के बाद दसवीं पुतली सिंहासन से उड़ गई।

कहानी से शिक्षा :-

दूसरों का भला करने वालों का भगवान हमेशा साथ देता है। इसलिए, मुश्किल में किसी को भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

बत्तीस पुतलियों के नाम :-

  1. रत्नमंजरी  
  2. चित्रलेखा  
  3. चन्द्रकला  
  4. कामकंदला  
  5. लीलावती  
  6. रविभामा  
  7. कौमुदी  
  8. पुष्पवती  
  9. मधुमालती  
  10. प्रभावती  
  11. त्रिलोचना  
  12. पद्मावती  
  13. कीर्तिमती  
  14. सुनयना  
  15. सुन्दरवती  
  16. सत्यवती  
  17. विद्यावती  
  18. तारावती  
  19. रुपरेखा  
  20. ज्ञानवती  
  21. चन्द्रज्योति  
  22. अनुरोधवती  
  23. धर्मवती  
  24. करुणावती  
  25. त्रिनेत्री  
  26. मृगनयनी  
  27. मलयवती  
  28. वैदेही  
  29. मानवती  
  30. जयलक्ष्मी  
  31. कौशल्या  
  32. रानी रुपवती  


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रोचक बाल कहानियाँ

 गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल

मगध देश के जंगलों में एक खूंखार डाकू का राज हुआ करता था। वह डाकू जितने भी लोगों की हत्या करता था, उनकी एक-एक उंगली काटकर माला की तरह गले में पहन लेता। इसी वजह से डाकू को सभी अंगुलिमाल के नाम से जानते थे।
मगध देश के आसपास के सभी गांवों में अंगुलिमाल का आतंक था। एक दिन उसी जंगल के पास के ही एक गांव में महात्मा बुद्ध पहुंचे। साधु के रूप में उन्हें देखकर हर किसी ने उनका अच्छी तरह स्वागत किया। कुछ देर उस गांव में रुकते ही महात्मा बुद्ध को थोड़ा अजीब-सा लगा। तभी उन्होंने लोगों से पूछा, ‘आप सभी लोग इतने डरे और सहमे-सहमे से क्यों लग रहे हैं?’
सबने एक-एक करके अंगुलिमाल डाकू द्वारा की जा रही हत्याओं और उंगुली काटने के बारे में बताया। सभी दुखी होकर बोले कि जो भी उस जंगल की तरफ जाता है, उसे पकड़कर वो डाकू मार देता है। अब तक वो 99 लोगों को मार चुका है और उनकी उंगुली को काटकर उन्हें गले में माला की तरह पहनकर घूमता है। अंगुलीमाल के आतंक की वजह से हर कोई अब उस जंगल के पास से गुजरने से डरता है।
इन सभी बातों को सुनने के बाद भगवान बुद्ध ने उसी जंगल के पास जाने का फैसला ले लिया। जैसे ही भगवान बुद्ध जंगल की ओर जाने लगे, तो लोगों ने कहा कि वहां जाना खतरनाक हो सकता है। वो डाकू किसी को भी नहीं छोड़ता। आप बिना जंगल गए ही हमें किसी तरह से उस डाकू से छुटकारा दिला दीजिए।
भगवान बुद्ध सारी बातें सुनने के बाद भी जंगल की ओर बढ़ते रहे। कुछ ही देर में बुद्ध भगवान जंगल पहुंच गए। जंगल में महात्मा के भेष में एक अकेले व्यक्ति को देखकर अंगुलिमाल को बड़ी हैरानी हुई। उसने सोचा कि इस जंगल में लोग आने से पहले कई बार सोचते हैं। आ भी जाते हैं, तो अकेले नहीं आते और डरे हुए होते हैं। ये महात्मा तो बिना किसी डर के अकेले ही जंगल में घूम रहा है। अंगुलिमाल के मन में हुआ कि अभी इसे भी खत्म करके इसकी उंगली काट लेता हूं।
तभी अंगुलिमाल ने कहा, ‘अरे! आगे कि ओर बढ़ते हुए कहां जा रहा है। ठहर भी जा अब।’ भगवान बुद्ध ने उसकी बातों को अनसुना कर दिया। फिर गुस्से में डाकू बोला, ‘मैंने कहा रुक जाओ।’ तब भगवान ने उसे पलटकर देखा कि लंबा-चौड़ा, बड़ी-बड़ी आंखों वाला आदमी जिसके गले में उंगलियों की माला थी, वो उन्हें घूर रहा था।
उसकी तरफ देखने के बाद बुद्ध दोबारा से चलने लगे। गुस्से में तमतमाते हुए अंगुलिमाल डाकू उनके पीछे अपनी तलवार लेकर दौड़ने लगा। डाकू जितना भी दौड़ता, लेकिन उन्हें पकड़ नहीं पाता। दौड़-दौड़कर वो थक गया। उसने दोबारा कहा, ‘रुक जाओ, वरना मैं तुम्हें मार दूंगा और तुम्हारी उंगली काटकर मैं 100 लोगों को मारने की अपनी प्रतीज्ञा पूरी कर लूंगा।’
भगवान बुद्ध बोले कि तुम अपने आप को बहुत शक्तिशाली समझते हो न, तो पेड़ से कुछ पत्तियां और टहनियां तोड़कर ले आओ। अंगुलिमाल ने उनका साहस देखकर सोचा कि जैसा ये कह रहा है कर ही लेता हूं। वो थोड़ी देर में पत्तियां और टहनियां तोड़कर ले आया और कहा, ले आया मैं इन्हें।
फिर बुद्ध जी कहने लगे, ‘अब इन्हें दोबारा पेड़ से जोड़ दे।’
यह सुनकर अंगुलिमाल बोला, ‘तुम कैसे महात्मा हो, तुम्हें नहीं पता कि तोड़ी हुई चीज को दोबारा नहीं जोड़ सकते हैं।’
भगवान बुद्ध ने कहा कि मैं यही तो तुम्हें समझाना चाहता हूं कि जब तुम्हारे पास किसी चीज को जोड़ने की ताकत नहीं है, तो तुम्हें किसी वस्तु को तोड़ने का अधिकार भी नहीं है। किसी को जीवन देने की क्षमता नहीं, तो मारने का हक भी नहीं।’
यह सब सुनकर अंगुलिमाल के हाथों से हथियार छूट गया। भगवान आगे बोले, ‘तू मुझे रुक जा-रुक जा कह रहा था, मैं तो कबसे स्थिर हूं। वो तू ही है जो स्थिर नहीं है।’
अंगुलिमाल बोला, ‘मैं तो एक जगह पर खड़ा हूं, तो कैसे अस्थिर हुआ और आप तब से चल रहे हैं।’ बुद्ध भगवान बोले, ‘मैं लोगों को क्षमा करके स्थिर हूं और तू हर किसी के पीछे उसकी हत्या करते हुए भागने की वजह से अस्थिर है।’
यह सबकुछ सुनकर अंगुलिमाल डाकू की आंखें खुल गईं और उसने कहा, ’आज के बाद से मैं कोई अधर्म वाला कार्य नहीं करूंगा।’
रोते हुए अंगुलिमाल डाकू भगवान बुद्ध के चरणों पर गिर गया। उसी दिन अंगुलिमाल ने बुराई का रास्ता छोड़ा और वो बहुत बड़ा संन्यासी बन गया।

कहानी से शिक्षा

सही मार्गदर्शन मिलने पर व्यक्ति बुराई की राह को छोड़कर अच्छाई को चुन लेता है।

 परीक्षा

 जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आयी। जा कर महाराज से विनय की कि दीनबंधु ! दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गयी, राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाय तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी जिंदगी की नेकनामी मिट्टी में मिल जाय।
            राजा साहब अपने अनुभवशील नीतिकुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे। बहुत समझाया, लेकिन जब दीवान साहब ने न माना, तो हार कर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली; पर शर्त यह लगा दी कि रियासत के लिए नया दीवान आप ही को खोजना पड़ेगा।
            दूसरे दिन देश के प्रसिद्ध पत्रों में यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान की जरूरत है। जो सज्जन अपने को इस पद के योग्य समझें वे वर्तमान सरकार सुजानसिंह की सेवा में उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि वे ग्रेजुएट हों, मगर हृष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है, मंदाग्नि के मरीज को यहाँ तक कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं। एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जायगी। विद्या का कम, परन्तु कर्तव्य का अधिक विचार किया जायगा। जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे, वे इस उच्च पद पर सुशोभित होंगे।
            इस विज्ञापन ने सारे मुल्क में तहलका मचा दिया। ऐसा ऊँचा पद और किसी प्रकार की कैद नहीं ? केवल नसीब का खेल है। सैकड़ों आदमी अपना-अपना भाग्य परखने के लिए चल खड़े हुए। देवगढ़ में नये-नये और रंग-बिरंगे मनुष्य दिखायी देने लगे। प्रत्येक रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का एक मेला-सा उतरता। कोई पंजाब से चला आता था, कोई मद्रास से, कोई नई फैशन का प्रेमी, कोई पुरानी सादगी पर मिटा हुआ। पंडितों और मौलवियों को भी अपने-अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला। बेचारे सनद के नाम रोया करते थे, यहाँ उसकी कोई जरूरत नहीं थी। रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज-धज दिखाने लगे। लेकिन सबसे विशेष संख्या ग्रेजुएटों की थी, क्योंकि सनद की कैद न होने पर भी सनद से परदा तो ढँका रहता है।
            सरदार सुजानसिंह ने इन महानुभावों के आदर-सत्कार का बड़ा अच्छा प्रबंध कर दिया था। लोग अपने-अपने कमरों में बैठे हुए रोजेदार मुसलमानों की तरह महीने के दिन गिना करते थे। हर एक मनुष्य अपने जीवन को अपनी बुद्धि के अनुसार अच्छे रूप में दिखाने की कोशिश करता था। मिस्टर अ नौ बजे दिन तक सोया करते थे, आजकल वे बगीचे में टहलते हुए ऊषा का दर्शन करते थे। मि. ब को हुक्का पीने की लत थी, आजकल बहुत रात गये किवाड़ बन्द करके अँधेरे में सिगार पीते थे। मि. द स और ज से उनके घरों पर नौकरों की नाक में दम था, लेकिन ये सज्जन आजकल ‘आप’ और ‘जनाब’ के बगैर नौकरों से बातचीत नहीं करते थे। महाशय क नास्तिक थे, हक्सले के उपासक, मगर आजकल उनकी धर्मनिष्ठा देख कर मन्दिर के पुजारी को पदच्युत हो जाने की शंका लगी रहती थी ! मि. ल को किताब से घृणा थी, परन्तु आजकल वे बड़े-बड़े ग्रन्थ देखने-पढ़ने में डूबे रहते थे। जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम देता था। शर्मा जी घड़ी रात से ही वेद-मंत्रा पढ़ने में लगते थे और मौलवी साहब को नमाज और तलावत के सिवा और कोई काम न था। लोग समझते थे कि एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें, कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है।
            लेकिन मनुष्यों का वह बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।
एक दिन नये फैशनवालों को सूझी कि आपस में हाकी का खेल हो जाय। यह प्रस्ताव हाकी के मँजे हुए खिलाड़ियों ने पेश किया। यह भी तो आखिर एक विद्या है। इसे क्यों छिपा रखें। संभव है, कुछ हाथों की सफाई ही काम कर जाय। चलिए तय हो गया, फील्ड बन गयी, खेल शुरू हो गया और गेंद किसी दफ्तर के अप्रेंटिस की तरह ठोकरें खाने लगा।
            रियासत देवगढ़ में यह खेल बिलकुल निराली बात थी। पढ़े-लिखे भलेमानुस लोग शतरंज और ताश जैसे गंभीर खेल खेलते थे। दौड़-कूद के खेल बच्चों के खेल समझे जाते थे।
            खेल बड़े उत्साह से जारी था। धावे के लोग जब गेंद को ले कर तेजी से उड़ते तो ऐसा जान पड़ता था कि कोई लहर बढ़ती चली आती है। लेकिन दूसरी ओर के खिलाड़ी इस बढ़ती हुई लहर को इस तरह रोक लेते थे कि मानो लोहे की दीवार है।
            संध्या तक यही धूमधाम रही। लोग पसीने से तर हो गये। खून की गर्मी आँख और चेहरे से झलक रही थी। हाँफते-हाँफते बेदम हो गये, लेकिन हार-जीत का निर्णय न हो सका।
            अँधेरा हो गया था। इस मैदान से जरा दूर हट कर एक नाला था। उस पर कोई पुल न था। पथिकों को नाले में से चल कर आना पड़ता था। खेल अभी बन्द ही हुआ था और खिलाड़ी लोग बैठे दम ले रहे थे कि एक किसान अनाज से भरी हुई गाड़ी लिये हुए उस नाले में आया। लेकिन कुछ तो नाले में कीचड़ था और कुछ उसकी चढ़ाई इतनी ऊँची थी कि गाड़ी ऊपर न चढ़ सकती थी। वह कभी बैलों को ललकारता, कभी पहियों को हाथ से ढकेलता लेकिन बोझ अधिक था और बैल कमजोर। गाड़ी ऊपर को न चढ़ती और चढ़ती भी तो कुछ दूर चढ़कर फिर खिसक कर नीचे पहुँच जाती। किसान बार-बार जोर लगाता और बार-बार झुँझला कर बैलों को मारता, लेकिन गाड़ी उभरने का नाम न लेती। बेचारा इधर-उधर निराश हो कर ताकता मगर वहाँ कोई सहायक नजर न आता। गाड़ी को अकेले छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकता। बड़ी आपत्ति में फँसा हुआ था। इसी बीच में खिलाड़ी हाथों में डंडे लिये घूमते-घामते उधर से निकले। किसान ने उनकी तरफ सहमी हुई आँखों से देखा, परंतु किसी से मदद माँगने का साहस न हुआ। खिलाड़ियों ने भी उसको देखा मगर बन्द आँखों से, जिनमें सहानुभूति न थी। उनमें स्वार्थ था, मद था, मगर उदारता और वात्सल्य का नाम भी न था।
            लेकिन उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य था जिसके हृदय में दया थी और साहस था। आज हाकी खेलते हुए उसके पैरों में चोट लग गयी थी। लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चला आता था। अकस्मात् उसकी निगाह गाड़ी पर पड़ी। ठिठक गया। उसे किसान की सूरत देखते ही सब बातें ज्ञात हो गयीं। डंडा एक किनारे रख दिया। कोट उतार डाला और किसान के पास जा कर बोला मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूँ ?
            किसान ने देखा एक गठे हुए बदन का लम्बा आदमी सामने खड़ा है। झुक कर बोला- हुजूर, मैं आपसे कैसे कहूँ ? युवक ने कहा मालूम होता है, तुम यहाँ बड़ी देर से फँसे हो। अच्छा, तुम गाड़ी पर जा कर बैलों को साधो, मैं पहियों को ढकेलता हूँ, अभी गाड़ी ऊपर चढ़ जाती है।
            किसान गाड़ी पर जा बैठा। युवक ने पहिये को जोर लगा कर उकसाया। कीचड़ बहुत ज्यादा था। वह घुटने तक जमीन में गड़ गया, लेकिन हिम्मत न हारी। उसने फिर जोर किया, उधर किसान ने बैलों को ललकारा। बैलों को सहारा मिला, हिम्मत बँध गयी, उन्होंने कंधे झुका कर एक बार जोर किया तो गाड़ी नाले के ऊपर थी।

किसान युवक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। बोला- महाराज, आपने आज मुझे उबार लिया, नहीं तो सारी रात मुझे यहाँ बैठना पड़ता।

            युवक ने हँस कर कहा- अब मुझे कुछ इनाम देते हो ? किसान ने गम्भीर भाव से कहा नारायण चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी।

युवक ने किसान की तरफ गौर से देखा। उसके मन में एक संदेह हुआ, क्या यह सुजानसिंह तो नहीं हैं ? आवाज़ मिलती है, चेहरा-मोहरा भी वही। किसान ने भी उसकी ओर तीव्र दृष्टि से देखा। शायद उसके दिल के संदेह को भाँप गया। मुस्करा कर बोला- गहरे पानी में पैठने से ही मोती मिलता है।

            निदान महीना पूरा हुआ। चुनाव का दिन आ पहुँचा। उम्मीदवार लोग प्रातःकाल ही से अपनी किस्मतों का फैसला सुनने के लिए उत्सुक थे। दिन काटना पहाड़ हो गया। प्रत्येक के चेहरे पर आशा और निराशा के रंग आते थे। नहीं मालूम, आज किसके नसीब जागेंगे ! न जाने किस पर लक्ष्मी की कृपादृष्टि होगी।

संध्या समय राजा साहब का दरबार सजाया गया। शहर के रईस और धनाढ्य लोग, राज्य के कर्मचारी और दरबारी तथा दीवानी के उम्मीदवारों का समूह, सब रंग-बिरंगी सज-धज बनाये दरबार में आ विराजे ! उम्मीदवारों के कलेजे धड़क रहे थे।

            जब सरदार सुजानसिंह ने खड़े हो कर कहा- मेरे दीवानी के उम्मीदवार महाशयो ! मैंने आप लोगों को जो कष्ट दिया है, उसके लिए मुझे क्षमा कीजिए। इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ-साथ आत्मबल। हृदय वह जो उदार हो, आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया। ऐसे गुणवाले संसार में कम हैं और जो हैं, वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमारी पहुँच नहीं। मैं रियासत के पंडित जानकीनाथ-सा दीवान पाने पर बधाई देता हूँ।

रियासत के कर्मचारियों और रईसों ने जानकीनाथ की तरफ देखा। उम्मीदवार दल की आँखें उधर उठीं, मगर उन आँखों में सत्कार था, इन आँखों में ईर्ष्या।
            सरदार साहब ने फिर फरमाया- आप लोगों को यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी कि जो पुरुष स्वयं जख्मी होकर भी एक गरीब किसान की भरी हुई गाड़ी को दलदल से निकाल कर नाले के ऊपर चढ़ा दे उसके हृदय में साहस, आत्मबल और उदारता का वास है। ऐसा आदमी गरीबों को कभी न सतावेगा। उसका संकल्प दृढ़ है जो उसके चित्त को स्थिर रखेगा। वह चाहे धोखा खा जाये, परन्तु दया और धर्म से कभी न हटेगा।

 हरपालसिंह की पाँच बातें

शिक्षित और युवा व्यक्ति के पास कोई काम का न होना सचमुच दुखद है. हरपाल सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही था.गांव में थोड़ी बहुत जमीन थी पर उससे परिवार का गुजारा होना बड़ा कठिन था.वह अपनी बूढ़ी माँ,पत्नी-बच्चों के लिए आवश्यक वस्तुएँ नहीं जुटा पाता था.इसलिए आज उसने विचार कर लिया था कि वह किसी राजा के पास जाकर कोई चाकरी ही कर लेगा.

उसे अपने परिवार से बहुत प्यार था. पर उनकी बेहतरी के लिए अपने मन को कठोर करके आज वह किसी को बिना बताए चांदनी रात में चुपचाप घर से निकल पड़ा.गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था.कुछ कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई दे रहा था.
रात के अंधकार में तारे टिमटिमा रहे थे.

गांव से थोड़ी ही दूर एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी झोपड़ी में रहता था.लोग उसे पागल कहा करते थे.पर वह जब भी कोई बात कहता,ज्ञान की बात ही कहता.हरपाल ने सोचा कि क्यों न उस बूढ़े बाबा से ज्ञान की कुछ बातें सुनता चलूँ.परदेस जा रहा हूं,न जाने कौन सा संकट आन पड़े.
सो वह उस बूढ़े की कुटिया में पहुंच गया और अपनी बात कही.
बूढ़े ने कहा बेटा परदेस जा रहे हो तो मेरी ये पांच बातें सदैव याद रखना-

1.जो तुम्हारी मदद करे, तुम भी उसकी मदद करो।
2.किसी का दिल दुखाने वाली बात मत कहो।
3. हर काम मेहनत और ईमानदारी से करो।
4.बड़ो से बराबरी का दावा मत करो।
और
5.जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो.

हरपाल सिंह ने उस वृद्ध की पांचों बातें गाठ बांधली और निकल पड़ा एक बड़े से नगर की ओर....|

प्रातः काल वह एक बड़े से नगर में पहुंचा.महाराज की दरबार पहुँचकर उसने प्रधान सेवक से विनय की.
प्रधान सेवक ने उसकी दिन था और सरलता से प्रभावित होकर उसने भृत्य का कार्य मिल गया.हरपालसिंह ने प्रधान सेवक का बहुत आभार माना.

एक बार राजा साजो-सामान सहित किसी यात्रा पर निकला.रास्ता लंबा था, गर्मी के दिन थे.यात्रा दल के पीने योग्य पानी समाप्त हो गया.राजा और प्रजा दोनों व्यास से व्याकुल हो उठे.

राजा ने प्रधान सेवक को आदेश दिया कि-अविलंब मेरे और सबके लिए पेयजल का प्रबंध करो अन्यथा तुम बुरे परिणाम के लिए तैयार रहो.

भयभीत प्रधान सेवक अपने साथियों के साथ वन में जल की तलाश करने निकल पड़ा पर,उनका सारा प्रयास व्यर्थ रहा.
वह यात्रा दल के पास निराश होकर वापस लौटा.

हरपाल सिंह भी निकट ही खड़ा था.उनसे उसकी यह दशा देखी न गई. क्योंकि उसी के कारण ही तो आज वह
राज दरबार की सेवा कर रहा है.
उसी बूढ़े की पहली बात याद आई-जो भी तुम्हारी मदद करें तुम भी उसकी मदद करो.

उसने प्रधान सेवक से प्रश्न किया प्रधान जी क्या आसपास कहीं पर भी जल का पता नहीं चला?
प्रधान ने कहा-हाँ हरपाल.सभी ताल नदी सूखे हुए हैं.जल का नामोनिशान तक नहीं है हां एक बावड़ी है लेकिन....|"

लेकिन क्या?-हरपाल सिंह ने पूछा.

"आसपास के लोगों ने बताया कि वहां एक भूत रहता है.आज तक जो भी उस कुएं में उतरा वो कभी वापस नहीं लौट सका.इसलिए हम में से कोई भी वहां जाने की हिम्मत न कर सका." प्रधान सेवक ने अपनी बात पूरी की.

हरपाल सिंह ने कहा-"मित्र तुमने मेरी सहायता की है तुम्हारा मुझ पर बड़ा एहसान है इसलिए मैं अवश्य जल लेने जाऊंगा."
सभी ने हरपाल सिंह को रोकना चाहा, पर हरपाल सिंह अपने दोनों हाथों में मटका लेकर निडर होकर चल पड़ा,उसी भूतिया बावड़ी की ओर.

हरपाल सिंह चलते-चलते बावड़ी के पास पहुंचा. बड़े-बड़े और ऊंचे पेड़ों के बीच घिरा हुआ वह कुआँ सचमुच डरावना लग रहा था.ऐसा प्रतीत होता था की वर्षों से यहां कोई नहीं आया है.
कुएँ से नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थी,और नीचे बिल्कुल अंधेरा था. एक बार तो हरपाल सिंह का हृदय भी काँप गया. पर वह हिम्मत करके धीमी कदमों से कुएँ से जल लेने उतरा.
बावड़ी के जल स्तर तक पहुंच कर और झुककर उसने दोनों अपने मटके पानी से भर लिए.दोनों हाथों में जल से भरे घड़े लिए वह जैसे ही ऊपर सीढ़ियां चढ़ने को तैयार हुआ. उससे ठीक सामने एक भयानक सा आदमी खड़ा था. बिल्कुल काला कलूटा बाल बड़े बड़े और बिखरे हुए.कमर से ऊपर का भाग नग्न था.और उसने किसी नर कंकाल को अपने सीने से लगाए रखा था.
हरपाल सिंह स्तंभित रह गया.

उस डरावने आदमी ने हरपाल से प्रश्न किया ओ नौजवान!मेरी पत्नी के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?
हरपाल कुछ कह नहीं जा रहा था कि उसे वृद्धि की दूसरी बात याद आई किसी के दिल दुखाने वाली बात मत करो.
उसने जवाब दिया-''ऐसी सुंदर स्त्री तो मैंने जीवन में कभी नहीं देखा."

हरपाल सिंह का उत्तर सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ उसने कहा-" नौजवान मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं.
मैं अपनी पत्नी से इतना प्रेम करता था कि आज तक उसे लेकर यहां वहां फिर रहा हूं.आज तक जो भी इस कुएँ में आया उन सब से मैंने यही प्रश्न किया.पर उन्होंने इसे हड्डी का ढांचा कह दिया इसलिए मैंने उन सब को मार डाला. पर तुमने मेरी पत्नी की प्रशंसा करके मुझे खुश कर दिया है.बोलो नौजवान तुम क्या चाहते हो?"

हरपाल सिंह ने कहा-"मान्यवर आसपास के लोगों को आपके भय के कारण पानी नहीं मिल पाता है.
यदि आप मुझसे सचमुच प्रसन्न हैं तो कृपा करके आप इस बावड़ी को छोड़कर चले जाइए."

उस आदमी ने कहा बिल्कुल ऐसा ही होगा और तुरंत वह सदा सदा के लिए उस कुएँ को छोड़कर चला गया.

हरपाल सिंह जब मटके में पानी लेकर वापस  पहुंचा तो सबके खुशी का ठिकाना न रहा. राजा प्रजा सब को भरपूर पानी मिला.

राजा ने हरपाल सिंह से प्रसन्न होकर उसके पद और वेतन में वृद्धि कर दी.

अब हरपाल सिंह को राज्य का खजांची बना दिया गया. यानी कि  राजकोष के देखरेख का जिम्मा अब उसके ही हाथों में था. अपना काम करते हुए उसे बूढ़े की तीसरी बात हमेशा याद आती थी कि-हर काम इमानदारी से करो.

हरपालसिंह की ईमानदारी से काम करने और पाई-पाई के हिसाब रखने की वजह से भ्रष्ट कर्मचारी उससे नाराज  रहने लगे क्योंकि अब उनके अतिरिक्त आय का रास्ता बंद हो गया.

प्रधानमंत्री ने हरपालसिंह को लालच देकर कहा कि यदि तुम हमसे मिलकर रहोगे तो मैं और हमारे साथी मिलकर तुम्हें एक प्रतिष्ठित पद दिलवा देंगे.जिससे तुम्हारे सम्मान और यश में वृद्धि होगी.
पर हरपाल ने बूढ़े की चौथी बात का स्मरण किया-बिना योग्यता के किसी से बराबरी का दावा मत करो.
उसने प्रधानमंत्री का अनुचित प्रस्ताव ठुकरा दिया.

इससे नाराज होकर दूसरे ही दिन सुबह चापलूस मंत्रियों ने राजा के पास जाकर शिकायत की,कि हरपालसिंह अपने कार्य  में हेरा-फेरी करता है.और मना करने पर उसने हमें खरी-खोटी सुनाई और उसने राजपरिवार को भी अपमानजनक शब्द कहे हैं.

राजा यह सुनकर आगबबूला हो गया.उसने कहा-"हरपालसिंह का यह दुस्साहस?कि हमारे ही टुकड़ों पर पलकर हमें ही अपशब्द कहे.हम जब तक हरपालसिंह का कटा सिर नहीं देख लें,हमारे परिवार का कोई भी सदस्य पानी तक नहीं पिएगा."

राजा ने तुरंत एक सैनिक को बुलाकर उससे कहा-"सैनिक हमारे नगर से कुछ दूर के गाँव में एक भवन निर्माण का कार्य चल रहा है.आज एक व्यक्ति तुमसे आकर यह पूछेगा कि काम कितना बाकी है? यह सुनते ही तुम उसकी गर्दन काटकर मेरे पास ले आना."

राजा की आज्ञा पाकर वह सैनिक चला गया.

कुछ देर बाद राजा ने हरपाल से को अपने पास बुला कर कहा-"हरपाल सिंह पास के एक गांव में बहुत बड़ा भवन बन रहा है तुम शीघ्र जाओ और वहां के कारीगर से पूछकर आओ कि काम कितना बाकी है?

"जो आज्ञा महाराज!"

हरपाल सिंह एक घोड़े पर सवार होकर अनजाने में अपने ही मृत्यु की ओर बढ़ चला.
हरपाल सिंह अश्व पर सवार हो कुछ विचार करते हुए यात्रा में मग्न था.

उसने देखा कि रास्ते पर ही एक बड़ा सा आयोजन हो रहा था जिसमें ज्ञान की चर्चा हो रही थी. हरपाल आगे बढ़ जाना चाहता था पर उसे बूढ़े की पांचवी बात याद आई-जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो.
वह घोड़े को एक वृक्ष से बांधकर कथा सुनने में रम  गया. चर्चा जब ज्ञान की हो तो समय कैसे बीत जाता है,पता ही नहीं चलता. हरपाल सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ.कैसे दिन डूबने को आई,पता ही न चला.

इधर राज परिवार के सदस्य भूख प्यास से तड़पने लगे. क्योंकि उन्होंने हरपाल सिंह के मरने के बाद ही अन्य जल ग्रहण करने की प्रतिज्ञा की थी. राजा का बेटा भूख-प्यास सहन नहीं कर सका.वह जानना चाहता था कि हरपालसिंह का सिर अब तक क्यों नहीं पहुंचा?

वास्तविकता जानने के लिए राजकुमार एक साधारण पुरुष का वेश बनाकर उसी सैनिक के पास जा पहुंचा जिसे राजा ने हरपाल सिंह का सिर काटने की आज्ञा दी थी.

वहां जाकर उसने सैनिक से पूछा-" काम अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?
वह सैनिक वेश बदले हुए राजकुमार को नहीं पहचान पाया. उसने समझा कि यही वो व्यक्ति है जिसका सिर काटने के लिए मुझे महराज ने यहाँ  भेजा है.

उसने झट राजकुमार का सिर काट दिया.

यदि हरपालसिंह बूढ़े की पांच बातें नहीं मानता तो क्या होता?


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संतुलित आहार Balanced Diet

दीर्घ जीवन एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए दैनिक जीवन में संतुलित आहार का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। भोजन—जीवन के लिए है, न कि जीवन भेाजन के लिए। भेाजन करने का उद्देश्य केवल क्षुधा की संतुष्टि ही नहीं हैं, वरन् शरीर को पूर्णत: स्वस्थ, सबल एवं नीरोग रखना है। स्वस्थ और सबल रहने के लिए पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। स्वस्थ् रहने के लिए केवल पेट भर भोजन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि हमारे भोजन में पोषक तत्वेां की उपयुक्त मात्रा होनी चाहिए। भेाजन क्या, कैसे, कितना और कब करना चाहिए। इन सभी प्रश्नों का ध्यान रखने पर ही मनुष्य स्वस्थ रहकर अपनी शारीरिक, क्रियायें, भली—भॉति कर सकता है। भोजन में सभी पोषक तत्वों—प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड, वसा, खनिज लबण, विटामिन एवं जल—को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार उचित अनुपात में होना चाहिए। अगर हम केवल प्रोटीनयुक्त भोज्य पदार्थो कर सेवन करेंगे तो ऊतकों की मरम्मत एवं नई कोशिकाओं का निर्माण तो अवश्य होगा, परंतु कार्बोहाइड्रेट के अभाव में शरीर अपना उचित तापक्रम खो बैठेगा। अगर केवल वसायुक्त भोजन ही सेवन किया जाए तो मूत्र, पोषण एवं ह्दय—संबंधी रोगों के संभावना रहेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि निश्चित अनुपात में आयु, व्यवसाय, मौसम,​ लिंग आदि के अनुकूल भोज्य तत्व वाले पदार्थ मे हों। भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे हमारी सभाी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी हो।

संतुलित आहार की परिभाषा एवं विशेषता

वह आहार संतुलित होता है जिसमें सभी आहार वर्ग जैसे ऊर्जा देनेवाला, आहार, शरीर संवर्धन करनेवाला आहार और सुरक्षात्मक आहार, शरीर संवर्धन, करनेवाला आहार और सुरक्षात्मक आहार उचित परिमाण में हो, जिससे की व्यक्ति को सभी पोषक तत्व न्यूनतम मात्रा में प्राप्त हो जायें। उप​रोक्त परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि वह आहार जिसमें शरीर की समस्त पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए सभी पोषक तत्व उचित एवं अनुपात में पाए जाते है। संतुलित आहार कहलाता है। व्यवसाय — अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियेां (कुली, मजदूर, लकड़हारा, धोबी रिक्शाचालक) की शक्ति एवं गर्मी अधिक व्यय होती है। इसलिए उन्हें अधिक कैलोरी ताप की आवश्यकता होती है। ऐसे व्यक्तियों को भेाजन में अधिक कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है। आराम से बैठकर एवं मस्तिष्क से काम करने वालों (डॉक्टर, व​कील, टाइपिस्ट) को प्रोटीन अधिक एवं कम कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है। उन्हें अधिक परिश्रम करने वालों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है।
शारीरिक बनावट या आकार — लम्बे या मोटे शरीर के लोगों को छोटे एवं दुबले लोगों की अपेक्षा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। शरीर भार पर भोजन की मात्रा अधिक निर्भर करती है। लम्बे व्यक्ति के शरीर से ताप का अपव्यय नाटे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को अधिक भेाजन की आवश्यकता होती है। लिंग — स्त्रियों को पुरूषों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि स्त्रियों की लंम्बाई एवं भार पुरूषों की अपेक्षा कम होता है। उन्हें शारीरिक परिश्रम कम करना पड़ता है ।परंतु गर्भावस्था एवं स्तनपान अवस्था में उन्हें अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । आयु—बच्चों को युवा एवं प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा कम भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि वे अधिक क्रियाशील होते हैं एवं उनका शारीरिक विकास होता है। भेाजन से उन्हें केवल शक्ति् एवं गर्मी ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी होता है। खेल—कूद में अधिक शक्ति का हा्स होता है। एक 14 वर्ष का बालक एक युवा के बराबर भोजन करता है। उनके भेाजन में निर्माणक तत्व (प्रोटीन) की अधिक आवश्यकता होती है। बाल्यावस्था एवं वृद्धावस्था में शारीरिक संवेदनशीलता बढ़ जाने के कारण सुरक्षात्मक तत्वों की आवश्यकता होती हैं, क्योकि शारीरिक परिश्रम कम होता है एवं पाचन—क्रिया कमजोर हो जाती है, इसलिए ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है।
जलवायु — ठंडे प्रदेशो में रहनेवालो को गर्म प्रदेशो की अपेक्षा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है, क्योकि शरीर ताप को बढ़ाने के लिए उन्हें अधिक कैलोरियों की आवश्यकता रहती है। उनके भेाजन में वसा प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिए। ऊष्णता—प्रधान देशों में कार्बोहाइड्रेट अधिक प्रयोग किया जाता है। जाड़े के मौसम में भूख अधिक लगती है, अधिक भोजन किया जाता है एवं शरीर भार भी बढ़ जाता है। इसलिए ऐसे मौसम में घी, मक्खन, मेवे आदि अधिक खाने की इच्छा होती है। गर्मी के मौसम में ताप उत्पन्न करने वाले भोजन कम पचते है, भूख कम लगती है एवं शरीर का भार कम हो जाता है। सर्दियों में मौसम में ऊष्मा के रूप में ऊर्जा लेने के कारण ही अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।

संतुलित भोजन नहीं लेने से हानियॉ —

संतुलित आहार नहीं लेने से निम्नलिखित हानियॉ होती है —
1. शरीर में रोगरोधन — क्षमता क्षीण हो जाती है जिस कारण अनेक प्रकार के रोगों के होने की संभावना रहती है।
2. शरीर की मांसपेशियॉ उचित रूप से विकसित नहीं हो पाती हैं।
3. भूख कम लगती है। हर समय आलस्य, थकान एवं नींद आती है।
4. शरीर दुर्बल एवं पीला दिखाई देने लगता है ।
5. थोड़ा भी शारीरिक परिश्रम करने के बाद अधिक थकान का अनुभव होने लगता है।
6. आँखे पीली—पीली दिखाई देती है एवं कमजोरी का अनुभव होने लगता है।
7. शरीर का पूर्ण विकास नहीं हो पाता हे।
8. संतुलित आहार के आभाव में बच्चों का मानसिक विकास अवरूद्ध हो जाता है।
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